जनसम्पर्क का इतिहास - History of Public Relations
जनसम्पर्क का इतिहास - History of Public Relations
प्रचार का प्रस्थान बिन्दु व्यक्ति और उसकी आवश्यकताएं होती है। कोई भी प्रचार सफल नहीं होता यदि उसका आधार या मांगे, आवश्यकताएं या इच्छाएं न हो प्रचार कर्ता की सफलता इसी में है कि वह जनता को यह विश्वास दिला दे कि वह जो कुछ कहता है लोगों के अपने दिल की आवाज है। इसके लिए लोक सम्पर्क कर्मी को सामूहिक मनोविज्ञान पर इतना अधिकार होना चाहिए कि वह जनता के अवचेतन मन में सोई हुई इच्छाओं और आकांक्षाओं को मुखरित कर दे और जनता का विश्वास प्राप्त कर ले।
जब से सामाजिक जीवन का सूत्रपात हुआ है। किसी न किसी रूप में लोक सम्पर्क की आवश्यकता रही है। प्राचीन काल में राजनीतिक तथा धार्मिक सम्बन्ध सीधे एवं स्पष्ट होते थे, तो भी लोक सम्पर्क या इसी प्रकार की किसी और प्रक्रिया को अनिवार्य माना जाता था और आज का युग तो लोकयुग ही कहलाता है। इस युग में लोक सम्पर्क का महत्व स्वतः ही स्पष्ट हो जाता है।
आज के युग में लोक सम्पर्क का हमारे जीवन में क्या स्थान है, इसे समझने के लिए यह आवश्यक है कि इसके समारंभ, विकास और इतिहास पर दृष्टिपात किया जाए। ज्ञान के किसी भी अन्य क्षेत्र की तरह लोक सम्पर्क का आज का रूप इतिहास की कई शक्तियों और प्रक्रियाओं के निरंतर घात प्रतिघात का परिणाम है। कालांतर में इस कला का और भी कई दिशाओं में विकास हो सकता है। इसलिए लोक सम्पर्क की बहुमुखी प्रगति के विभिन्न चरणों को किसी देश या काल विशेष से बांधना अनुचित और भ्रांतिजनक होगा। तथापि वस्तु स्थिति को समझने के लिए कुछ ऐतिहासिक उदाहरण और दृष्टांत दिये जा सकते हैं।
प्राचीन काल में समाज छोटी-छोटी इकाइयों (परिवारों, कबीलों या वंशों) में बेटा हुआ था। उस जमाने में किसी लम्बी चौड़ी या जटिल शासन व्यवस्था की आवश्यकता नहीं थी। न ही उन दिनों तक दूसरे से लेनदेन में मुद्रा का प्रयोग होता. था, जिस पर आज का सारा आर्थिक ढांचा अवस्थित है। इसलिए उस सीमित जनसमुदाय के सभी सदस्यों का निर्वाह सीधे और सरल आदान-प्रदान से ही हो जाता था।
जब मानव ने सर्वप्रथम अपने हृदयोदगारों को अपने कुटुम्ब पर व्यक्त करने और उसे अपने साथ सहमत करने के लिए प्रयत्न किए और किसी भी सिद्धान्त अथवा विचारधारा को समाज द्वारा स्वीकृत कराने के लिए पग उठाए, तभी से लोक सम्पर्क का श्रीगणेश भी हो गया, भले ही इस नाम का आविष्कार तब न हुआ हो।
आज का राजनीतिक और सामाजिक जीवन समस्याओं और उलझनों से अटका पड़ा है। इनको सुलझाने के लिए और जीवन का अबोध विकास सुनिश्चित करने के लिए सैद्धांतिक एवं व्यावहारिक दृष्टिकोण से लोक सम्पर्क एक अभाव की पूर्ति करता है। जैसे मतदान लोकतंत्र का अनिवार्य अंग माना जाता है, उसी प्रकार लोक सम्पर्क भी लोकतंत्रात्मक राज्य की एक अपरिहार्य जरूरत है। लोक सम्पर्क के विकास की कहानी आधुनिक राजनीतिक प्रणाली के इतिहास से घनिष्ठ रूप से सम्बद्ध है। पिछले एक सौ साल में अमृत पूर्व जन जागरण हुआ है। उस जनजागरण से जहां समाज में जन चेतना आई है वहीं उसमें राजनैतिक चेतना का भी विकास हुआ है। जैसे-जैसे समाज में सामाजिक जन चेतना और राजनैतिक जनचेतना बढ़ी, उसी तरह लोक सम्पर्क का कार्य क्षेत्र भी बढ़ता गया है।
मानव समाज में जनसंपर्क की उपयोगिता और उसके महत्व का अध्ययन करने के लिए हमें मानव के अतिरिक्त अन्य प्राणियों के जीवन का भी अवलोकन करना होगा क्योंकि मूलतः इंसान भी तो अन्य जीवों की तरह एक प्राणी ही है। विज्ञान तो कहता है कि मानव के और अन्य जीवधारियों के बीच अगर कोई अन्तर है तो मात्र यह कि मनुष्य की सोच विचार की शक्ति या बोलने और मनोदशा को अभिव्यक्त करने की क्षमता ने उसे प्रकृति में समस्त प्राणियों में सर्वोपरि स्थान दिया है। अन्यथा जीवन के सभी मूल प्रेरक तत्व आहार निंदा मैथुन आदि इंसान में भी उसी प्रकार विद्यमान हैं जैसे दूसरे प्राणियों में यहां तक भी देखा गया है कि जिन गुणों के कारण हम अपने आप को दूसरे जानवरों की अपेक्षा उच्च स्तर के प्राणी मानते हैं वे गुण न्यूनाधिक रूप में मानवेतर प्राणियों में भी पाए जाते हैं। भेद है तो केवल यह कि हम में ये क्षमताएं दूसरे प्राणियों की अपेक्षा अधिक विकसित दशा में पाई जाती हैं लोकसम्पर्क के सिद्धांत की स्थापना के लिए पशु पक्षियों में संचार का काम किस तरह चलता है उसे हम बारीकी से देखें तो बहुत से रहस्य खुल जाते हैं।
हमने अकसर देखा है कि जब भी कभी कोई खतरा दिखाई देता है तो कई पक्षी बहुत शोर मचाना शुरू देते हैं। कौओं को ही लीजिए। अगर कोई कौआ कहीं पकड़ा जाए या कंकर या छरे का निशाना बन जाए तो समूह के सारे कौए कॉव कॉव कर के आसमान सिर पर उठा लेते हैं।
वन्य प्राणियों विशेषतः हिरनों हाथियों, भेडियों और जिराफों आदि के भी परस्पर संचार के अपने-अपने तरीके हैं। ये जानवर प्रायः अपने अपने झुंड बनाकर चलते हैं और जब किसी शिकारी या पशु का खतरा महसूस करते हैं तो अपने "परिवार" या समूह के सभी सदस्यों को सचेत कर देते हैं या मुकाबले के लिए तैयार हो जाते हैं। यह भी देखा गया है कि जिराफ अपने परिवार के एक सदस्य को पहरे पर खड़ा कर देते हैं।
इस प्रकार कहें तो संचार मानव जाति के अलावा अन्य प्राणियों में भी होता है जो किसी उद्देश्य या लाभ के लिए किया जाता है। लोकसपर्क का इतिहास प्राचीन काल से शुरू हो जाता है। इसका एक उदाहरण प्रभु ईसा मसीह का संदेश भी है। आज से लगभग दो हजार वर्ष पूर्व फिलीस्तीन में एक साधारण मजदूर बढ़ई जोसेफ का बेटा लोगों को ज्ञान ध्यान और कर्म धर्म की बातें समझाया करता था। एक दिन उसने देखा कि श्रोताओं की भीड़ काफी है। यह एक छोटी सी पहाड़ी पर चढ़ गया और उस पहाड़ी पर से उसने लोगों को उपदेश दिया जिसे लिखने वालों ने "समैन आफ दि माउटा अर्थात् पहाड़ी पर से उपदेश का नाम दिया। यह उपदेश आज भी अमर है और उसे अमर बनाया है उन कलाकारों ने जिन्होंने विभिन्न कला माध्यमों से उसे जीवित रखा। ईसा के जीवन और उनके अंतिम बलिदान को आधार मानकर साहित्य की रचना की गई धार्मिक आयोजन हुए और कला के सभी माध्यम इसके लिए प्रयुक्त हुए। इस तरह लोक सम्पर्क और प्रचार के साधनों के प्रयोग से वह सन्देश अमर बन गया।
पुराने जमाने में अमेरिका, बेबीलोन और सुमेरिया आदि देशों में स्वेच्छाचारी नरेशों का अधिपत्य था, वे अपनी कीर्ति और नाम को दूर-दूर तक फैलाने के लिए काव्य (साहित्य) लिखवाते थे और मूर्तियां बनवाते थे लोकसम्पर्क से सम्बद्ध सबसे पुरानी खोज ईराक के पुरातन खण्डहरों से मिलती है। आज से 3700 वर्ष पूर्व (1800 ई० पू० में) ईराक में किसानों को शिलालेखों द्वारा खेती के बारे में संदेश दिये जाते थे। ठीक उसी तरह जैसे आजकल सरकारें अपनी विज्ञप्तियां प्रकाशित करती और करवाती है। राजा को भगवान का रूप सिद्ध करने के लिए मिश्र के जितने धर्म प्रचारक एवं सिद्ध पुरुष हुए, वे बाजारों में और पूजास्थानों के सामने घूम फिर कर उपदेश दिया करते थे। प्राचीन यूनान में लोकतन्त्रात्मक व्यवस्था थी। इसलिए उन दिनों वहां विधिवत् प्रोपेगण्डा करने की प्रथा थी। छोटे-छोटे नगरों के अपने-अपने स्वतंत्र राज्य थे लोकमत की सत्ता प्रत्यक्ष रूप से मानी जाती थी।
डिमास्थनीज उस जमाने (सन् 384322) का एक प्रसिद्ध नेता था जो अपने भाषणों द्वारा जनता को सजग किया करता था। सुकरात (सन् 470 से 399) अपने छात्रों और अनुगामिया में प्रश्नोत्तर द्वारा अपने आदर्शों का प्रचार करते थे।
पुरातन रोम तो इस बात के लिए प्रसिद्ध था कि वहां लोकमत और लोकवाणी अपना प्रबल प्रभाव दिखाती थी रोम के सम्राट जूलियस सीजर (सन100 से 44) ने तो समाचार प्रकाशित करने की प्रारंभिक परिपाटी ही चलाई थी। उसने एक्टा ड्यूरेना प्रकाशित करना आरम्भ किया जिसका अर्थ है "दैनिक समाचार यह एक प्रकार से सरकारी सूचनाओं के पोस्टर होते थे। इसमें सरकार की सूचनाएं तथा अन्य समाचार होते थे और यह सिलसिला चार सौ साल तक चलता रहा था।
इंग्लैंड में तेरहवीं शताब्दी में अधिकारों का घोषणा पत्र मैग्नाकार्टा सन् 1215 में पास हुआ, जिसमें विचारों की स्वतंत्रता का अधिकार स्वीकृत किया गया था। मार्टिन लूथर (1483-1546) ने बाइबिल का जर्मन भाषा में अनुवाद प्रकाशित करके रोग के कट्टरपंथी धर्माचार्यों के विरुद्ध विद्रोह की पताका फहरायी। इंग्लैंड में भी इसी प्रकार का आंदोलन चल चुका था जब जान वाईल्किफ ने (1330-1384) में बाइबल का अंग्रेजी में अनुवाद किया, जिसे चर्च के अधिकारियों ने निषिद्ध घोषित कर दिया था।
पुनर्जागरण काल में बड़े-बड़े विचारकों ने लोकमत के प्रभाव और अपेक्षित दिशा में जनमत के निर्माण की समस्याओं पर प्रकाश डाला इटली के विचारक मेक्यावली ने (1469-1526) लोकमत के प्रभाव पर बहुत बल दिया। शेक्सपियर (1564 1616) के नाटकों के माध्यम से भी ऐसे नए विचारों का प्रचार हुआ।
लोकमत के प्रभाव और लोकमत निर्माण की आवश्यकता को इतना महत्वपूर्ण समझा गया कि रोम के पोप ने धर्म सुधार आन्दोलन का मुकाबला करने के लिए धर्म-सुधार विरोधी अभियान शुरू किया वास्तव में अंग्रेजी शब्द 'प्रोपेगेंडा' का प्रयोग भी तब से शुरू हुआ जब पोप ग्रेगरी पन्द्रहवें (सन् 1554-1623) ने रोमन कैथोलिकों की तरफ से प्रोटेस्टेटों के प्रचार के विरुद्ध जवाबी प्रचार चलाया। इसके पश्चात पोप अर्थन आठवें ने प्रचारकों के प्रशिक्षण के लिए प्रोपेगेंडा कॉलेज की स्थापना की।
फ्रांस की राज्यक्रान्ति (सन् 1789-1799) ने मानव इतिहास में एक निर्णायक अध्याय जोड़ा। क्रान्तिकारी विचारों के प्रचार और क्रान्तिकारी राजसत्ता की सुरक्षा के हेतु जनमत जागृत करने के लिए जो साधन अपनाए गए समयान्तर में उन्होंने आधुनिक युग की पब्लिसिटी का रूप धारण किया। फास को राज्यक्रान्ति का अपना ध्वज था तिरंगा, जिसे दृश्यमान "प्रतीक" कहा जा सकता है। इसका श्रव्य चिन्ह था "लॉ मार्सेलाज" का क्रांतिकारी गीत और तीसरा प्रतीक था, "श्रीमान" की "जगह "भाई" या "बन्धु" अथवा "नागरिक" का लोकप्रिय सम्बोधन ऐसे प्रतीकों का प्रभाव वहां के समाज में आज भी स्पष्ट देखा जा सकता है।
सन 1800 से 1865 तक की अवधि को अमेरिका में लोकसम्पर्क के विस्तार का युग कहा जाता है। इस अवधि में बड़ी तीव्र गति से आर्थिक प्रगति हुई। नये-नये उद्योग स्थापित हुए बड़े-बड़े फार्म बने यातायात के नये साधन भी विकसित हुए मशीनी युग बड़ी तेजी से बढ़ रहा था। सन् 1832 में तार द्वारा संदेश भेजने के नये तरीकों का आविष्कार हुआ सन् 1844 में अखबारी कागज बनने लगा। सन् 1863 में छपाई के नए-नए तरीके ढूंढ निकाले गए।
अमेरिका की राज व्यवस्था भी लोकमत पर आधारित थी, इसलिए लोकमत को आंदोलित किये बगैर किसी भी सामाजिक एवं आर्थिक कार्यक्रम को सफल बनाना वहां असंभव था अतः उन दिनों कई एक नारों को लेकर बहुत से आन्दोलन चले स्त्रियों के लिए मताधिकार की मांग मद्यनिषेध और श्रमिकों के लिए ट्रेड यूनियन की स्थापना आदि ऐसे विषय थे, जिन पर लोकमत को जागृत करने के लिए प्रोपेगण्डा को वे सभी उपाय अपनाने आवश्यक थे जो उन दिनों तो प्रारम्भिक अवस्था में थे किन्तु आज हम उन्हें भली प्रकार जानते हैं।
अब्राहम लिंकन दास प्रथा उन्मूलन आन्दोलन के नेता थे उन्हें इस समस्या पर और इसके परिणामस्वरूप राष्ट्रपति पद के चुनाव और गृहयुद्ध के मोचों पर भी अपने विरोधियों के साथ प्रचार युद्ध लड़ना पड़ा। उनका विश्वास था कि जनता का सक्रिय समर्थन और सहयोग सफलता की पहली कुंजी है। इसलिए उन्होंने गृहयुद्ध के आरम्भ के दिनों में कहा: "हम जिस स्थिति का सामना कर रहे हैं, उसमें हमें जनता को अपने साथ लेकर चलना है। जनता का समर्थन लेकर हम सब कुछ प्राप्त कर लेंगे। इसके बिना हम कुछ नहीं कर पायेंगे हमें याद रखना चाहिए कि इस लड़ाई में वही जीतेगा जो जनता को अपने साथ लेकर चलेगा। जिसने लोकमत की परवाह न की और ऊपर ऊपर से हुक्म चलाया, वह कहीं का नहीं रहेगा।"
लिंकन ने लोकसम्पर्क में अपनी सूझबूझ का परिचय राष्ट्रपति बनकर व्हाईट हाऊस में पदार्पण करते ही दिया। उन्होंने जनता से वे रोक-टोक मिलने के लिए सप्ताह में एक दिन निश्चित कर दिया। इससे राष्ट्रपति निवास की चारदीवारों में भी उनका सर्वसाधारण से सम्पर्क बना रहा जिस कारण वे अमेरिका के एक सफल राष्ट्रपति के रूप में माने जाते हैं।
बीसवीं शताब्दी के प्रारम्भ में अमेरिका में बड़ी-बड़ी हड़ताल हुई और मार्क ट्वेन (Mark Twain 1835-1910) जैसे लेखकों ने पूंजीवादी शोषण का घिनौना चित्र अपनी पुस्तकों और उपन्यासों में खींचा। उन्होंने आवाज उठाई कि “Public Be Damned" कहने वालों के दिन लद गये हैं। उनकी मांग थी “Public be Informed" अर्थात् "जनता को जबाब दो।"
रूस के एजीटेटरों के काम का सिद्धान्त यह है कि जो प्रचार मौखिक रूप से जनता से घुल-मिल कर किया जाता है वह सर्वाधिक प्रभावपूर्ण होता है। रेडियो प्रेस और टेलीविजन द्वारा प्रचार सब देशों के के लिए तो संभव नहीं क्योंकि इसके लिए बहुत अधिक पूंजी अपेक्षित है। दूसरे निजी संपर्क से जो बात कही जाती है, उसका प्रभाव तो स्वयं सिद्ध है क्योंकि इसमें वह आत्मीयता, घनिष्ठता और स्निगधता होती है जो रेडियो द्वारा आकाश में आवाज फेंक देने में नहीं उपलब्ध होती यद्यपि रेडियो या प्रेस आदि का अपना अलग महत्व है।
हमारे देश में सरकारी लोकसम्पर्क विभागों में भी कुछ ऐसे कार्यकर्ता रखे जाते हैं या अनुबंधित किये जाते हैं जो रूस के "एजीटेटरों" की तरह जनता में घुलमिल कर प्रचार कार्य करते हैं। उनके काम करने का ढंग अनौपचारिक होता. है 'नुक्कड़' जलसों में भाषण करने में या सरकारी प्रचार सामग्री वितरित करके ये अपना काम करते हैं। ये कार्यकर्ता मुख्यतः सरकार की पक्षधर राजनीतिक पार्टियों से भी किसी न किसी तरह जुड़े होते हैं। इसलिए जनता से सम्पर्क बनाने का इनका तरीका कुछ अलग ही होता है तथापि ये लोग पूर्ण रूप से सरकारी अनुशासन के अधीन होते हैं। ये कार्यकर्ता लोगों के विचार जानते हैं और समझते हैं और समय-समय पर लोगों को सोचने की उचित दिशा भी देते हैं। अगर कहीं कोई गलत प्रोपेगेंडा चल रहा हो तो उसका खण्डन भी करते हैं। अनुभव से ये कार्यकर्ता जान जाते हैं कि जनमत का झुकाव किस ओर है। इनको यह निर्देश दिया जाता है कि अपने जिले के लोकसम्पर्क अधिकारी को जनमत के झुकावों या परिवर्तनों की सूचना देते रहें।
अतः कहें तो विश्व में जनसम्पर्क या लोकमत का इस्तेमाल आदिकाल से होता रहा है। वर्तमान में यह एक विकसित विधा बन गया है और समाज का अभिन्न अंग बन गया है। यही कारण है कि आज प्रत्येक सरकारी, गैरसरकारी संस्थानों, राजनैतिक पार्टियों और उद्योगों में जनसम्पर्क विभाग अवश्य होते हैं।
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