अंग्रेज और मराठे की इतिहास - History of British and Maratha
अंग्रेज और मराठे की इतिहास - History of British and Maratha
यह एक ऐतिहासिक संयोग है कि सतरहवीं सदी में जिस समय भारत में मुगल साम्राज्य अपने चरमोत्कर्ष पर था, ठीक उसी समय ब्रिटिश ईस्ट इण्डिया कम्पनी तथा मराठे क्रमशः आर्थिक एवं राजनीतिक महत्वाकांक्षा की पूर्ति के लिए प्रयासरत थे। शिवाजी के नेतृत्व में मराठा शक्ति दक्षिण में स्थापित हुई। वहीं अन्य यूरोपीय कंपनियों की प्रतिस्पर्धा में अंग्रेज अपनी सर्वोच्चता स्थापित करने लगे। अठारहवीं सदी में मुगल साम्राज्य के विखण्डन के साथ भारतीय परिदृश्य परिवर्तित हुआ और परिवर्तन का असर यूरोपीय तथा भारतीय शक्तियों पर पड़ने लगा। अंग्रेज सर्वोच्च यूरोपीय शक्ति के रूप में स्थापित हुए जबकि मुगलों के प्रबल उत्तराधिकारी के रूप में मराठे इस परिस्थिति में ब्रिटिश ईस्ट इण्डिया का स्वरूप आर्थिक से राजनीतिक हो गया। अतः दोनों में संघर्ष अपरिहार्य था। मराठे शक्तिशाली थे। परन्तु अंग्रेज कूटनीति में काफी आगे। यही कारण है कि मराठा क्षेत्र से दूर बंगाल में उन्होंने अपना केन्द्र बिन्दु बनाया। 1761 ई० में पानीपत के तृतीय युद्ध में मराठों की पराजय ने यह प्रमाणित कर दिया कि मुगलों के उत्तराधिकारी मराठे नहीं हो सकते। इस बीच अंग्रेजों ने फ्रांसीसियों का सफाया तथा बंगाल में अपनी स्थिति मजबूत कर ली। बंगाल के बाद दक्षिण में अपनी शक्ति के विस्तार में अंग्रेजों और मराठों की बीच तीन संघर्ष युद्ध हुए और अंततः अंग्रेजों की सर्वोच्चता स्थापित। हुआ।
उद्देश्य
इस इकाई का उद्देश्य आपको भारत में ब्रिटिश सत्ता के विस्तार से अवगत कराना। है। इस औपनिवेशिक विस्तार के क्रम में दक्षिण में किस प्रकार अंग्रेज एवं मराठों के मध्य युद्ध की परिस्थितियां उभरीं तथा अंततः अंग्रेज कैसे विजयी हुए ? इन के समाधान आप इस इकाई के अंतर्गत खोज पाएंगे। इस इकाई के अध्ययन के उपरान्त आप अग्रांकित के विषय में विशेष जानकारी प्राप्त कर सकेंगे
•अठारहवीं सदी में भारत में अंग्रेज तथा मराठों की स्थिति।
• अंग्रेज एवं मराठों के मध्य शक्ति परीक्षण | "मराठों की पराजय एवं अंग्रेजों की जीत "मराठों की असफलता के कारण।
•ब्रिटिश सर्वोच्चता की स्थापना |
• वेलेजली की सहायक संधि । प्रश्नों
अंग्रेज एवं मराठे
भारत में व्यापार के उद्देश्य से आए यूरोपीयन के मध्य प्रतिस्पर्धा
आरंभ से थी, परन्तु भारत मैं मुगल साम्राज्य के शक्तिशाली होने
के कारण यह प्रतिस्पर्धा उग्र नहीं हो सकी। अठारहवीं सदी का आरंभ भारतीय इतिहास के
लिए कई मायनों में महत्वपूर्ण है। एक तरफ पतनशील) मुगल साम्राज्य ने महत्वाकांक्षी
भारतीय क्षेत्रीय शक्तियों को उभरने का अवसर प्रदान किया। वहीं दूसरी तरफ यूरोपीय
कम्पनियां भारतीय शक्तियों के नियंत्रण से मुक्त होने का प्रयत्न करने लगी। इसी
क्रम में दक्कन से उभरे मराठा राज्य ने साम्राज्य का सपना देखना प्रारंभ किया।
जबकि अंग्रेजों ने यूरोपीय शक्तियों को परास्त कर भारतीय शक्तियों पर नियंत्रण
प्रारंभ किया। बंगाल में पलासी एवं बक्सर के युद्ध के पश्चात अपनी स्थिति मजबूत कर
अंग्रेजों ने दक्कन पर अपना ध्यान केन्द्रित किया और मराठों से संघर्ष प्रारंभ
हुआ।
अठारहवीं सदी में ब्रिटिश ईस्ट इण्डिया कम्पनी
भारत में व्यापार के उद्देश्य से अंग्रेजों ने ब्रिटिश ईस्ट इण्डिया
कम्पनी की स्थापना की थी। धीरे धीरे इस कम्पनी ने अन्य यूरोपीय कम्पनियों को पीछे
छोड़ दिया। पूर्तगालियों को डचों ने परास्त किया और अम्बोयना हत्याकाण्ड के पश्चात
डचों एवं अंग्रेजों के मध्य हुए समझौते के परिणामस्वरूप भारत में अंग्रेजों को
बर्चस्व स्थापित करने का अवसर मिला जिसका सदुपयोग अंग्रेजों ने किया। भारत में
तीव्र गति से उभरे फ्रांसीसियों कंपनी से तीन कर्नाटक युद्ध 1740 से 1763
ई0 के बीच हुए और ब्रिटिश ईस्ट इण्डिया कम्पनी
के समक्ष फ्रांसीसियों ने सदा के लिए हथियार डाल दिए ।
इसी बीच भारत की राजनीतिक शून्यता एवं अराजकता का लाभ उठाने की सोची
समझी कोशिश ब्रिटिश ईस्ट इण्डिया कम्पनी ने की। भारत में अपनी शक्ति विस्तार के
लिए अंग्रेजों ने बंगाल को अपना मुख्यालय बनाना शुरू किया क्योंकि यह स्थान भारत
पर हो रहे अफगान आक्रमण से सुरक्षित होने के साथ भारत में उभर रहे मराठा शक्ति के
केन्द्र से भी दूर था।
1757 ई० की पलासी के लड़ाई तथा 1764 ई0 के बक्सर युद्ध के पश्चात बंगाल पर अंग्रेजों का
अधिकार स्थापित हो गया। तत्पश्चात् उन्होंने अपने सबसे प्रमुख शत्रु राज्य मैसूर
पर ध्यान केन्द्रित किया और मराठों से मित्रता स्थापित की। अब अंग्रेज उस अवसर की
तलाश में थे। जब मराठों पर आक्रमण करने या युद्ध थोपने का मौका मिले। इस प्रकार
अंग्रेज-मराठा संबंध मित्रता की कहानी बयाँ करता है।
अठारहवीं सदी में मराठा शक्ति
1713 ई० में बाला जी विश्वनाथ ने ताराबाई के समर्थकों
को अंतिम रूप से परास्त करते हुए शाह की सत्ता स्थापित की। परन्तु अब मराठा शक्ति
धीरे धीरे पेशवा के हाथ में सिमटने लगी। बाला जी ने उत्तर भारत की राजनीति में दखल
देना प्रारंभ किया। इस प्रकार मराठा शक्ति अखिल भारतीय शक्ति के रूप में उभरने
लगी।
बालाजी की मृत्यु (1720 ई0) के पश्चात उसका पुत्र
बाजीराव प्रथम पेशवा बना। इस प्रकार पेशवा पटू वंशानुगत हो गया। बाजीराव प्रथम (1720
1740 ई०) में हिन्दु पाद पादशाही के सिद्धान्त का प्रतिपादन किया
तथा अपने अल्पकाल में ही मराठा शक्ति को क्षेत्रीय से अखिल भारतीय बना दिया। उसने
कोल्हापुर स्थित शाह के प्रतिद्वन्दी को सदा के लिए दबा दिया। जागीर प्रणाली को
पूर्नजीवित किया जिसके परिणामस्वरूप नागपुर में भोसले, बड़ौदा
में गायकवाड, ग्वालियर में सिंधिया तथा इन्दौर में होल्कर
घराने स्थापित हुए। मराठा साम्राज्य इस समय सिंघ के अटॉक से उड़ीसा के कटक तक फैला
था।
बाजीराव की मृत्यु के पश्चात बालाजी बाजीराव ( 4740 1761 ई0)
पेशवा बना। उसने उत्तर भारत में हस्तक्षेप एवं प्रसार की नीति जारी
रखी। उसने गुजरात, मालवा, बुंदेलखण्ड
तथा राजपूताना पर अपनी पकड़ और मजबूत की शाहु की मृत्यु (1740ई0) के पश्चात उसने पूना को अपना मुख्यालय बनाया। 1751
ई० में बंगाल से उड़सा प्राप्त किया तथा उसने 1757 ई० में सिंधखेड तथा 1760 ई० में उदगीर में निजाम को
पराजित किया तथा मैसूर के वास्तविक शासक हैदर अली को कर देने के लिए बाध्य किया।
उसने सफलतापूर्वक मुगल दरबार में हस्तक्षेप करते हुए डूमाद-उल-मुल्क को वजीर
नियुक्त कराया तथा पंजाब से चौथ एवं सरदेशमुखी का अधिकार प्राप्त किया।
इसी समय उत्तर भारत पर अहमद शाह अब्दाली के आक्रमण हो रहे थे। पंजाब
के कारण अब्दाली तथा मराठों में तनाव बढ़ा और परिणाम हुआ पानीपत की तीसरी लड़ाई 1761 ई0। इस युद्ध में मराठों की बुरी हार हुई तथा पेशवा पद का नामित उतराधिकारी
एवं बालाजी बाजीराव का पुत्र विश्वास राव मारा गया। इस सदमे के कारण बालाजी
बाजीराव की मृत्यु 1761 ई० में हो गई। इस प्रकार मराठा शक्ति
पर काले बादल मंडराने लगे और भारत का भविष्य भी अंधेरे में।
प्रथम आंग्ल मराठा युद्ध
बंगाल में अपनी सत्ता स्थापित करने के पश्चात अंग्रेजों ने अपना
ध्यान दक्षिण भारत पर केन्द्रित किया तथा सबसे प्रमुख शत्रु मैसूर के साथ संघर्ष
प्रारंभ किया। उन्होंने मराठों से मित्रता स्थापित की। परन्तु शीघ्र ही उन्हें
मराठों से संघर्ष का बहाना मिल गया और 1775 ई० में प्रथम आंग्ल-मराठा
युद्ध प्रारंभ हो गया।
प्रथम आंग्ल मराठा युद्ध के कारण
प्रथम आंग्ल मराठा युद्ध का मूल कारण अंग्रेज तथा मराठा
साम्राज्यवादी महत्वाकांक्षा के बीच टकराव था। मुगल साम्राज्य के विखण्डन के
पश्चात भारत में जिन क्षेत्रीय शक्तियों का उद्भव हुआ उसमें मराठे सबसे प्रमुख थे।
आंग्ल मराठा युद्ध का तात्कालिक कारण मराठों की आपसी फूट थी। 1772 ई०
में पेशवा माधवराव की मृत्यु हो गई। माधवराव का भाई नारायन राव नयी पेशवा बना,
परन्तु उसका चाचा रघुनाथ राव स्वयं पेशवा बनना चाहता था। इसलिए उसने
षड्यंत्र प्रारंभ किया। नाना फड़नवीस रघुनाथ राव के प्रबल विरोधी थे। 1773 ई० में नारायन राव की हत्या कर दी गई और रघुनाथ राव पेशवा बन गया। नाना
फड़नवीस के नेतृत्व में अन्य मराठा सरदार भी रघुनाथ राव का विरोध कर रहे थे। रघुनाथ
राव का दुर्भाग्य था कि नारायण राव के मरणोपरान्त उसकी पत्नी गंगा बाई ने पुत्र को
जन्म दिया। नाना फड़नवीस के गुट ने नारायन राव के पुत्र को माधवराव नारायन के नाम
से पेशवा घोषित कर दिया। रघुनाथ राव ने हताश एवं निराश होकर बाम्बे स्थित
अंग्रेजों से सहायता की अपील की। इस प्रकार अंग्रेजों को चीर प्रशिक्षित अवसर मिला
और उन्होंने मराठा राजनीति में दखल दी। अतः भारत के अन्य क्षेत्रों की तरह मराठों
की आपसी कलह भी आंग्ल मराठा संघर्ष का कारण बनी।
आंग्ल मराठा युद्ध (1775-82 ई0)
रघुनाथ राव द्वारा ब्रिटिश सहायता हेतु आग्रह किया गया क्योंकि इस
समय बाम्बे स्थित अंग्रेज मराठों के मित्र थे। परन्तु अंग्रेजों की निगाहें बाम्बे
के आस-पास तटीय क्षेत्रों पर थी जिन्हें प्राप्त करने के उद्देश्य से अंग्रेजों ने
संघर्ष प्रारंभ किया। रघुनाथ राव की अपील पर अंग्रेजों ने 7 मार्च 1775
ई० को सूरत की संधि की।
संधि की शर्तों के अनुरूप कर्नल कीटींग के नेतृत्व में ब्रिटिश तथा
रघुनाथ राव की सेना ने पूना की ओर प्रस्थान किया। मराठों एवं रघुनाथ रॉव तथा
अंग्रेजों की संयुक्त सेना के मध्य पहली लड़ाई मई 1775 ई० में अरास के मैदान पर हुई
जिसमें मराठों की हार हुई। रघुनाथ राव को पेशवा घोषित कर दिया गया। इसी बीच
कलकत्ता स्थित सर्वोच्च परिषद ने सूरत की संधि को अस्वीकार कर दिया। उसने पूना
स्थित मराठा शक्ति से मार्च 1776 ई0 में
पूरंधर की संधि की। इस संधि के द्वारा सूरत की संधि को समाप्त कर दिया गया। नाना
फडनवीस इस समय शक्तिशाली एवं महत्वाकांक्षी हो गए थे। अंग्रेजों के मन में
फ्रांसीसियों की मनसा पर संदेह होने लगा। निदेशक मण्डल ने बाम्बे परिषद की नीति का
समर्थन किया तथा उसकी सहायतार्थ कर्नल एंगरटन के नेतृत्व में एक अतिरिक्त टूकड़ी
बाम्बे भेजी। इस प्रकार पुनः अंग्रेज एवं मराठों के बीचयुद्ध प्रारंभ हो गया।
पश्चिमी घाट पर तैलगांव में मराठों की विशाल सेना के साथ युद्ध हुआ। इस युद्ध में
अंग्रेज बुरी तरह परास्त हुए। परिणामस्वरूप अंग्रेज एवं मराठों को मध्ये वाईगांव
का समझौता (1779 ई0) हुआ। इस समझौते के
द्वारा 1773 ई० के पश्चात अधिकृत सभी क्षेत्रों से अंग्रेजों
हो हाथ धोना पड़ा। कर्नल गोडार्ड ने 1780 ई0 के आरंभ में अहमदाबाद तथा बसीन पर अधिकार कर लिया। इसी बीच कलकता से आए
कप्तान पोफन ने सिंधिया के दुश्मन गोहद के राणा की सहायता की तथा अगस्त 1781
ई० में सिंधिया के मुख्यालय ग्वालियर पर अधिकार कर लिया।
दूसरी तरफ जनरल कॉमक ने भी सिधिया को सिप्री में पराजित किया। महादजी
सिंधिया ने राजनीतिक अदूरदर्शिता तथा स्वार्थी व्यक्तित्व का परिचय देते हुए
मराठों की ओर से 17 मई 1782 ई० को सालंबई की संधि
कर ली एवं प्रथम आंग्ल मराठा युद्ध समाप्त हुआ। इस संधि को नाना फड़नवीस ने 1783
ई0 के आरंभ में ढंग से स्वीकृति प्रदान की।
प्रथम आंग्ल मराठा युद्ध के परिणाम -
इस प्रकार प्रथम आंग्ल मराठा युद्ध 1782 ई० में सालबई की संधि से समाप्त हुआ। इस संधि के प्रावधान निम्नांकित थे
1. अंग्रेजों के पास सलसीट चला गया।
2. माधव राव नारायन को पेशवा मान लिया गया।
3. रघोबा को पेंशन देकर अंग्रेजों ने उनका साथ छोड़ दिया।
4.यमुना नदी के पश्चिम का सम्पूर्ण विजीत प्रदेश अंग्रेजों ने सिंधिया को लौटा दिया।
5.हैदर से उन क्षेत्रों को वापस लिया जाएगा जिन पर अरकॉट का अधिकार था।
6.अंग्रेज एवं मराठे एक दूसरे के मित्र रहेंगे।
इस संधि पर अंग्रेजों की पक्ष से एण्डरसन ने हस्ताक्षर किए थे। प्रथम
आंग्ल मराठा युद्ध में अंग्रेजों को मराठा राज्य की कमजोरी का ज्ञान हुआ। मराठों
से मित्रता हुई जो अंग्रेजों के लिए लाभदायक रहा। अंग्रेजों ने इसका लाभ उठाकर
मैसूर को कुचल दिया तथा स्वयं को पहले से शक्तिशाली बना लिया। इसलिए यह युद्ध
बराबरी का नजर आने के बावजूद मराठी के लिए घातक तथा अंग्रेजों के लिए फायदेमंद
रहा।
द्वितीय आंग्ल - मराठा युद्ध (1803-06 ई0 )
सालबाई की संधि से प्रथम आंग्ल मराठा युद्ध समाप्त हुआ था। परन्तु यह
एक युद्ध विराम था क्योंकि दक्कन में सर्वोच्चता एक के लिए प्रारंभ आंग्ल ब्रिटिश
संघर्ष का निर्णय होना आवश्यक था। मैसूर पर अन्ततः अधिकार स्थापित करने के पश्चात
अंग्रेज इस अवसर की तलाश में थे जब सालबई की संधि तोड़े बिना मराठों से युद्ध
प्रारंभ हो और 1803 ई० में यह अवसर उन्हें उस समय प्राप्त हुआ जब
पेशवा ने उनसे सहायता मांगी।
द्वितीय आंग्ल मराठा युद्ध के कारण
द्वितीय आंग्ल मराठा युद्ध का मूल कारण ब्रिटिश साम्राज्यवादी नीति
थी। अठारहवीं सदी में भारतीय राजनीतिक अस्थिरता तथा आपसी फूट का फायदा उठाकर
अंग्रेजों ने साम्राज्य निर्माण प्रारंभ किया और तो गति से बंगाल, मैसूर,
आदि क्षेत्रों पर अधिकार कर लिया। दक्कन में मराठा साम्राज्य सबसे
बड़ा एवं शक्तिशाली था। अतः भारत में ब्रिटिश साम्राज्य स्थापित करने के लिए मराठों
को हराना आवश्यक था। इसलिए आंग्ल मराठा संघर्ष अपरिहार्य था। दूसरा कारण यूरोपीय
राजनीति थी फ्रांसीसी खतरे को टालने के लिए पश्चिम तट पर ब्रिटिश अधिकार आवश्यक
था। परन्तु द्वितीय आंग्ल मराठा युद्ध का तात्कालिक एवं मुख्य कारण स्वयं मराठा
राजनीति थी। 1795 ई० में खादों में निजाम के विरुद्ध मराठे
संगठित होकर लड़े, लेकिन यह आखिरी मौका था। इसके बाद कभी भी
मराठा सरदार एक साथ नहीं दिखे। नया पेशवा बाजीराव द्वितीय मराठा सरदारों को ही आपस
में लड़ाकर अपनी स्थिति ठीक रखना चाहता था। पूना में मुख्यमंत्री नाना फडनवीस के
कारण पेशवा नियंत्रण में रहा। 1800 ई० में नाना की मृत्यु के
साथ ही पेशवा उन्मुक्त हो गया।
माना के साथ ही मराठों की बुद्धिमत्ता तथा दूरदर्शिता समाप्त हो गई।
अब मराठा सरदार पूना पर वर्चस्व के लिए आपस में लड़ने लगे। इस प्रतिस्पर्धा में
दौलतराव सिंधिया तथा जसवन्त राव होल्कर सबसे आगे थे। जसवन्त राव होल्कर ने रधोबा
के दत्तक पुत्र अमृत राव के पुत्र विनायक राव को पेशवा के मसनद पर आसीन कर दिया
तथा बाजीराव द्वितीय को पदच्युत कर दिया। हताश निराश बाजी राव द्वितीय 1802 ई० को
भागकर अंग्रेजों के पास गया तथा 31 दिसम्बर को बझीन की संधि
की जो द्वितीय आंग्ल मराठा युद्ध का तात्कालिक कारण साबित हुआ।
बसीन की संधि के प्रावधान
1. अंग्रेजी सेना की एक टूकड़ी जिसकी संख्या 6000 से कम नहीं होगी, पेशवा के क्षेत्र में रखी जाएगी।
2. इस सेना के रख दिया गया। रखाव हेतु 26 लाख रुपये के राजस्व वाला क्षेत्र अंग्रेजों को दे
3. अंग्रेजों के शत्रु किसी भी यूरोपीय को पेशवा अपने दरबार या क्षेत्र में अंग्रेजों की अनुमति के बिना किसी भी प्रकार की गतिविधियों की छूट नहीं देगा।
4. मराठों की आपसी तथा अन्य भारतीय शक्तियों के झगड़े में मध्यस्थता कम्पनी करेगी।
5.सूरत शहर अंग्रेजों को दे दिया गया।
6.पेशवा ने निजाम के क्षेत्र से चौथ का दावा छोड़ दिया।
7. इस सबके बदले कम्पनी बाजीराव द्वितीय को पेशवा की
मसनद पर आसीन कराएगी।
इस प्रकार इस संधि ने अंग्रेजों को मराठा क्षेत्र में दखल देने का
मौका दिया।
द्वितीय आंग्ल - मराठा युद्ध (13 मई 1803 ई0-1806 ई0)
बसीन की संधि के पश्चात अंग्रेजों ने युद्ध को वृहद् योजना तैयार कर ली। मराठा क्षेत्र पर चौतरफा आक्रमण की योजना बनाई गई। देक्कन सेना का नेतृत्व आर्थर वेलेजली, उत्तर भारतीय सेना का नेतृत्व जनरल लेक तथा पश्चिमी सेना का नेतृत्व कर्नल मूरे को दिया गया। इसके अलावा गुजरात, उड़ीसा तथा बुंदेलखण्ड में सहायक टुकड़ियां स्थापित की गई।
वास्तविक युद्ध 1803 ईए के आरंभ से शुरू हुआ। मराठा सेना प्रथम
दृष्टया काफी विशाल थी, जिसकी संख्या 2.5 लाख के आस पास थी। इसमें 40,000 सैनिक फ्रांसीसियों
द्वारा प्रशिक्षित थे। युद्ध आरंभ होने से पहले ही फ्रांसीसी मराठों से अलग हो गए।
दक्कन से मुख्य सेना का नेतृत्व करते हुए आर्थर वेलेजली ने अहमदनगर पर अधिकार कर
लिया। तत्पश्चात् औरंगाबाद के समीप असाय के युद्ध में उसने सिंधिया और भोंसले की
संयुक्त सेना को बुरी तरह परास्त किया।
जनरल लेक ने दिल्ली और आगरा पर 1803 ई0 में
ही अधिकार कर लिया। सिंधिया की सेना को पहले दिल्ली के युद्ध और फिर अलवर के समीप
लसवाड़ी के युद्ध में परास्त किया। बुंदेलखण्ड गुजरात तथा उड़ीसा में भी अंग्रेजों
की जीत हुई। इस प्रकार युद्ध प्रारंभ होने के लगभग छः माह के अन्दर ही सिंधिया तथा
भौसले को कई बार हार का सामना करना पड़ा और अंग्रेजों के साथ संधि करनी पड़ी। 17
दिसंबर 1803 ई० को भोसले ने देवगांव की संधि
की।
पराजित होने के पश्चात सिधिया ने 30 दिसंबर 1803 ई० को सूर्जी अरजनगांव की संधि की। इस संधि के द्वारा सिंधिया ने गंगा
जमुना के बीच का सम्पूर्ण क्षेत्र तथा जयपुर, जोधपुर एवं
गोहद के उत्तर का क्षेत्र अंग्रेजों को सौंप दिया। इसके अतिरिक्त सिंधिया ने
अहमदनगर, भरूचे तथा अजन्ता पहाड़ियों के पश्चिम का सम्पूर्ण
क्षेत्र अंग्रेजों को दे दिए।
इस प्रकार 1804 ई० में आंग्ल मराठा युद्ध समापन की ओर अग्रसर
प्रतीत हो रहा था। परन्तु अपैरल 1804 ई० होल्कर ने युदध
प्रारंभ कर दिया, जब सिंधिया और भोंसले परास्त हो चुके थे।
होल्कर ने छापामार युद्ध प्रणाली का अनुसरण किया। जनरल लेक ने 17 नवम्बर 1804 ई० को होल्कर को पराजित किया। परन्तु
भरतपुर के समीप लेक बुरी तरह परास्त हुआ। इस प्रकार 1806 ई०
में द्वितीय आंग्ल - मराठा युद्ध समाप्त। हुआ।
द्वितीय आंग्ल - मराठा युद्ध के परिणाम
इस प्रकार आपने अध्ययन किया कि 1806 ई० में द्वितीय आंग्ल मराठा
युद्ध समाप्त हुआ और कार्यकारी गवर्नर जनरल बारलोव ने अहस्तक्षेप की नीति की घोषणा
की। परन्तु इस युद्ध ने तत्कालीन भारतीय राजनीति तथा भविष्य पर अमिट छाप छोड़ा। इस
युद्ध ने भारत पर ब्रिटिश सर्वोच्चता की व्यावहारिक रूप से स्थापित कर दिया।
अठारहवीं सदी के सबसे वृहद् साम्राज्य तथा शक्तिशाली मराठा संघ की कमजोरियां उजागर
हो चुकी थी। मराठा संघ का प्रमुख पेशवा एवं सिंधिया तथा भोंसले ने सहायक संधि
स्वीकार कर ली थी। होल्कर भी लगभग निर्णायक रूप से परास्त हो चुका था। अंग्रेजों
ने इस युद्ध के दौरान भारतीय राजनीति के सबसे प्रमुख सांकेतिक केन्द्र दिल्ली पर
अधिकार कर लिया तथा मुगल बादशाह को मराठा प्रभाव से मुक्त कराते अपने अधीन कर
लिया। इस युद्ध के दौरान अंग्रेजों ने पश्चिमी समुद्र तट पूरब में उड़ीसा, दक्षिण में निजाम से सटे प्रदेश तथा उत्तर भारत के आर्थिक एवं सामरिक
महत्व के समस्त क्षेत्रों पर अधिकार कर लिया। इसी युद्ध के बहाने अंग्रेजों की
निगाह पंजाब पर पड़ी। पंजाब छोड़कर समस्त भारतीय भू-भाग अब अंग्रेजों की इच्छा पर
था।
तृतीय आंग्ल मराठा युद्ध -
द्वितीय आंग्ल मराठा संघर्ष के दौरान मराठे निश्चित रूप से कमजोर हो
गए थे, परन्तु
मराठा शक्ति एवं प्रतिरोध अभी समाप्त नहीं हुआ था। इसलिए 1806 ई० में संघर्ष समाप्त नहीं हुआ था, बल्कि युद्ध
विराम हुआ था। अंग्रेज मराठा शक्ति पर अंतिम विजय तथा मराठे अपनी शर्मनाक स्थिति
से उबरने की प्रतिक्षा कर रहे थे। अंग्रेजों को यह अवसर मिला जब 1813 ई० में हेस्टिंग्स गवर्नर जनरल बनकर भारत आया। उसने रियासतों के संबंध में
अधीनस्थ अलगाव की नीति अपनाई। उसने आक्रामक नीति अपनाते हुए समस्त रियासतों को
ब्रिटिश सर्वोच्चता के अधीन करने का प्रयास प्रारंभ किया। इस प्रकार आंग्ल मराठा
युद्ध पुनः अपरिहार्य हो गया।
तृतीय आंग्ल मराठा युद्ध के कारण -
तृतीय आंग्ल मराठा युदध का प्रथम कारण मराठा राज्य की कमजोरी थी। उन्नीसवीं सदी के आरंभ से ही ये कमजोरियां उजागर होने लगी थी। अंग्रेजों से परास्त होने के बाद भी मराठे आपस में संगठित होने के स्थान पर विभाजित रहे तथा एक दूसरे के विरुद्व षडयंत्र एवं संघर्ष जारी रखे।
ब्रिटिश साम्राज्यवाद, तृतीय आंग्ल मराठा युद्ध का मूल
कारण था जो तात्कालिक रूप से पिण्डारी समस्या सुलझाने के बहाने सामने आया। गवर्नर
जनरल हेस्टिंग्स में माउण्ट स्टुअर्ट एलिफिंस्टन को निर्देश दिया कि वह पेशवा से
संधि के लिए वार्ता करें। इस संधि का उद्देश्य पेशवा की शक्ति को इस प्रकार कम
करना था कि वह भविष्य में अंग्रेजों के विरुद्ध किसी षडयंत्र में सामिल न हो सके।
पेशवा ने 13 जून 1817 ई० को पूना की
संधि पर हस्ताक्षर कर दिए।
हेस्टिंग्स ने नवम्बर 1817 ई० में दौलतराव सिंधिया को
ग्वालियर की संधि पर हस्ताक्षर के लिए बाध्य किया। रघु जी भोंसले दूद्वितीय की
मृत्यु के पश्चात उसका पुत्र परसोनी गद्दी पर बैठा। परन्तु परसोनजी के चचेरे भाई
अप्पा साहिब अंग्रेजों की मदद से गददी प्राप्त करना चाहता था। इसलिए उसने
अंग्रेजों से नागपुर की संधि कर ली जो सहायक संधि थी। इस प्रकार इन तीन संधियों ने
मराठा प्रतिष्ठा पर बैडा धब्बा लगाया। अंग्रेजों ने सिंधिया के साथ जिस दिन संधि
की, ठीक उसी दिन पेशवा ने पूना में ब्रिटिश रेजीडेन्सी को
वर्खास्त करते हुए उसमें आग लगा दी। पेशवा ने एक बड़ी सेना लेकर कर्नल वर पर
आक्रमण किया, परन्तु खीर्की में बुरी तरह परास्त हुआ खीकी के
युद्ध में परास्त होने के बाद भी पेशवा शान्त नहीं हुआ और अपनी स्थिति सुधारने का
प्रयास करने लगा। 1818 ई0 के आरंभ में
वह पुनः कोरेगाव तथा अस्थी में पराजित हुआ। अन्ततः बाजीराव द्वितीय ने जॉन मॉलकम
के समक्ष जून 1818 ई० में समर्पण कर दिया।
पेशवा का पद समाप्त करते हुए बाजीराव द्वितीय को कानपुर के समीप
बीठुर में लाकर रखा गया। उसका पेंशन आठ लाख रुपये वार्षिक रखा गया। पेशवा के
क्षेत्र से एक छोटा क्षेत्र अलग कर शिवाजी के वंशज प्रताप सिंह को दिया गया तथा
उसे मराठा राज्य को औपचारिक एवं वैधानिक प्रधान घोषित किया गया।
तृतीय आंग्ल मराठा युद्ध के परिणाम -
तृतीय आंग्ल मराठा युद्ध भारत में अंग्रेज एवं मराठों के बीच
सर्वोच्चता के लिए हुए संघर्ष का अंतिम युद्ध साबित हुआ। इस युद्ध की समाप्ति के
पश्चात भारत में ब्रिटिश साम्राज्य की सर्वोच्चता पर कोई शंका नहीं रहा क्योंकि
भारत में एक समय मराठों को मुगलों का प्रबल दावेदार माना जा रहा था। परंतु
अंग्रेजों ने सैनिक ताकत तथा कूटनीति का सहारा लेकर मराठों को परास्त कर दिया। इस
युद्ध के परिणामस्वरूप अंग्रेजों को पश्चिमी तथा मध्य भारत के आर्थिक तथा सामरिक
महत्व के सभी क्षेत्र हासिल हो गए। इस युद्ध में भारत पर ब्रिटिश साम्राज्य
निर्माण की प्रक्रिया को लगभग पूरा कर दिया।
मराठा शक्ति की पराजय के कारण
मराठा संघ की आंतरिक कमजोरी मराठों की पराजय का प्रथम कारण थीं।
मराठा राज्य में उन संस्थाओं तथा नीतियों का अभाव था जो किसी भी राज्य के
स्थायित्व तथा विकास के लिए आवश्यक होते हैं। कुशल एवं सक्षम नेतृत्व का अभाव
मराठों की हार का दूसरा कारण था। मराठों की युद्ध प्रणाली अंग्रेजों की तुलना में
काफी कमजोर साबित हुई।
सैनिक साज सामान का आधुनीकीकरण नहीं हुआ। युद्ध की तकनीकी यूरोपीयनों
की तुलना में काफी पिछड़ी थी। अपने तोपखाने को सक्षम नहीं बनाया मराठा राज्य के
आर्थिक आधार का कमजोर होना उनके लिए घातक सिद्ध हुआ। राज्य की आर्थिक गतिविधियाँ
लूट पर आधारित थी। उनकी आय का मुख्य स्रोत चौथ तथा सरदेशमुखी था जिस पर निर्भरता
कठिन थी।
मराठा संघ का सामन्तवादी स्वरूप उनकी राजनैतिक पिछड़ेपन को प्रमाणित
करता है। मराठा संघ एक ढीला-ढाला संघ था जिसका प्रधान पेशवा था। पेशवा के कमजोर
होते ही सिंधिया, होल्कर, भोसले, गायकवाड तथा अन्य सरदार सर्वोच्चता के लिए संघर्षरत हो गए। अंग्रेजों की
भौतिक, सैनिक तथा वैचारिक सर्वोच्चता ने अंग्रेजों की जीत
तथा मराठों की हार में मुख्य भूमिका निभायी। अंग्रेजों ने आधुनिक तकनीक के आधार पर
अपनी सेना विकसित की थी। तोपखाना उनकी थल सेना का आधार था तथा अचूक था।
मराठों के शत्रु निजाम तथा अन्य शासकों को अपनी तरफ कर लिया। उनकी
गुप्तचर व्यवस्था उत्तम थी। ऐसी परिस्थिति में अंग्रेजों की जीत स्वाभाविक थी।
उन्होंने फूट डालो और शासन करो को अपनी कूटनीति का आधार बनाया तथा मराठों के
विरुद्व भी इसका इस्तेमाल किया।
सारांश
इस प्रकार आपने अध्ययन किया कि सतरहवीं सदी में छत्रपति शिवाजी दवारा
स्थापित मराठा राज्य को किस प्रकार पेशवा बाजीराव प्रथम ने शक्तिशाली बनाया।
धीरे-धीरे सारी । शक्तियां पेशवा के हाथ में केन्द्रित हो गई तथा 1750 ई० के
संगोला समझौता के द्वारा मराठा संघ निर्मित हुआ और पेशवा इस संघ का प्रमुख बना।
इसी समय भारत में ब्रिटिश ईस्ट इण्डिया कम्पनी ने साम्राज्य निर्माण करना प्रारंभ
किया तथा अफगानों ने उत्तर भारत पर एक बार फिर आक्रमण किया। मराठे भारतीय राजनीति
के सबसे प्रबल दावेदार थे। परंतु पानीपत की तीसरी लड़ाई में उनकी हार ने मराठा
शक्ति क्षीण कर दी और अंग्रेजों ने अवसर मिलते ही मराठों से 1775 ई० से सर्वोच्चता के लिए संघर्ष प्रारंभ किया। 1775 ई०
से 1782 ई० तक हुए प्रथम आंग्ल मराठा संघर्ष में कोई निर्णय
नहीं हुआ, परन्तु अंग्रेजों की स्थिति अच्छी नहीं थी।
अमेरीकी स्वाधीनता संग्राम तथा मैसूर के साथ युद्ध के कारण अंग्रेजों को काफी
नुकसान हो रहा था। सिंधिया ने अदूरदर्शिता का परिचय दिया और 1782 ई० में सालबई की संधि से युद्ध समाप्त करा दिया। अंग्रेजों के लिए यह
अच्छा रहा क्योंकि शांतिकाल का उपयोग उन्होंने अपनी शक्ति बढ़ाने तथा दुश्मनों को
कमजोर करने में किया मराठे विभाजित रहे बाजीराव द्वितीय ने 1802 ई० में बसीन की संधि से पुनः अंग्रेजों को अवसर प्रदान किया और द्वितीय
आंग्ल मराठा संघर्ष (1803-06 ई0) में
अंग्रेजों ने मराठा शक्ति को विनाश के कगार पर पहुँचा दिया। मराठों ने अपनी गलती
सुधारने का एक अंतिम प्रयास किया, परंतु काफी देर हो चुकी
थी। हेस्टिंग्स इस समय ब्रिटिश सर्वोच्चता स्थापित करने के लिए प्रतिबद्ध था।
इसलिए पिण्डारी समस्या के समाधान के बहाने तृतीय आंग्ल-मराठा संघर्ष प्रारंभ हुआ
और शीघ्र ही मराठा शक्ति ने ब्रिटिश शक्ति के सामने सदा के लिए घुटने टेक दिए।
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