सिन्धु सभ्यता, विस्तार, क्षेत्र तथा कालक्रम - Indus Civilization, Expansion, Area and Chronology
सिन्धु सभ्यता, विस्तार, क्षेत्र तथा कालक्रम - Indus Civilization, Expansion, Area and Chronology
इस इकाई का उद्देश्य
सिन्धु सभ्यता के प्रारंभिक ज्ञान का परिचय देना है, साथ ही सिन्धु सभ्यता के विस्तार,
क्षेत्र तथा कालक्रम की जानकारी उपलब्ध कराना है। इस इकाई के अध्ययन
के उपरांत आप अग्रांकित के विषय में जानकारी प्राप्त कर सकेंगे
1 सिन्धु सभ्यता का सामान्य परिचय
2. सिन्धु सभ्यता का विस्तार क्षेत्र
3- सिन्धु
सभ्यता का कालक्रम
सिन्धु सभ्यता का परिचय
1921 में दयाराम साहनी ने हड़प्पा की खुदाई की और इस सभ्यता के अवशेषों को पुराविदों के समक्ष रखा, लगभग इसी समय सन् 1922 में बनी ने मोहनजोदड़ो की खुदाई की और हड़प्पा से मिलते जुलते साक्ष्य प्रकाशित किये। यद्यपि दोनों स्थलों की दूरी लगभग 485 किलोमीटर है तथापि दोनों स्थलों में प्राप्त सामग्री में अद्भुत समानता है। सन् 1928 एवं 1933 में मास्वरूप व नेहा में 1946 में व्हॉलरने मोहनजोदड़ो में उत्खनन किया और इस सभ्यता से संबंधित अनेक जानकारिया उद्घाटित की। आगे चलकर एन. जी. मजूमदार, मैके. एस. आर. राव, डेल्स, फेरसर्विस इत्यादि पुराविदों ने सिन्धु सभ्यता के विभिन्न स्थलों में उत्खनन कार्य करवाये और हड़प् सभ्यता की अनेक जानकारियां प्रस्तुत की। श्योंकि यह सभ्यता सर्वप्रथम में खोजी थी अत: कुछ विद्वान इसे हड़प्पा सभ्यता के नाम से पुकारना पसंद करते हैं जबकि कुछ विद्वान सभ्यता के अधिकांश लगभग 250 स्थलों का सिन्धु घाटी में सकेन्द्रण के कारण इसे सिन्धु सभ्यता पुकारना अधिक सही मानते हैं।
सिन्धु सभ्यता की जानकारी के स्रोत
सिन्धु सभ्यता एक नगरीय
सभ्यता थी और हमें उत्खनन से ऐसे विभिन्न नगर प्रकाश में आये हैं। इन नगरों में
मोहनजोदड़ो हड़प्पा कालीबंगन सूरकोटडा बनावली, लोथल, रंगपुर,
धौलावीरा इत्यादि को सम्मिलित किया जा सकता है। इन नगरों का नगर
विन्यास हमें तत्कालीन जीवन के विषय में अनेकानेक महत्वपूर्ण सूचनाऐं प्रस्तुत
करता है।
उत्खनन से जो धातुऐं
प्रकाश में आयीं हैं उनमें सोना, चांदी, सीसा, तांबा कांसा प्रमुख हैं, यहां लोहे के प्रयोग की कोई
जानकारी नहीं मिलती है। अन्य सामग्री में हमें सीपियों, हाथी
दाँत तथा विभिन्न जानवरों की हड्डियों का प्रयोग मिलता है। वस्त्र के लिए सिन्धु
नागरिक कपास और ऊन का प्रयोग करते थे। मुद्राओं एवं मृण्मूर्तियों में अंकित चित्र
उनके वस्त्र विन्यास, केश विन्यास आदि पर पर्याप्त प्रकाश
डालते हैं। सिन्धु घाटी के उत्खनन से पर्याप्त मात्रा में आभूषण भी मिले हैं,
हम कह सकते हैं कि सिन्धु सभ्यता में स्त्रियाँ एवं पुरूष दोनों ही
आभूषणों के शौकीन थे और दोनों ही हार, कंगन, अंगूठी का प्रयोग करते थे जबकि कमरबन्द नाक के कांटे, बुंदे और नूपुर का प्रयोग केवल स्त्रियां करती थीं। अमीर वर्ग के आभूषण
सोने, चांदी, मोतियों और हाथी दांत के
होते थे जबकि निर्धन और गरीब लोगों के आभूषण सीपियों, हड्डियों,
तांबे और कम कीमत के पत्थरों से निर्मित होते थे। सौन्दर्य प्रसाधन
के भी अनेक उपकरण प्रकाश में आये हैं। सिन्धु नगरों से प्राप्त संरचनाओं, मुहरों एवं मृणमूर्तियों के अध्ययन से सिन्धुकालीन सामाजिक जीवन, धार्मिक जीवन एवं आर्थिक जीवन का अच्छा परिचय प्राप्त होता है।
सिन्धु सभ्यता का विस्तार तथा क्षेत्र
सिन्धु सभ्यता पश्चिम
दिशा से पूर्व दिशा तक लगभग 1500 किलोमीटर तथा उत्तर दिशा से दक्षिण दिशा तक लगभग 1200
किलोमीटर के क्षेत्र में बिस्तृत है। सिन्धु सभ्यता के कुछ स्थल
पश्चिम दिशा में बलूचिस्तान में मकरान समुद्र तट के पास प्राप्त होते हैं, इनमें सबसे दूर स्थित स्व आधुनिक पाकिस्तान-ईरान सीमाप्रांत में स्थित
सुत्कलैंडोर है, यह स्थल एक व्यापारिक चौकी पा बंदरगाह रहा
होगा। सिन्ध के पूर्व में कच्छ के समीप समुद्रतट के आसपास भी स्थल मिलते हैं..
इनमें सबसे महत्वपूर्ण केम्बे की खाड़ी में विद्यमान लोधल नामक स्थल है।
पूर्व दिशा में भी सिन्धु
सभ्यता का व्यापक प्रसार दिखता है। यहां हम मेरठ जिले के आलमगीरपुर नामक स्थान में
सिन्धु सभ्यता के अवशेष मिले है। इस संदर्भ में शाहजहाँपुर जनपद का हुलास नामक
स्थल भी महत्वपूर्ण है, यहां हुआ उत्खनन भी सिन्धु सभ्यता के यहां तक के
प्रसार को दर्शाता है। उत्तर दिशा में भी सिन्धु संस्कृति पर्याप्त विस्तृत थी,
उत्तर दिशा में पहले इस सभ्यता की सीमा पंजाब में स्थित रोपड़ नामक
स्थल तक मानी थी परंतु अब जम्मू-काश्मीर राज्य में स्थित मांड तक इस सभ्यता के
स्थल मिल चुके हौदक्षिण दिशा में भी सिन्धु सभ्यता का व्यापक प्रसार हुआ आपूर्व की
खोजों के अनुसार पहले इस सभ्यता की दक्षिणी सीमा गुजरात प्रांत में स्थित एक छोटी
सी नदी किम के समीप स्थित भगव नामक स्थल तक मानी जाती थी लेकिन बाद के उत्खनन ने
सभ्यता की सीमा महाराष्ट्र राज्य के अहमदनगर जिले में स्थित देमाबाद तक विस्तृत कर
दी है।
सिन्धु सभ्यता का कालक्रम
सिन्धु सभ्यता की तिथि के
संबंध में व्यापक विवाद रहा था, लेकिन वैज्ञानिक प्रविधियों के प्रयोग के उपरांत
पुराविद् सिन्धु सभ्यता का सही कालक्रम निर्धारित करने में सफल हुए हैं। सिन्धु
सभ्यता की तिथि के संबंध में विभिन्न विद्वानों के विचारों का संक्षिप्त परिचय
जानना ठीक होगा।
जान मार्शल का सुझाया कालक्रम
जान मार्शल जैसे विद्वानों के अनुसार सिन्धु सभ्यता तीसरी सहस्राब्दी ईसा पूर्व की सभ्यता है । इन विद्वानों ने सिन्धु सभ्यता का प्रोचीन मेसोपोटामिया के नगरों के साथ संबंधी और इन संबंधों के फलस्वरूप आदान-प्रदान की गयी वस्तुओं के आधार पर तिथि निर्धारण का प्रयास किया है। मार्टिमर व्हीलर का सुझाया कालक्रम मार्टिमर व्हीलर ने भौ सिन्धु नगरों से पाये गये पुरावशेषों का पश्चिम के पुरावशेषों के साथ तुलनात्मक अध्ययन दुवारा काल निर्धारण का प्रयास किया और 2500 ईसा पूर्व से 1500 ईसा पूर्व सिन्धु सभ्यता का काल निर्धारित किया।
सी. एल. फैबी का सुझाया कालक्रम
सी. एल. फैबी नामक पुरातत्ववेत्ता ने मोहनजोदड़ो में पाये गये एक बरतन पर अंकित सुमेरो बेबिलोनियन लेख के आधार पर सिन्धु सभ्यता का काल 2800 ईसा पूर्व से 2500 ईसा पूर्व में निर्धारित किया है। फादर हेरास का सुझाया कालक्रम फादर हेरास नामक विद्वान ने नक्षत्रीय गणना के आधार पर सिन्धु घाटी की सभ्यता का काल 5600 ईसा पूर्व तक बतलाया है।
डी. पी. अग्रवाल का सुझाया कालक्रम
वर्तमान में उपलब्ध
वैज्ञानिक प्रविधियों का प्रयोग करते हुए डी.पी. अग्रवाल ने कार्बन 14 तिथि
निर्धारण के आधार पर सिन्धु सभ्यता का कालक्रम 2300 ईसा
पूर्व से 1750 ईसा पूर्व निर्धारित किया है, वर्तमान में डॉ. अग्रवाल द्वारा निर्दिष्ट तिथिक्रम को सर्वाधिक मान्यता
प्राप्त है।
सिंधु सभ्यता एक नगरीय
सभ्यता थी और हमें उत्खनन से ऐसे विभिन्न नगर प्रकाश में आये हैं। इन नगरों में
मोहनजोहा कालीबंगन सूरको बनावल सोयल रंगपुर धौलावीरा इत्यादि को सम्मिलित किया जा
सकता है।इन नगरों का नगर विकास में उत्कालीन जीवन के विषय में अनेकानेक
महत्त्वपूर्ण सूचनाएं प्रस्तुत करता है,
वर्तमान में यह सभ्यता
आधुनिक पाकिस्तान से भी आगे तक विस्तृत हो चुकी हैसियत पश्चिम दिशा से पूर्व दिशा
तक लगभग 1500 किलोमीटर
तथा उत्तर दिशा में दक्षिण दिशा तक लगभग 1200 किलोमीटर के
क्षेत्र में विस्तृत है। सिन्धु सभ्यता का सम्पूर्ण क्षेत्र एक विशात त्रिभुज की
भांति है और लगभग 13 लाख वर्ग किलोमीटर का क्षेत्र समेटे हुए
है। यह क्षेत्रफल आधुनिक पाकिस्तान से तो बदर है ही प्राचीन मिस्र और मेसोपोटामिया
के संयुक्त क्षेत्रफल से भी बड़ा है। सिन्धु सभ्यता की तिथि के संबंध में व्यापक
विवाद रहा था, लेकिन वैज्ञानिक प्रविधियों के प्रयोग के
उपरान्त पुराविद् सिन्धु सभ्यता का सही कालक्रम निर्धारित करने में सफल हुए हैं।
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