भारत मे यूरोपियों का आगमन का इतिहास - History of the arrival of Europeans in India
भारत मे यूरोपियों का आगमन का इतिहास - History of the arrival of Europeans in India
सन 1453 में तुर्की द्वारा कुस्तुनतूनिया जीत लेने के कारण यूरोप के साथ भारत का व्यापारिक मार्ग अवरुद्ध हो गया । अब यूरोप के लोगों को पूर्व का माल मिलना दुर्लभ हो गया । पूर्व के मसाले और कपड़ा यूरोप के लिए विशेष आकर्षण का केंद्र थे । अतः यूरोपीय व्यापारियों ने भारत के साथ व्यापार करने के लिए नवीन जल मार्ग की खोज करने का निश्चय किया । इस प्रकार तुर्क सता के अभ्युदय ने यूरोपीयों को एक महान साहसिक कार्य करने की प्रेरणा दी । डाक्टर ईश्वरी प्रसाद के अनुसार "तुर्क साम्राज्य के उत्थान के साथ 15 वीं शताब्दी में व्यापारिक मार्गों पर तुर्की का अधिकार हो गया । पूर्वी व्यापार अवरुद्ध हो गया | प्राचीन मार्गों के बंद हो जाने से नए मार्गों की खोज को भारी महता प्राप्त हुई । 14 वीं तथा 15 वीं शताब्दी में यूरोप के पुनर्जागरण ने वाणिज्यवाद या समुद्री व्यापार को प्रोत्साहित किया। इस समय के आविष्कारों, मुख्यरूप से दिग्दर्शक यंत्र की सहायता से इटली, स्पेन तथा पुर्तगाल के व्यापारियों ने नए समुद्री मार्गों की खोज की, जिससे भारत तथा एशिया से सीधा सम्पर्क तथा व्यापार संभव हो सका
पुर्तगाली व्यापारियों का भारत में आगमन
1488 ई. में अफ्रीकी महादवीप के दक्षिणी किनारे केप ऑफ गुड होप तक पहुँच गया | वहाँ से वास्कोडिगामा 1497 ई. में मालिन्दी तक तथा 1498 ई. में एक अरब व्यापारी की सहायता से कालीकट तक पहुंचा। जब उससे उसके आने का उद्देश्य पूछा गया तो उसने उत्तर दिया कि वह भारत में इसाई धर्म के प्रचार तथा गर्म मसालों के व्यापार के लिए आया है । इस प्रकार 1498 में, इस नए समुद्री मार्ग की खोज का श्रेय वास्कोडिगामा को जाता है ।
वास्कोडिगामा की इस सफलता से उत्साहित होकर पुर्तगाल ने कैबाल को 13 जहाजों के एक अन्य बेड़े के साथ अगले ही वर्ष भारत भेजा | कैवाल 1500 ई. में कालीकट पहुंचा । कूटनीति में कैब्राल, वास्कोडिगामा कि बराबरी न कर सका और शीघ्र ही कालीकट के हिन्दू शासक जमोरिन के साथ उसका मनमुटाव हो गया ।
इस आंशिक असफलता के कारण कैबाल के स्थान पर वास्कोडिगामा को एक बार फिर भारत भेजा गया | 1502 में जब वह भारत आया तब तक पुर्तगालियों ने यह महसूस कर लिया था कि भारतीय व्यापार में उनका हित तभी सुरक्षित हो सकता है जब अरब व्यापारियों को भारतीय व्यापार से निकाला जाए
1504 में पुर्तगाल से अल्मोडा को विधिवत रूप में
वाइसराय नियुक्त करके भेजा गया ।
अल्मोड़ा ने भारत में पुर्तगाली राज्य स्थापित करने कि दिशा में विशेष योगदान दिया परन्तु भारत में पुर्तगाल के व्यापार को आगे बढ़ाने तथा स्थायी रूप से फैक्ट्रियों को स्थापित करने का श्रेय अल्फान्सो डी अल्बुकर्क (1509-1555) को प्राप्त हुआ।
1510 में उसने बीजापुर के युसूफ आदिलशाह से गोवा जीत
लिया। 1511 में पूर्वी एशिया में मलक्का पर अधिकार कर लिया 1512
में बीजापुर राज्य से बानासेरिय का किला जीता। 1515 ई. में फारस की खाड़ी में व्यापारिक अड्डे आर्मुज पैर अधिकार कर लिया।
अफ्रीका में सोक्रोवा तथा लंका में कोलम्बो पर भी अधिकार किया। गुजरात के दिय पर
पुर्तगालियों का अधिकार हो गया। अलबुकर्क ने गोवा को अपनी राजधानी बनायाँ तथा वहाँ
वाणिज्यिक गतिविधियों को तेज किया।
पुर्तगालियों की असफलता के कारण
निश्चित रूप से पुर्तगाली असफलता का मुख्य कारण समुद्र पर उनका
नियंत्रण कमजोर होना था। लेकिन इसके साथ कुछ और कारण भी थे जिन्होंने मिलकर
पुर्तगाली पतन को अवस्यंभावी बना दिया। वास्कोडिगामा तथा अल्बुकर्क के जैसे
दुर्दशी एवं कूटनीतिज्ञ व्यक्तित्व का अभाव उनके उतराधिकारियों में साफ दिखाई दे
रहा था। पुर्तगाली बाद के समय में व्यापार तथा शासन के प्रति उदासीन हो गए थे। धन
बटोरने के लालच में पुर्तगाली व्यापारियों और प्रशासकों को प्रशासन तथा न्याय के
प्रति उदासीन बना दिया था। भारतीयों को पुर्तगालियों के प्रति घृणा भी उनके पतन का
एक कारण सिद्ध हुई। अधिक धन का लालच क्रूरता की नीति तथा प्रशासन के प्रति
उदासीनता ने उनकी शक्ति को सीमित कर दिया।
पुर्तगाली शासन का प्रभाव
यद्धपि, पुर्तगाली भारत में अपना साम्राज्य स्थापित करने में
असफल रहे फिर भी उनके शासन ने आधुनिक भारतीय इतिहास में अपनी गहरी छाप छोड़ी है।
पुर्तगालियों ने ही अन्य यूरोपीय शक्तियों को भारत में प्रवेश करने का मार्ग
दिखाया। पुर्तगाली भारत में युद्ध की एक नयी तकनीक ले कर आए थे। उनके द्वारा
बंदूकों के इस्तेमाल ने भारतीय शासकों को भी इस दिशा में पहल करने के लिए उत्साहित
किया। नये व्यापारिक मार्ग खुलने से भारतीय उत्पाद अब अफ्रीका तथा ब्राजील तक
पहुँचने लगा था। व्यापारिक मार्ग को समुद्री लुटेरों से सुरक्षित रखने में भी
पुर्तगालियों का महत्वपूर्ण योगदान है। नई भौगोलिक खोजों में दिलचस्पी रखने के
कारण पुर्तगालियों ने मानव ज्ञान को बढ़ावा दिया। कुछ सामाजिक कुरीतियों को भी
समाप्त करने के लिए पुर्तगालियों ने पहल की । पुर्तगालियों द्वारा बड़े पैमाने पर
भारतीय महिलायों से वैवाहिक संबंध स्थापित करने से सती जैसी सामाजिक बुराई को कम
करने में थोड़ा मदद मिली। ऐतिहासिक एवं भौगोलिक साहित्यों की रचना पुर्तगालियों का
एक महान योगदान था |
डचों का आगमन
1580 में पुर्तगाल पर स्पेन का कब्जा हो जाने के कारण
डच व्यापारियों के लिए लिस्बन का द्वार हमेशा के लिए बन्द हो गया। व्यापार की इन
आवश्यकताओं ने एक नए राजनैतिक समीकरण को जन्म दिया। अब इन व्यापारियों ने सीधे
व्यापार करने के नीति अपनाई डच व्यापारियों को यह लगने लगा कि जब तक पुर्तगालियों
के समुद्री शक्ति एवं अधिपत्य को समाप्त नहीं किया जाएगा, भारत
द्वारा गर्म मसालों की आपूर्ति संभव नहीं है। इस पर्यटक लॉस कूटिन पुर्तगालियों के
संपर्क में रह चुका था तथा उसे भारत के व्यापार की पर्याप्त जानकारी थी। उसने एक
योजना बनाई जिसके अनुसार 1595 में हाउटमन एक व्यापारिक बेड़ा
लेकर इन्डोनेशिया के बैटम क्षेत्र में पहुंचा। यहाँ पुर्तगालियों के दद्वारा
व्यापार तो किया जा रहा था लेकिन सैनिक दृष्टि से वे मजबूत नहीं थे। जल्द ही डचों
ने उस पर अपना अधिकार जमा लिया 1602 में बानीवेल्ट ने कई
छोटी कम्पनियों को मिलाकर एक यूनाइटेड डच ईस्ट इण्डिया कम्पनी की स्थापना की जिसे
इच शासन द्वारा व्यापार करने का अधिकार प्रदान किया गया। जल्द ही डयों ने न केवल
मलक्का तथा इन्डोनेशिया बल्कि भारत के पुलिकट पर भी अपना कब्जा जमा लिया। 1636
में इच व्यापारियों ने मालाबार तथा सीलोन के कालीमिर्च तथा इलाइची
के व्यापार पर एकाधिकार करने के उद्देश्य से पुर्तगालियों के व्यापारिक अड्डों पर
आक्रमण करना आरंभ कर दिया।
1661 में इचो द्वारा पुर्तगाली व्यापारियों से मालाबार
छीन लिया गया। शीघ्र ही गोवा, दमन एवं दीयु छोड़कर पुर्तगालियों
के अधीन शेष सभी भाग डचों के अधिकार में आ गए।
डचों की असफलता के कारण
इचों कि व्यापारिक दिलचस्पी दक्षिण पूर्वी एशिया के स्पाइस आइलैंड
में थी न कि भारत कि मुख्य भूमि में बगैर राजनैतिक सत्ता की स्थापना के व्यापारिक
एकाधिकार सम्भव नहीं था। डच मुख्य रूप से व्यापारी ही बने रहे, इसलिए वे
भारत में बहुत अधिक दिनों तक नहीं टिक सके। असफलता का दूसरा कारण कम्पनी और डच
शासन का संबंध था। डच व्यापारिक कम्पनी कभी भी स्वतंत्र रूप से कार्य नहीं करती थी
बल्कि इस पर सरकार का सीधा नियंत्रण था। तीसरा कारण ब्रिटिश नौसैनिक शक्ति का डच
नौसैनिक शक्ति से अधिक मजबूत होना था। चौथा, यूरोपिय राजनीति
के बदलते समीकरण तथा फ्रांस और इंग्लैंड से लगातार होने वाले युद्धों ने डचों को न
केवल आर्थिक रूप से बल्कि सैनिक शक्ति के रूप में भी कमजोर कर दिया था।
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