संचार का महत्त्व - Importance of Communication
संचार का महत्त्व - Importance of Communication
जैसा कि पहले कहा जा चुका है कि संचार के बिना जीवन जीने की कल्पना ही नहीं की जा सकती हैं। किसी भी समाज में रहने वाले लोगों के रहन-सहन, खान-पान, आचार-व्यवहार अलग-अलग होते हैं। प्रत्येक व्यक्ति की अपनी विशेषताएं और खामियाँ होती हैं। प्रायः हम यह सुनते हैं और महसूस भी करते हैं कि महत्व इस बात का नहीं होता कि आपने क्या कहा ? महत्व इस बात का होता है कि आपने कैसे कहा? मनोवैज्ञानिक एक उदाहरण द्वारा व्यक्तियों के व्यक्तित्व की परख करते हैं। एक गिलास में आधा पानी है और आधा खाली हैं। एक व्यक्ति कहता है कि गिलास आधा भरा हैं और दूसरा कहता है कि गिलास आधा खाली है। पहले व्यक्ति को आशावादी तथा दूसरे को निराशावादी कहा जा सकता है। यानी संचार की श्रेष्ठता इस बात पर निर्भर करती है कि व्यक्ति अपने संदेश कैसे भेजता है। उसके संदेश की गुणवत्ता के आधार पर ही उसके व्यक्तित्व की पहचान होती है। संस्कृत के सुप्रसिद्ध रचनाकार बाणभट्ट के विषय में हम सब जानते हैं। वे अपनी कृति कादम्बरी की रचना कर रहे थे। रचना पूरी नहीं हो पाई और उनका मृत्यु काल आ गया। उन्हें चिन्ता हुई कि उनकी इतनी महत्वपूर्ण रचना कैसे पूरी होगी। उनके दो पुत्र थे। उन्होंने तय किया कि दोनों पुत्रों की परीक्षा ली जाय। जो परीक्षा में उत्तीर्ण होगा, उसे ही कादम्बरी पूरी करने का दायित्व दे दिया जाए। उन्होंने अपने बड़े पुत्र का बुलाया और कहा कि सामने जो पेड़ खड़ा है, उसका वर्णन करो। पुत्र ने कहा- शुष्को वृक्षः तिष्ठति अग्रे यानी सूखा पेड़ सामने खड़ा है। बाण ने छोटे पुत्र को बुलाकर उससे भी यही सवाल किया जबाब आया-नीरस तरुरिह विलसति पुरत:-सामने एक रसरहित तरु विलास कर रहा है। कादम्बरी की शैली के अनुरूप यह उत्तर सुनकर बाणभट्ट ने अपनी कादम्बरी को पूरा करने का दायित्व छोटे पुत्र को सौंप दिया।
यह उदाहरण इस बात का प्रमाण है कि संचार की श्रेष्ठता पर संदेश की गुणवत्ता निर्भर करती है। हम एक और प्रसिद्ध दोहे को यहाँ उद्धृत कर सकते हैं
कौआ काको धन हरे, कोयल काको देय
मीठे वचन सुनाय के सब को मन हर लेय।।
विद्वानों का मानना है कि श्रेष्ठ संचार के मुख्य पाँच सूत्र हैं
◆ Create quality Talk time with family and friends
◆ Learn to Communicate your knowledge to others
◆ Talk about misunderstanding: Be Constructive.
◆ Don't be afraid to ask questions
◆ Keep talking
अपने मित्रों और परिवारजनों से निरंतर बातचीत करनी चाहिए। आपस में बातचीत होने पर बहुत सारी गलतफहमियां दूर हो जाती हैं। अपने व्यक्तित्व का विकास होता है।
जो-हेरी का कहना है कि हमारे व्यक्तित्व के चार हिस्से होते हैं
1. जब हम दूसरों के साथ होते हैं तो हमारी भाव भंगिमा, व्यवहार और व्यक्तित्व के कुछ रूपों से हम स्वयं परिचित होते हैं और दूसरों को परिचित कराते हैं (The open area)
2. हमारे व्यक्तित्व के कुछ अंश ऐसे होते हैं, जिनसे हम परिचित नहीं होते लेकिन अन्य लोग परिचित होते हैं। जैसे हम खर्राटे मारते हैं, किन्तु स्वयं स्वीकार नहीं करते (The blind area)
3. हम अपने व्यक्तित्व के कुछ हिस्सों को अपनी भावनाओं को अपने तक सीमित रखते हैं, और दूसरों को बताना नहीं चाहते एक चेहरे पे कई चेहरे छिपा लेते लोग (The hidden area)
4. हम जानते हैं कि हमारे व्यक्तित्व की एक छवि ऐसी है, जिसे हम भी नहीं जानते और दूसरों के सामने भी वह प्रकट नहीं होता, पर वह छवि हमारे व्यवहार को प्रभावित करती है जैसे अकारण क्रोधित हो जाना, अन्यमनस्क हो जाना (The unknown area )
श्रेष्ठ संचार के लिए जरूरी है कि हम अपने ओपन एरिया को विस्तृत करें। इसके लिए हमें अपने विषय में दूसरों को सम्यक सूचनाएँ देनी चाहिए। अपने आचरण में पारदर्शिता लानी चाहिए।
अपनी जानकारियों को दूसरों तक सम्प्रेषित करना संचार का श्रेष्ठ तरीका है। अपना ज्ञान दूसरों को बांटने पर उसमें निरंतर वृद्धि होती है, और ज्ञान को अपने तक सीमित रखने पर वह नष्ट हो जाता है। संस्कृत में कहा गया है
न चौर्यहार्य न राजहार्य न भ्रातृभाज्यं न च भारकारी।
व्यये कृते वर्धते एव नित्यं, विद्याधनं सर्वधनं प्रधानम्॥
विद्या रूपी धन को न चोर चुरा सकता है, न उसका अपहरण हो सकता है, न भाई उसे छीन सकता है न वह बोझिल होता है, वह तो खर्च करने पर बढ़ता जाता है
अतः विद्याधन सारे धनों में श्रेष्ठ है।
अपनी गलतफहगियों के विषय में बातचीत करनी चाहिए। सकारात्मक होना चाहिए. प्रश्न पूछने में संकोच नहीं करना चाहिए और निरन्तर विमर्श करना चाहिए। श्रेष्ठ संचार के ये सूत्र व्यक्ति के व्यक्तित्व को निखारते हैं और उसे लोकप्रिय बनाते हैं। दूसरी ओर संचार के बाधक तत्व हमारे व्यक्तित्व को निराशा से भर देते हैं, क्रोध, ईर्ष्या और द्वेष से भर देते हैं, सूचनाओं को ठीक ठीक प्रेषिक करने में असमर्थ बना देते हैं और व्यक्ति को अलोकप्रिय बना देते हैं। बातचीत में टालमटोल करना, सुलह न करना, आपसी समझौता न होना, प्रतियोगिता का भाव हमारा आडम्बरयुक्त व्यवहार ये सब संचार के विरोधी तत्व हैं और संचार के रूप को बेहतर बनाने के लिए इन विरोधी तत्वों से बचना जरूरी है। संक्षेप में कह सकते हैं कि Effective communication will undoubtedly lead to a positive one and poor communication will inevitably lead to a negetive outcome.
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