स्वतंत्रता पूर्व भारतीय पत्रकारिता - Indian Journalism before Independence

स्वतंत्रता पूर्व भारतीय पत्रकारिता - Indian Journalism before Independence


सन् 1857 के विद्रोह को भारतीय स्वाधीनता संग्राम का पहला युद्ध माना गया है। उस समय तक समाचार पत्रों का प्रचार कुछ विशेष रूप में नहीं हुआ था और आज जिस रूप में समाचार पत्र हमें प्राप्त होते हैं, वह तब इतना सम्भव भी नहीं दिखाई देता था। भारत में समाचार पत्र अवश्य निकले थे लेकिन उनकी प्रसार संख्या बहुत सीमित थी। 1836 में समाचार चन्द्रिका की 250 प्रतियां समाचार दर्पण की 398, बंगदूत की 70 से भी कम पूर्णचन्द्रोदय की 100 और ज्ञानेनेशुन की 200 प्रतियां ही प्रकाशित होती थीं। सन् 1839 में कलकत्ता में जो उस समय भारत की राजधानी थी, यूरोपियनों के 26 पत्र निकलते थे, जिनमें विदेशी 6 दैनिक थे और 9 भारतीय पत्र थे। 'संवाद प्रभाकर 14 जून, 1839 को दैनिक हुआ था। सन् 1857 में पयाने आजादी के नाम से उर्दू तथा हिन्दी में एक पत्र प्रकाशित हुआ जो अंग्रेजों के विरुद्ध क्रान्ति का प्रचारक था, इसको बाद में सरकार द्वारा जब्त कर लिया गया था। जिस किसी के पास उसकी प्रति पायी जाती थी, उन्हें राजद्रोह का दोषी माना जाता था और कठोर से कठोर यातनाएं दी जाती थीं। 


सन् 1857 में ही हिन्दी के प्रथम दैनिक समाचार 'सुधावर्षण और उर्दू फारसी के दो समाचारपत्रों 'दूरबीन' और 'सुल्तान उल अखबार के विरुद्ध यह मुकदमा चला कि उन्होंने बहादुरशाह जफर का एक फरमान छापा जिसमें लोगों से गांग की गयी थी कि अंग्रेजों को भारत से बाहर निकाल दें। इस पत्र के सम्पादक श्यामसुन्दर रोन दिन भर की सुनवाई के बाद राजद्रोह के अपराध से मुक्त दिए गए और इसके बाद ही लार्ड केनिंग का प्रसिद्ध गैगिंग एक्ट पास हुआ, जिसमें समाचार पत्रों पर बहुत बन्धन लगाए गए थे। इस सिलसिले में लाई केनिंग ने विधान परिषद की बैठक में अपने भाषण में यह सूचना दी कि भारतीय जनता के हृदय में इन समाचार पत्रों ने, जो भारतीय भाषाओं में छपते थे, सूचना देने के बहाने कितना राजद्रोह लोगों के दिलों में भर दिया। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि उनकी यह टिप्पणी भारतीयों द्वारा संचालित पत्रों से सम्बद्ध थी। यूरोपियन पत्रों के सिलसिले में नहीं। इस रिपोर्ट के बाद यह कहने की कोई आवश्यकता नहीं रह जाती कि प्रथम स्वतन्त्रता संग्राम जिसे मुख्यतया सिपाहियों को विद्रोह कहा जाता है या जिसके पीछे नानासाहब, झांसी की रानी लक्ष्मीबाई, अवध की बेगम या बहादुरशाह जफर जैसे राजा-महाराजाओं नवाबों और बादशाहों का असन्तोष माना जाता है, भारतीय पत्र-पत्रिकाओं और पत्रकारों से कम प्रभावित नहीं था केनिंग के ये विचार केवल उत्तर भारत के समाचार पत्रों के बारे में नहीं थे। बम्बई के गवर्नर लार्ड एलफिस्टन ने भी इनका समर्थन किया था। इसके परिणामस्वरूप द्वारिकानाथ ठाकुर द्वारा संचालित बंगाल हरकारा पत्र का प्रकाशन 19 सितम्बर से 24 सितम्बर 1857 तक स्थगित कर दिया गया और उसे फिर से प्रकाशित करने की अनुमति तभी मिली जब उसके सम्पादक ने त्यागपत्र दे दिया। उत्तर प्रदेश के अनेक पत्रों को प्रकाशित होने से रोक लगा दी गई। भारत में अंग्रेजी राज्य के विरुद्ध संघर्ष के क्षेत्र में जिन समाचारपत्रों का विशेष उल्लेख करना आवश्यक हैं, उनमें कलकत्ता का हिन्दू पेट्रियट मुख्य था, जिसकी स्थापना 1853 में गिरीश चन्द्र घोष ने की थी और जो हरिश्चन्द्र मुखर्जी के नेतृत्व में असाधारण लोकप्रियता प्राप्त कर गया। सन् 1861 में इस पत्र में भी मनमोहन घोष का एक नाटक 'नील दर्पण' निकला जिसने गोरे व्यापारियों के विरुद्ध नील की खेती को खत्म करने के लिए आन्दोलन चलाया और इसके फलस्वरूप एक नील कमीशन की नियुक्ति हो गयी। बाद में यह पत्र श्री ईश्वरचन्द्र विद्यासागर के हाथ में आ गया और इसके पश्चात् क्रिस्टोदास पाल इसके सम्पादक नियुक्त किए गए। इस पत्र ने सरकारी ज्यादतियों का खुलकर विरोध किया और यह मांग की कि सरकार की नौकरियों में भारतीयों को प्रवेश दिया जाए। सन् 1878 में जो देशी भाषायी समाचार पत्र विरोधी कानून पास हुआ, उसका इसने जमकर विरोध किया।


'अमृत बाजार पत्रिका का स्वतंत्रता संग्राम में अपना विशेष योगदान रहा। इस पत्र को दबाने के लिए सन् 1878 मे अनेक प्रयास किए गए। इस पत्र के सम्पादक शिशिर कुमार घोष और मोतीलाल घोष ने इसे रातोंरात अंग्रेजी का भी पत्र बना दिया।


सन् 1849 में पूना से ज्ञान प्रकाश का प्रकाशन हुआ था। इसका प्रबन्ध पूना की सार्वजनिक सभा ने किया। इस पत्र के अन्तर्गत सार्वजनिक महत्व के प्रश्नों पर बहुत प्रभावशाली ढंग से लिखा जाता था। महाराष्ट्र के सार्वजनिक जीवन के एक प्रकार से आदि-संस्थापक महादेव गोविन्द रानाडे भी इसमें लिखते थे। कुछ दिनों बाद इस पत्र के सम्पादक श्रीकृष्ण शास्त्री चिपलूणकर के पुत्र विष्णु शास्त्री चिपलूणकर और बाल गंगाधर तिलक ने मिलकर 1 जनवरी, 1881 में मराठी में 'केसरी' और अंग्रेजी में 'मराठा' नामक दो साप्ताहिक पत्र प्रकाशित किये। डकेन स्टार नामक अंग्रेजी पत्र के सम्पादक राम जोशी भी इसमें आ गए और यह पत्र 'मराठा' में मिला लिया गया। इनके एक अन्य साथी प्रसिद्ध लेखक आगरकर थे। कोल्हापुर के दीवान के विरुद्ध तक लेख छापने पर तिलक और आगरकर को सजा हुई और बाद में जब 1897 में पूना में प्लेग फैला और एक कमिश्नर रैंड के अत्याचार असहनीय हो गए तो लोकमान्य तिलक ने 4 मई, 1897 में एक लेख प्रकाशित किया जिसमें लिखा था कि "बीमारी तो एक बहाना है वास्तव में सरकार लोगों की आत्मा को कुचलना चाहती हैं। मिस्टर रैंड अत्याचारी हैं और जो कुछ वे कर रहे है, वह सरकार की आज्ञा से ही कर रहे हैं, इसलिए सरकार के पास प्रार्थना देना व्यर्थ हैं। "इस लेख के पश्चात् चापेकर बन्धुओं ने 22 जून को रैंड की हत्या कर दी थी।


15 जून को 'केसरी' में तिलक का जो अग्रलेख निकला था, उसको लेकर उन्हें डेढ़ वर्ष की सजा दी गई और इसके बाद लोकमान्य तिलक भारतीय स्वाधीनता संग्राम के अत्यन्त प्रमुख नेता स्वीकार कर लिए गए। उन्होंने ही यह नारा दिया कि 'स्वाधीनता मेरा जन्म सिद्ध अधिकार हैं और मैं उसे लेकर रहूंगा। उनका 'केसरी' सारे भारत में स्वाधीनता संग्राम का एक प्रबल प्रचारक बन गया और उन्हें 1908 में राजद्रोह सम्बन्धी बैठक, अध्यादेश और विधेयक का विरोध करने के लिए 6 वर्ष के काले पानी की सजा दी गयी। 'केसरी' और 'मराठा' स्वाधीनता आन्दोलन के प्रमुख प्रवर्तक बन गए और सारे देश में उनका आदर्श अनुकरणीय माना गया। नागपुर और बनारस से हिन्दी कैसरी' निकला और जब 1920 में बनारस से 'आज' का प्रकाशन प्रारम्भ हुआ तो उस सम्बन्ध में दिशा-निर्देश लेने के लिए बाबूराव विष्णु पराड़कर, लोकमान्य तिलक से मिलने पूना गये थे।