अंग्रेजों का भारत में प्रवेश का इतिहास - History of British entry into India
अंग्रेजों का भारत में प्रवेश का इतिहास - History of British entry into India
1600 ई. में लन्दन के व्यापारियों द्वारा ब्रिटिश ईस्ट
इण्डिया कम्पनी की औपचारिक स्थापना हुई। 1608 में विलियम
हॉकिन्स सूरत पहुंचा। वह मुगल सम्राट जहाँगीर के दरबार में उपस्थित हुआ हॉकिन्स को
अधिक सफलता प्राप्त नहीं हुई क्योंकि मुगल दरबार में पूर्तगालियों का अधिक प्रभाव
था। 1612 में अंग्रेज़ कैप्टन, बेसेंट
ने स्वाली नौम के स्थान पर पुर्तगाली सेना को बुरी तरह पराजित कर दिया। मुगलों ने
अंग्रेजों की इस वीरता से प्रसन्न होकर उन्हें सूरत, कम्बाया
तथा अहमदाबाद में व्यापार करने की आज्ञा दे दी। 1616 में
टॉमस रो ईस्ट इण्डिया कम्पनी का राजदूत बन कर भारत आया। टॉमस रो को अपेक्षाकृत
अधिक सफलता मिली तथा मुगलों की राजकीय सीमा में अंग्रेजों को व्यापार करने की
आज्ञा मिल गई। शहजादे शाहजहाँ ने अंग्रेजों पर अपनी अधिक कृपा दृष्टि दिखाई तथा
उन्हें बंगाल, भडौंच तथा आगरा के क्षेत्रों में व्यापार करने
कि आजा प्रदान की। 1662 में चार्ल्स द्वितीय को पुर्तगालियों
से बम्बई दहेज के रूप में प्राप्त हुआ।
1707 में औरंगजेब की मृत्यु तथा तेजी से घटती मुगल
साम्राज्य कि शक्ति ने कम्पनी को एक ऐसा अवसर प्रदान किया जिसका लाभ उठाकर कॅम्पनी,
राजनैतिक सत्ता की स्थापना की ओर तेजी से बढ़ी कम्पनी ने 1717
में फर्रुखसियर से तीन फरमान प्राप्त किए जिससे न केवल कम्पनी के
व्यापार को बढ़ावा मिला बल्कि एक राजनैतिक शक्ति के रूप में उसकी साख भी मजबूत
हुई। व्यापारिक एकाधिकार के युद्ध में पहले ब्रिटिश इस्ट इण्डिया कम्पनी को
पुर्तगाली एवं डच व्यापारियों से युद्ध करना पड़ा एवं बाद में फ्रांसीसियों
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