भारतीय प्रांत एवं पत्रकारिता - Indian Provinces and Journalism
भारतीय प्रांत एवं पत्रकारिता - Indian Provinces and Journalism
भारत का कोई प्रांत ऐसा नहीं था जिसने राष्ट्रीयता का प्रचार करने वाले पत्रों और पत्रकारों को जन्म न दिया हो। बम्बई से 'बाम्बे क्रोनिकल तो निकला ही, उसके ही एक सम्पादक बी० जी० होर्नीमैन ने 'बाम्बे क्रोनिकल' को उग्र राष्ट्रीयता का एक प्रबल पत्र बना दिया तथा 'बाम्बे सेंटीनल' निकाला। उन्होनें सत्याग्रह सभा की कार्रवाइयों में भाग लिया और जलियांवाला हत्याकांड अत्याचारों की जो रिपोर्ट छापीं उसके कारण उनके संवाददाता गोवर्धन दास को फौजी अदालत से 3 साल की सजा हुई और होर्नीमैन को बीमारी की अवस्था में इंग्लैंड वापस भेज दिया गया। बम्बई में ही अमृतलाल सेठ ने गुजराती 'जन्मभूमि को जो काठियावाड़ की रियासतों की प्रजा के पत्र के रूप में निकला था, राष्ट्रीय आन्दोलन का प्रबल संवाहक बनाया। इसी प्रकार का दूसरा गुजराती पत्र सांवलदास गांधी का 'सांझ वर्तमान' था। सांवलदास गांधी ने सन् 1942 के भारत छोड़ो आन्दोलन में महत्वपूर्ण भाग लिया था और जूनागढ़ सरकार के विरुद्ध समानांतर सरकार बनायी थी, जिसने 1947 में जूनागढ़ के नवाब को भारत छोड़कर जाने के लिए विवश किया। सिंघ में साधु टी० एल० वासवानी ने 'न्यू टाइम्स' निकाला और सिंधी पत्र 'हिन्दू' के तीन सम्पादक जयरामदास दौलतराम डॉक्टर चौइथराम गिडवानी और हीरानन्दः कर्मचन्द गिरफ्तार किए गए तथा प्रेस बन्द कर दिया गया और उनकी सम्पत्ति जब्त कर ली गयी। सन् 1932 के आन्दोलन में संपादक और प्रबन्ध विभाग के सारे कर्मचारी गिरफ्तार कर लिये गए थे। सन् 1942 में इसका प्रकाशन गांधी जी की अपील पर बन्द कर दिया गया।
बिहार के राष्ट्रीय पत्रों में सच्चिदानन्द सिन्हा द्वारा स्थापित 'सर्चलाइट पत्र मुरली मनोहर सिन्हा के सम्पादकत्व में राष्ट्रीय आन्दोलन का बड़ा पक्षधर रहा। बिहार के हिन्दी पत्रों में देवव्रत शास्त्री द्वारा स्थापित 'नवशक्ति' और 'राष्ट्रवाणी' राष्ट्रीय आन्दोलन के पत्र रहे। 'साप्ताहिक योगी' और 'हुंकार' ने भी जनजागरण में महत्वपूर्ण योगदान दिया। बंगाल में हेमंत प्रसाद घोष ने 1914 में 'बसुमती' की स्थापना की थी और मृणाल कांति घोष, प्रफुल्लकुमार सरकार और सुरेशचन्द्र मजूमदार ने आनन्द बाजार पत्रिका की स्थापना की। 'आनन्द बाजार पत्रिका आज भी बांग्ला भाषा का लोकप्रिय और सबसे बड़ा पत्र है। चितरंजनदास ने 1923 में 'फारवर्ड' पत्र निकाला था और इन पत्रों का राष्ट्रीय आन्दोलन में बड़ा योगदान रहा। मद्रास में एनी बेसेंट ने 'मद्रास स्टैंडर्ड' पत्र को खरीद कर उसका नाम 'न्यू इंडिया कर दिया और 14 जुलाई 1914 से अपने सम्पादकत्व में उसे निकालना प्रारम्भ किया। यह पत्र भी दक्षिण भारत में होमरूल आन्दोलन और कांग्रेस आन्दोलन का प्रबल पक्षधर था। इस पत्र के विरुद्ध कार्रवाई शुरू की गयी, पहले दो हजार रूपये की और फिर दस हजार रूपये की जमानत मांगी गयी और एनी बेसेंट को नजरबन्द कर दिया गया।
स्वतंत्रता आन्दोलन में पत्रकारों के योगदान का इतिहास वस्तुतः स्वतंत्रता आन्दोलन का इतिहास हैं क्योंकि ज्यादातर मामलों में या तो पत्र का सम्पादक स्वयं स्वतन्त्रता का नेता हो गया या नेता ने अपने विचारों को प्रकट करने के लिए पत्र निकालना आवश्यक समझा। अगर चितरंजन दास का 'फारवर्ड' था तो जे० एम० सेन गुप्त का, एडवांस था, मोहम्मद अली का कामरेड था तो मौलाना अबुल कलाम आजाद का 'अल हिलाल था। मौलाना अब्दुल बारी ने 'हमदम' निकाला था, सर्वेन्ट आफ इण्डिया सोसाइटी ने नागपुर से 'हितवाद' माखन लाल चतुर्वेदी ने पहले जबलपुर से और फिर खण्डवा से 'कर्मवीर का प्रकाशन किया और विजय सिंह पथिक ने 'राजस्थान पत्र का, जो बाद में 'तरूण राजस्थान हो गया। पूना का 'ज्ञान प्रकाश' और 'इन्दू प्रकाश, लखनऊ का 'एडवोकेट' आदि ऐसे अनेक पत्र और पत्रिकाएं थीं, जिनका नाम स्वाधीनता संग्राम से जुड़ा हुआ हैं। कुछ ने पत्रकारों की एक नयी श्रृंखला ही उत्पन्न कर दी जिनमें टी० प्रकाशम् द्वारा स्थापित मद्रास का 'स्वराज्य' या मूलचन्द अग्रवाल द्वारा स्थापित 'विश्वमित्र' उल्लेखनीय हैं। देशी राज्यों में भी बहुत से समाचार पत्र निकले। यद्यपि उन्हें पड़ोस के अंग्रेजी इलाकों से निकालना ज्यादा सुरक्षित होता। केरल के 'मलयाली मनोरमा' को सरकार का कोपभाजन होना पड़ा और कालीकट का 'मातृभूमि तो मलयालम भाषा में स्वाधीनता का प्रबल समर्थक था। इसी प्रकार का पत्र कर्नाटक में हुबली में स्थापित संयुक्त कर्नाटक अथवा मद्रास की तेलुगु, आंध्र पत्रिका या स्वदेश मित्रम् जो तमिल में छपता था और उड़िया पत्र समाज का 'असम ट्रिब्यून और नूतन असमिया थे। अगर राष्ट्रीय आन्दोलन के समय ये सभी पत्र उपलब्ध न होते, तो हमारे राष्ट्रीय आन्दोलन का स्वरूप किस प्रकार का होता इसका अनुमान लगाना अत्यन्त कठिन हैं।
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