बीसवीं सदी की हिंदी पत्रकारिता और गांधी युग - Hindi Journalism and the Gandhi Era of the Twentieth Century

बीसवीं सदी की हिंदी पत्रकारिता और गांधी युग - Hindi Journalism and the Gandhi Era of the Twentieth Century


बीसवीं सदी का प्रारंभ नए संकटों के बीच चेतना जाग्रत होने से हुआ। लार्ड कर्जन ने भारत में जातीय शक्ति और चेतना को खंडित करने के लिए दमन नीति का सहारा लिया। उसने 1905 में बंगाल का विभाजन कर दिया क्योंकि वह बंगालियों की संघशक्ति से आतंकित था। उसकी दमन नीति का जमकर विरोध हुआ और बंगाल के लोग एकजुट हो गए। राष्ट्रीय आंदोलन और गहरा हो गया। बंगाल भारतीय राजनीति का अग्रदूत हो गया था। सुरेंद्रनाथ बनर्जी, विपिन चंद्र पाल और रविंद्रनाथ ठाकुर आदि लोग स्वतंत्रता आंदोलन के साथ साथ आध्यात्मिक पुर्नजागरण में भी सक्रिय हो गए।


बीसवी सदी के प्रथम चरण 1900 से 1918 को हिंदी पत्रकारिता का तीसरा दौर भी माना जाता है। हिंदी साहित्य में इसे द्विवेदी युग के नाम से भी जाना जाता है कुछ लोग इसे तिलक युग भी कहते हैं। स्वराज्य हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है का नारा देने वाले बाल गंगाधर तिलक ने इस दौर में केसरी और मराठा नामक पत्र निकाले । केसरी का स्वर उग्र था और मराठा का नरम महावीर प्रसाद द्विवेदी ने हिंदी साहित्य और पत्रकारिता का नव निर्माण किया उन्होंने लगभग 20 सालों तक सरस्वती का संपादन किया। इस तरह तिलक और द्विवेदी जी के प्रभाव से हिंदी पत्रकारिता की दिशा में सकारात्मक बदलाव आए। इस दौर के हिंदी केसरी, भारतमित्र, नृसिंह, मारवाड़ी बंधु अभ्युदय, कर्मयोगी, प्रताप, कर्मवीर आदि सभी पत्र देशप्रेम से प्रेरित पत्र थे।


हिंदी पत्रकारिता के विकास का अगला दौर 1920 से शुरु होता है । हिंदी पत्रकारिता के इतिहास में इसे गांधी युग कहा जाता है। गांधी जी कुशल पत्रकार भी थे। उन्होंने यंग इंडिया नवजीवन और हरिजन नामक पत्रों का संपादन किया । गांधी जी ने नवजीवन गुजराती में निकाला। हिंदी में इसका नाम हिंदी नवजीवन था। यह 1921 में प्रकाशित किया गया । हरिजन का नाम हिंदी में हरिजन सेवक था जो 1933 में निकला। इसी तरह यंग इंडिया का हिंदी संस्करण तरुण भारत नाम से हिंदी में निकला। इन पत्रों में विज्ञापन नहीं छपते थे। इन सभी पत्रों ने भारत में सामाजिक चेतना के साथ-साथ राजनीतिक चेतना के विकास में भी अहम भूमिका निभाई।


भारतीय राजनीति में गांधी जी के प्रवेश के साथ ही एक नये युग की शुरूआत हुई और इस प्रकार हिन्दी पत्रकारिता के क्षेत्र में भी एक नए विचार का प्रवेश हुआ। इस युग का कार्यकाल 1920 से 1947 तक का रहा। इसमें कोई दो मत नहीं कि गांधी जी ने अपनी गहरी समझ दृढ़ इच्छा शक्ति सत्याग्रह की अद्भुत क्षमता तथा निःस्वार्थ त्याग के द्वारा अपने युग का कुशल नेतृत्व करके हमारे स्वतंत्रता आंदोलन को एक व्यापक जनाधार दिया। इस कालखण्ड की पत्रकारिता में गांधी जी की अहिंसा का भी प्रमाण यहां देंगें। पत्रकारिता के उग्र तेवरों में सयंम का समावेश होने लगा।


5 सितम्बर, 1920 को बनारस से 'आज' का प्रकाशन शुरू हुआ, जिसे हिन्दी पत्रकारिता के इतिहास में एक युगान्तकारी घटना माना जाता है। पत्र के प्रथम अंक में लिखा गया कि भारत के गौरव की बृद्धि और उसकी राजनैतिक उन्नति 'आज' का विशेष लक्ष्य होगा। आज के प्रकाशन के साथ ही हिन्दी पत्रकारिता में दैनिक पत्रों के प्रकाशन का एक नया युग शुरू हुआ। इसी क्रम में गांधीवादी आदर्शों की स्थापना हेतु कानपुर से 'वर्तमान निकलने लगा। जिसके मुख पृष्ठ पर वन्दे मातरम्' शब्द अंकित रहता था। 23 नवम्बर 1920 से प्रताप का भी दैनिक संस्करण निकलने लगा। इस समय के अधिकांश समाचार पत्रों ने देश को तथा युवकों को असहयोग में शिरकत करने के लिए आमंत्रित किया।


बंगाल विभाजन और जलियांवाला बाग जनसंहार के कारण हिन्दी पत्रकारिता अत्यधिक उग्र हो गई थी किन्तु उन पर बापू के विचारों का इतना व्यापक प्रभाव था कि क्रांतिकारी पत्रों तक ने अहिंसा के प्रति अपनी श्रद्धा कायम रखी। प्रताप जैसे उग्र समाचार पत्र ने सितम्बर 1921 के एक अंक में लिखा कि 'हमारे सिरों पर प्रहार होते हों तो हों। बिजलियां गिरती हों तो गिरें, परन्तु हमारे व्यवहार में न गरमी आए और न कोई शिथिलता ही हम डटे रहें वहीं पर, जहां हम डटे हुए हैं। हमारी दृष्टि रहे उसी लक्ष्य पर जिस पर वह लगी हुई है। प्रहारों की मार से इनमें कोई अंतर न पड़े और अन्त में प्रहारों के करने वाले हाथ में शिथिलता आयेगी और उसके साथ ही निश्चित रूप से आयेगी हमारी अंतिम विजय की सूचना।'







इस दौरान जहां एक ओर समाचार पत्रों का स्वरूप गांधी जी की अहिंसा से मेल खाता था वहीं दूसरी ओर उनका स्वर क्रांतिकारी था। पं० सुन्दर लाल, गणेश शंकर विद्यार्थी, माखनलाल चतुर्वेदी, बालकृष्ण शर्मा 'नवीन' जैसे सम्पादकों ने कान्तिकारी भावनाओं को उद्वेलित करने वाली कवितायें लिखीं। इस समय देश भक्त', 'हम क्रान्ति करेंगे', 'जीवन संग्राम', 'घबराते क्यों हैं', 'विजय', 'मां' जैसे अनेक क्रान्तिकारी शीर्षकों से लेख, सम्पादकीय और कवितायें लिखी गयीं। क्रान्तिकारी गतिविधियों और क्रांतिकारियों के जीवन आदि पर लेख आदि प्रकाशित हुए । 'स्वदेश' का विजय अंक, 'चांद का फांसी अंक प्रभा का झण्डा सत्याग्रह अंक ऐतिहासिक महत्व के हैं।


20वीं सदी के प्रारम्भ में जब समाचार पत्रों की संख्या कुछ अधिक होने लगी और सरकारी प्रतिबंध कड़े होने लगे, तब मिलकर मुकाबला करने के लिए सम्पादकों ने संगठित होने की जरूरत महसूस की। हालांकि इस उद्देश्य से पत्रकारों का पहला संगठन सन् 1894 में 'हिन्दी उद्धरिणी प्रतिनिधि सभा के नाम से बना था, किन्तु इसका सही रूप 1915 में जब आया, जब प्रेस एसोसिएशन ऑफ इंडिया का गठन हुआ। इसके बाद से अनेक संगठन बने तथा सम्पादक सम्मेलनों के भी आयोजन किए जाने लगे। इसका महत्वपूर्ण प्रभाव यह हुआ कि पत्रकार संगठनों के गठन के बाद उनमें एकजुट होकर सरकार से सीधी टक्कर लेने की क्षमता पैदा हुई और इस प्रकार पत्र-पत्रिकाओं का स्वर और अधिक आन्दोलनात्मक हो सका और इससे हिन्दी पत्रकारिता का स्तर ऊँचा उठा तथा उनकी स्वतंत्रता काफी कुछ सीमा तक अपेक्षाकृत सुनिश्चित हुई। निश्चित रूप से इससे उपनिवेशवादी ताकत पर एक अंकुश लगा।


भारत छोड़ो आन्दोलन के समय भी हिन्दी पत्रकारिता ने हालांकि अपने दायित्व को उठाया, किन्तु जबर्दस्त सरकारी प्रतिबंधक नीति ने इसे दबोच लिया। यहां तक कि गांधी जी के पत्र 'हरिजन' की प्रतियां जब्त कर ली गयीं। 'आज', 'प्रताप' जैसे अनेक समाचारपत्रों को अपने प्रकाशन स्थगित करने पड़े। वर्षों तक हिन्दी पत्रकारिता हुकूमत की भारी जंजीरों में जकड़ी रही। फिर भी विश्वविद्यालयों, महाविद्यालयों की पत्रिकाओं के माध्यम से जनता और विशेषकर नवयुवकों और विद्यार्थियों को जागृत रखने का काम जारी रहा। लखनऊ विश्वविद्यालय की पत्रिका के सन् 1942 के अंक में सम्पादक लिखता है वह साहित्यिकार या कलाकार जो अन्याय के विरुद्ध नहीं उठ सकता, वह कला के नाम को दूषित करता है।


सन् 1945 में जब समाचार पत्रों पर से सेंसर हटाया गया, तब पुनः अपनी ऊर्जा के साथ समाज के सामने आए। इसके बाद के पत्रों ने आजाद हिंद फौज पर अनेक महत्वपूर्ण रचनायें प्रकाशित की और इस प्रकार देश को 1947 की सफलता तक पहुंचाने में एक सचेत सैनिक की भूमिका निभाई।