भूमंडलीकरण के दौर में हिंदी पत्रकारिता - Hindi Journalism in the era of Globalization

भूमंडलीकरण के दौर में हिंदी पत्रकारिता - Hindi Journalism in the era of Globalization


भूमंडलीकरण के इस दौर में समाचार पत्रों की प्रस्तुति में ही नहीं सामग्री के स्तर में भी बदलाव आया है। आज ऐसे विषयों पर जोर दिया जा रहा है जो बाजार से प्रभावित हों । यह बात इस ढंग से भी कहीं जा सकती है कि विज्ञापन से प्रेरित समाचार ज्यादा प्रमुखता से छपते हैं। समाचार को बेचने की होड़ ज्यादा है इसीलिए जो बिकता है वह दिखता है। समाचार पत्रों के लिए विज्ञापन धन कमाने का साधन है और इसे प्राप्त करने के लिए वे कोई भी हथकंडा अपनाने के लिए तैयार हैं। फिर चाहे वह किसी उत्पाद की प्रशंसा में लिखी खबर हो या फिर फीचर कंपनियां इसी बात का फायदा उठाती है। पेड न्यूज यानी पैसा देकर न्यूज छपवाना आम बात होती जा रही है। यही नहीं देश के सबसे प्रतिष्ठित अखबारों में अब एडिट स्पेस तक का भी दाम लगाया जाने लगा है।


अखबारों में स्थानीय संस्करणों की मांग इतनी बढ़ गई है कि एक जिले की खबर दूसरे जिले में नहीं दिखाई देती है। इससे अखबारों की व्यापकता कम हो गई है। यह समय प्रिंट पत्रकारिता के लिए सावधान होने का भी है क्योंकि अधिकांश खबरें अब लाइव होने लगी हैं। ऐसे समय में वही अखबार टिक सकेगा जिसका विचारपक्ष महत्वपूर्ण होगा। मोबाइल में भी रेडियो की सुविधा आ जाने से खबरे प्राप्त करने के माध्यम बढ़ गए हैं। ब्लाग के जरिए भी समाचार दिए जा रहे हैं। हिंदी के ब्लाग भी हिंदी पत्रकारिता में क्रांति ला सकते हैं । वह भी अब बाजार की रणनीति को समझ रहे हैं और ब्लाग के जरिए विज्ञापन जुटाना बहुत कठिन नहीं रह गया है। बहुत सारे ब्लागों को विज्ञापन मिल भी रहे हैं।


भूमंडलीकरण में अंतर्विरोध निहित हैं। भूमंडलीकरण सबसे पहले आजादी और आत्मनिर्भरता को छीनता है। लोकतंत्र को समाप्त करता है। परिणाम यह होता है कि इच्छाओं का वस्तुकरण होने लगता है। जीवनशैली, खानपान, प्रतीकों और चिन्हों के जरिए हम बाजार को पाठकों के सामने लाते हैं न कि समस्याओं को । पहले जितने भी समाचार पत्र निकले, वह प्रजा के हितों के लिए निकाले गए पर आज बाजार में मौजूद सामान को बेचने के लिए निकाले जा रहे हैं। आज के समय में फैशन, लाइफस्टाइल, फूड, ट्रेवल, ब्यूटी जैसे विषय प्रमुखता से छपते हैं और सामाजिक सरोकार से जुड़ी खबरों के लिए एक कालम भी जगह नहीं होती। संवाददाताओं को भी विज्ञापन लाने के लिए कहा जाता है। एक वह समय था जब गांधी जी के किसी भी अखबार में चाहे वह हिंदी में हो या अंग्रेजी में कोई विज्ञापन नहीं छपता था और आज विज्ञापन के अखबार कुछ भी करने को तैयार हैं। कभी विज्ञापन के दबाव में खबरें हटा दी जाती है तो कभी विज्ञापन के लिए पृष्ठ संख्या भी बढ़ा दी जाती है या फिर लेख हटा दिए जाते हैं। संपादन और लेखन की जानकारी न होते हुए भी समाचार पत्र के मालिक संपादक बन जाते हैं। जैसे-जैसे कमाई बढ़ रही है हर कोई अखबार निकालना चाहता है क्योंकि यह मुनाफे का सौदा भी साबित हो रहा है और सत्ता को प्रभावित तथा नियंत्रित करने का भी।