सिन्धु संस्कृति की उत्पत्ति, विकास, निरंतरता तथा विशेषताऐं - Indus Culture - Origin, Development, Continuity and Characteristics

सिन्धु संस्कृति की उत्पत्ति, विकास, निरंतरता तथा विशेषताऐं - Indus Culture - Origin, Development, Continuity and Characteristics

सिन्धु संस्कृति की उत्पत्ति, विकास, निरंतरता तथा विशेषताऐं - Origin, Development, Continuity and Characteristics of Indus Culture
 

इस इकाई का उद्देश्य आपको सभ्यता से संबंधित अन्य तथ्यों से अवगत कराना है। इस इकाई के अध्ययन के उपरांत आपको निम्नांकित तथ्यों के विषय में जानकारी हो सकेगी

 

1. सिन्धु सभ्यता की उत्पत्ति से संबंधित विभिन्न विचारधाराएँ


2. आगामी कालखण्डों में सिन्धु सभ्यता की निरंतरता


3. सिन्धु सभ्यता की प्रमुख विशेषताऐं

 

सिन्धु सभ्यता की उत्पत्ति तथा विकास

 

प्रथम विचारधारा

विचारधारा के अनुसार, सिन्ध संस्कृति और कल्ली-नाल तथा झोब संस्कृतियों के मध्य निश्चित सम्बन्ध हैं। दक्षिण-मध्य बलूचिस्तान तथा लासबेला में नाल तथा प्रारंभिक कल्ली संस्कृति के अवशेष प्राप्त होते हैं। झोब संस्कृति, सुलेमान पहाड़ियों के पश्चिम में फली फूली थीं। ये संस्कृतियां चतुर्थ या तृतीय सहस्राब्दी ईसा पूर्व में अस्तित्व में थीं। इन संस्कृतियों के मध्य सम्बन्ध बैठाने के लिए कुछ निश्चित प्रमाण दिये जाते हैं, जैसे- सिन्ध में बाद के काल में कृषि का होना यह दर्शाता है कि बलूचिस्तान और दक्षिणी अफगानिस्तान की कुछ खेतिहर जनजातियो सिन्ध तक प्रवेश कर गयीं थीं। इसके अलावा उत्तर-पूर्वी सिन्ध से प्राप्त कुछ प्रमाण यह दर्शाते हैं कि प्रारंभिक हड़प्पा सभ्यता की स्थानीय शैली, उत्तरी तथा मध्य बलूचिस्तान से प्राप्त की गयी थी। ये सभी सभ्यताऐं नदियों के किनारे पल्लवित हुयी थी और सभी कृषि पर आधारित थीं, इसके अलावा इस बात के भी प्रमाण हैं कि प्रारंभिक हड़प्पा 'बस्तियों ने बलूचिस्तान तथा झोब की संस्कृति के साथ एक लम्बे काल तक स्थिर संबंध रखे थे। दक्षिण-पश्चिम ईरान तथा कुल्ली सभ्यता के मृणभाण्डों तथा अन्य तथ्यों में समानताऐं हैं, इसके अलावा ईरानी तथा कुल्ली दोनों ही प्रकार के साक्ष्य सूरकोटडा से प्राप्त हुए हैं, धातुकार्मिक दक्षता भी कुल्ली-नाल तथा हड़प्पा सभ्यता में समानता रखती है। झोब संस्कृति में मातृदेवी तथा लिंग के अवशेष भी प्राप्त होते हैं तथा साथ ही सांड आकृति जोकि सिन्धु सभ्यता में दिखाई देती है, झोब संस्कृति में एक प्रिय विषय या चिह्न के रूप में प्राप्त होती है।

 




द्वितीय विचारधारा

उद्गम के संबंध में एक दूसरे विचार के अनुसार हड़प्पा सभ्यता को आमरी सभ्यता की प्रच्छाया बताया गया है। इस विचार के अनुसार आमरी में पहले शहरी सभ्यता उत्पन्न हुई और फिर मानव धीरे धीरे अन्य बस्तियों की खोज करते आगे बढ़ा। इस संदर्भ में पुराविद् कासल ने पूर्व हड़प्पा काल से बाद के हड़प्पा काल तक भौगोलिक स्तरीकरण निश्चित किया हैं। आमरी बस्तियों में मृणभाण्ड बिना चाक की सहायता के हाथ से बने हुए तथा धातु चिह्न अत्यल्प हैं। किंतु बाद के स्तर में अलंकृत भाण्ड तथा बिना पकी हयाँ मिट्टी की ईटों से बने भवन मिलते हैं, इसके अलावा खुदाई से पता चलता है कि आमरी सभ्यता की कुछ विशिष्ठ परंपराऐं हड़प्पा सभ्यता की परंपराओं से मेल खाती हैं। उपरोक्त ज्ञान के बावजूद भी हड़प्पा सभ्यता और प्रारंभिक आमरी सभ्यता के बीच संबंध नहीं बैठाया जा सकता है, हालांकि आमरी के मणभाण्ड हड़प्पा के नगर प्राचीर के चारों तरफ पाये गये हैं मोहनजोदड़ो के निचले स्तर में अवश्य बलूचिस्तान की सभ्यता का प्रभाव मिलता है ना कि आमरी सभ्यता का, अतः तोथ्यिक दृष्टि से कहा जा सकता है कि आमरी सभ्यता से हड़प्पा सभ्यता का विकास नहीं हुआ था।








तृतीय विचारधारा

उद्गम से संबंधित एक अन्य विचार के अनुसार हड़प्पा और मोहनजोदड़ो से प्राप्त संरचनाओं का संबंध ईसा पूर्व सांतवीं सहस्राब्दी में अनातोलिया के कैटल हुयुक तथा बलूचिस्तान के जैरिको और साथ ही सुमेरिया के उदाहरणों के साथ संबंधित किया जा सकता है। अनातोलिया नगर में घुसपैठियों से रक्षा के लिए नगर के चारों ओर सीड़ियों की श्रृंखला सी उठा दी गयी है। इस नगर के लोग मृणभाण्डों का प्रयोग जानते थे तथा प्रस्तर प्रतिमाओं की पूजा करते थे। जेरिकों में एक अति विशिष्ठ प्रस्तर प्राचीर से घिरा नगर मिला है। हांलाकि कैटल हुयुक और जैरिको के लोग प्रारंभिक कृषक समुदाय से संबंधित थे फिर भी उन्होंने नागरिक जीवन के कुछ निश्चित अंग विकसित कर लिए थे। सुमेरियाइयों ने मंदिर तथा मिट्टी की ईंटों से बने जिग्गुरात बनाये जो कि कृत्रिम पर्वतों की भांति दिखते थे। इसी प्रकार सिन्धु सभ्यता के स्थलों के भी दो भाग हैं, एक शहर का उठा हुआ भाग तथा दूसरा निचले स्तर में स्थित नगर। लेकिन इन समानताओं के बावजूद भी यह सिद्ध नहीं किया जा सकता है कि हडप्पा सभ्यता किसी निश्चित नगरीय सभ्यता से प्रभावित रही हो ।

 

सिन्धु सभ्यता की उत्पत्ति तथा विकास

 

चतुर्थ विचारधारा

 

उद्गम से संबंधित एक अन्य विचार के अनुसार, सिन्धु सभ्यता सुमेर सभ्यता की ऋणी है। सुमेर सभ्यता और सिन्धु सभ्यता के मध्य निश्चित संबंधों की जानकारी है। गिल्गामेश आकृति एनकिड, सांड- मानव मुद्राओं और मृण्मूर्तियों में गोदीबाई के चिह्न भारतीय तट को मेसोपोटामिया में मैलुह्ह की संज्ञा का मिलना आदि मेल हमें प्राप्त होते हैं। लेकिन हमें मालूम है कि इन संबंधों के बावजूद भी सिन्धु नागरिकों ने सुमेरियाइयों से अपने विकास तथा उत्तरजीविता के संबंध में कुछ विशिष्ठता नहीं प्राप्त की या कुछ खास नहीं सीखा। उदाहरण के लिए हम कह सकते हैं कि सुमेरियाइयों की उत्कृष्ठ सिंचाई व्यवस्था तथा उच्चकोटि की कलाकृतियों को जानने या अपनाने के प्रमाण हमें नहीं मिलते हैं। इन सबसे प्रमुख यह बात है कि सिन्धु लिपि की, पश्चिम एशिया की किसी भी लिपि से संबंधता नहीं मिलती है अर्थात यह सुमेर की लिपि से बिल्कुल भिन्न है। हम केवल यह मान सकते हैं कि पश्चिम ऍशियाइयों और सिन्धु सभ्यता के मध्य संबंध थे लेकिन यह संबंध सैन्धव सभ्यता के मूल में नहीं थे, इसके अतिरिक्त सिन्धु सभ्यता एक स्टैटाइट सभ्यता थी जबकि सुमेर की सभ्यता में स्टैटाइट के कुछ ही दाने मिले हैं।


पंचम विचारधारा

उद्गम से संबंधित एक अन्य महत्वपूर्ण विचार के अनुसार, हडप्पा सभ्यता, सिन्धु घाटी के अंदर चलने वाली एक दीर्घकालीन विकास प्रक्रिया का परिणाम है। सिन्ध सभ्यता के अनेक लक्षणों का मूल हमें वहीं प्राप्त आरंभिक स्तर की ग्रामीण संस्कृतियों में मिलता है। सिन्धु सभ्यता का निचला स्तर निश्चत रूप से हड़प्पा सभ्यता की प्रस्तावना के रूप में एक लम्बे काल से चलने वाली स्थानीय कृषि और तकनीकी का प्रमाण प्रस्तुत करता है। इस विचार के पीछे अन्य तथ्य भी हूँ। उस काल में नगर की समकोणीय संरचना की योजना पश्चिम एशिया की किसी भी स्थान में नहीं मिलती है। पश्चिम एशिया के साथ व्यापार भी यह इंगित करता है कि हुडप्पा सभ्यता में अत्यंत उच्चकोटि का विकसित माल बनता होगा और अवश्य ही विकास के इस स्तर को प्राप्त करने में दीर्घकालीन समय लगा होगा। इसके अलावा हाल की पुरातात्विक खुदाइयां भी बहुत सी पुरा हडप्पीय और विकसित -हड़प्पीय बस्तियों के मध्य निरंतरतों को बतलाती हैं। इस संदर्भ में चन्हदाड़ों का उदाहरण दिया जा सकता है, जो मनके बनाने वालों का केन्द्र रहा था। यहां हमें संस्कृति की निरंतरता प्राप्त होती है। यद्यपि बलूचिस्तान में अनेक स्थलों और कालीबंगन में हड़प्पा-पूर्व बस्तियों के अवशेष मिले हैं तथापि उनमें और हड़प्पा संस्कृतियों के स्थलों में कोई बहुत स्पष्ट संबंध दिखाई नहीं देता, यद्यपि संभव है कि हड़प्पा सभ्यता का विकास इन्ही देशज बस्तियों से हुआ हो। सिन्धु सभ्यता के निर्माता किस समुदाय से संबंधित थे, इसे निश्चित करना वर्तमान में टेढ़ी खीर है फिर भी प्राचीन नर कंकालों का अध्ययन कर पुराविदों ने इस सभ्यता में प्रोटो ऑस्ट्रेलॉयड भूमध्य सागरीय, मुगोल तथा अल्पाइन प्रजातियों के मानव जन के निवास करने को प्रमाणित किया है।

 

सिन्धु सभ्यता की निरंतरता


धार्मिक जीवन में निरंतरता

1. सिन्धु घाटी से प्राप्त अनेक मुद्राओं में सिन्धु देवताओं को अर्दध मानव अर्दध-पशु की आकृति में अंकित किया गया है, इसी प्रकार की कल्पना हमें पौराणिक नृसिंह अवतार में भी मिलती है।

 

2 हड़प्पा सभ्यता की योगी की मूर्ति को शिव पशुपति का रूप माना गया है। मूर्ति के चारों ओर जानवर हैं (पशुपति), आकृति ध्यान मग्न है योगीश्वर), तीन मुखों का संबंध बाद की तीन आँखों की कल्पना से मालूम पड़ता है और लंबी शिरोभूषा के साथ दोनों सींगों ने आगे चलकर त्रिशूल का रूप धारण कर लिया होगा। लिंगों की प्राप्ति से यह मिलान और भी सबल हो जाता है क्योंकि शिव, वर्तमान में सर्वत्र लिंग रूप में ही पूजित हैं।

 

3 सिन्धु घाटी से मातृदेवी की मूर्तियां भी पर्याप्त मात्रा में मिली है, मात देवी को बाद के देवताओं की अधांगिनियों या मातृकाओं के रूप में संभवतः पूजने की परंपरा चल निकली योनि-पूजा सिन्धु सभ्यता की विशिष्ठता है जो आगे चलकर हिन्दू तंत्रवाद और बौद्ध-तंत्रवादियों की पूजा की विशिष्ठ अंग रही है। शक्ति पूजा के रूप में यह लोकप्रिय है।

 

4. सिन्धु सभ्यता का पवित्र कूबडयुक्त बैल वर्तमान में भी शिव के वाहन नंदी के रूप पवित्र और सर्वत्र पूज्य माना जाता है।

 

5. प्रकृति की पूजा सिन्धु घाटी के धर्म की निरंतरता है। आज भी सिन्धु मुहरों में दर्शाये गये वृक्ष, पीपल, , जीवन-वृक्ष आदि की पूजा होती है। सर्प या नाग देवता भी सिन्धु मुहरों में मिलता है जिसने ऐतिहासिक काल में विभिन्न देशों के चिह्न के रूप में कार्य किया और जो नौग आदि वंशों के नाम से प्रसिद्ध हुए। आज भी गांवों में सर्प देवता के मंदिर दिख जाते हैं। 

 

6. सिन्धु घाटी से प्राप्त ताबीज और मन्त्र-तन्त्र पर विश्वास आज भारतीय सामाजिक व्यवस्था में बना हुआ है। पवित्र स्वास्तिक चिहन का प्रयोग भी सिन्धु घाटी में मिलता है।

 

7. जल-पूजा और सामूहिक स्नान का महत्व सिन्धु सभ्यता से अब तक बना हुआ है। बहुत संभव है कि भारतीय धर्म ग्रंथों की प्रलय की कहानी हड़प्पा सभ्यता की बाढ़ से ही ली गयी हो?

 

8 एक दाढीयुक्त तथा जटायुक्त पुरुष की नग्न मुण्मूर्ति, जिसमें पुरुष सीधे खड़ा है, पैर सटे हुए नहीं वरनु दूर-दूर हैं तथा हाथ बगलों के समानान्तर परन्तु उन्हें छूते नहीं है, बाँद के जैन साधुओं की कार्योत्सर्ग मुद्रा मिलता है।

 

सिन्धु सभ्यता की निरंतरता

सार्वजनिक एवं सामाजिक जीवन में निरंतरता


1.कुछ विद्वान सिन्धु लिपि को ब्राह्मी लिपि का प्रतिरूप मानते हैं किन्तु इस विषय में निश्चित प्रमाण नहीं हैं, यदि ऐसा हो तो लिपि के क्षेत्र में भी निरंतरता माननी होगी।

 

2. नियोजित नगर विन्यास की कल्पना सिन्धु सभ्यता से ही मानी जानी चाहिए

 

3- सिन्धु नागरिकों द्वारा वस्त्र पहनने का तरीका भी महत्वपूर्ण है, मुद्राओं की आकृतियाँ से स्पष्ठ होता है कि वहां पुरुषों दद्वारा अंगरखे का प्रयोग इस प्रकार किया जाता कि वह बांयें कन्धे को ढकता हुआ दायें कन्धे के ठीक नीचे से निकलता था, इसी प्रकार से अंगरखे का प्रयोग आज भी रूढ़िवादी हिन्दू के घर देखा जा सकता है।

 

4 दयूत क्रीड़ा या पांसे का खेल सिन्धु घाटी की ही देन कही जा सकती है।

 

5- वी.जी. चाइल्ड के अनुसार सिन्धु सभ्यता, भवन निर्माण और उद्योग के साथ साथ वेशभूषा तथा धर्म में आधुनिक भारतीय संस्कृति का आधार है।

 

6- सौन्दर्य प्रसाधन, यथा- चूढ़ियां हाथी दांत की कंधियां पाउडर, होंटों को रंगना आदि सिन्धु सभ्यता की निरंतरता मानी जा सकती है।

 

7- सिन्धु सभ्यता से वृहत् परिमाण में मिट्टी के खिलौने मिले हैं, ऐसे ही खिलौनों का प्रयोग बच्चों द्वारा आधुनिक भारतीय गांवों में किया जाते देखा जा सकता है।

 

सिन्धु सभ्यता की निरंतरता

 




आर्थिक जीवन में निरंतरता

 

1 कपास का प्रयोग सिन्धु सभ्यता से निरंतर मिलता है।

 

2. आधुनिक मुर्गी का पूर्व रूप हड़प्पा सभ्यता में देखा जा सकता है।

 

3. सिन्धु सभ्यता का प्रमुख खाद्यान्न गेहूँ, आज भी उत्तर भारत का प्रमुख खाद्यान्न है।

 

4- सिन्धु सभ्यता के बांट-बटखरे, 16 अथवा उसके गुणज भार के हैं, आज भी नाप-तौल के लिए 16 अथवा इसके गुणज की इकाइयां प्रयुक्त होती हैं ।

 

5- कुम्हार का चाक छकड़ा इक्का और नावें आज तक देखी जा सकती हैं। यह सिद्ध नहीं किया जा सकता कि सिन्धु सभ्यता की कौन-कौन सी विशेषताऐं बाद में भी अपनायीं गयीं पर इतना ज्ञात है कि आर्यों की पाचन शक्ति अत्यधिक थी, उन्होंने आगे चलकर अनेक विदेशी समूहों को आत्मसात कर लिया था, स्वंय अनार्यों को भी उन्होंने अपनी जाति व्यवस्था में स्थान दे दिया था, अतः यह असंभव नहीं कि आर्यों ने सिन्धु सभ्यता से पर्याप्त मात्रा में विचार ग्रहण किये हों।

 




सिन्धु सभ्यता की विशेषताऐं

 

1 सिन्धु सभ्यता तृतीय कांस्यकाल की सभ्यता है, हालांकि अधिक वस्तुएँ नहीं मिली हैं, फिर भी जो वस्तुएँ मिलती हैं उनसे इस सभ्यता में कांस्यकाल की सर्वोत्कृष्ट विशेषताऐं परिलक्षित होती हैं, इस संदर्भ में मोहनजोदड़ो की कांस्य नृत्यकी का उदाहरण दिया जा सकता हैं।

 

2- यह सभ्यता नगरीय और व्यापार प्रधान है। इसके अंतर्गत सिन्धु नागरिकों ने आश्चर्यजनक उन्नति की थी। उन्हें नागरीय जीवन की अगणित सुविधाएँ प्राप्त थीं। विशाल नगरों पक्के भवनों सुव्यवस्थित सड़कों, नालियों और स्नानागारों के निर्माता सुदृढ़ शासन पद्धति और धार्मिक व्यवस्था के व्यवस्थापक तथा आंतरिक उद्योग धंधों और विदेशी व्यापार के संगठनकर्ता सिन्धु निवासियों की इस चतुर्दिक अभ्युन्नति के पीछे साधना और अनुभव की एक सुदीर्घ परंपरा थी। इसीलिए सिन्धु प्रदेश की सुख-शांति और विलासिता को देखते हुए कहा गया है कि यहां का साधारण नागरिकै सुविधा और विलास का जिस मात्रा में उपभोग करता था उसकी तुलना समकालीन सभ्य संसार के अन्य भागों से नहीं की जा सकती है।

 

3- सिन्धु सभ्यता में खाद्य अतिरेक की उपलब्धता थी, व्यापार वाणिज्य का उच्च स्तर था, उन्हें लिपि की जानकारी थी, वे अपनी आवश्यकता के पदार्थों के लिए सक्रिय वाणिज्यिक क्रियाकलाप करते थे, सिन्धु नागरिकों में बहुत अधिक मिश्रित सामाजिक स्तरीकरण श्रम विभाजन मिलता है। उद्योग-धंधी और शिल्पों की अधिकता इस सभ्यता में दिखाई देती है।

 

4- सिन्ध सभ्यता शान्तिमूलक थी उसके संस्थापकों को युद्ध से अनुराग नहीं था, यही कारण है कि सिन्धु प्रदेश के उत्खनन में कवच शिरस्त्राण और ढाल नहीं मिले हैं। जो अस्त्र-शस्त्र मिले हैं उनका प्रयोग बहुधा आत्म-रक्षा अथवा आखेट के लिए किया जाता था।

 

5. सिन्धु सभ्यता के अंतर्गत धर्म विदेवतामूलक था। सिन्धु निवासियों की श्रद्धा-भक्ति के प्रमुख केन्द्र थे दो देवता- एक पुरुष के रूप में और दूसरा नारी के रूप में पुरुष और नारी के चिरंतन द्वन्द का यह मधुर दैवीकरण सिन्धु निवासियों की निशित कल्पना का परिचायक है। 6- सिन्धु सभ्यता में लेख, गणना और माप की प्रतिष्ठा हो चुकी थी, इन्होंने उसकी प्रगति को सत्वरता प्रदान की होगी।

 




सारांश 

सिन्धु सभ्यता के उद्गम के विषय में पुरावशेषों की अपूर्णता और लिपि सम्बन्धित अज्ञानता के कारण किसी निश्चित विचार को ग्रहण करना अभी संभव नहीं है, फिर भी सभ्यता के उद्गम के विषय में उपरोक्त कुछ विचारधाराएँ महत्वपूर्ण एवं उल्लेखनीय हैं। इनमें से सर्वाधिक रोचक विचार तो यही प्रतीत होता है कि सिन्धु सभ्यता के विकास का आधार स्थानीय स्तर की ग्रामीण थीं। सिन्धु संस्कृति की निरंतरता भारतीय सभ्यता के धार्मिक, सामाजिक या सार्वजनिक तथा आर्थिक जीवन में दिखाई देती है। आर्यों की पाचन शक्ति अत्यधिक थी उन्होंने आगे चलकर अनेक विदेशी समूहों को आत्मसात कर लिया था, स्वय अनार्यों को भी उन्होंने अपनी जाति व्यवस्था में स्थान दे दिया था, सिन्धु सभ्यता का परम पुरुष जो शिव का पूर्व रूप प्रतीत होता है, आर्यों द्वारा महादेव के रूप में स्वीकार किया गया। अतः यह असंभव नहीं कि आर्यों ने सिन्धु सभ्यता से पर्याप्त मात्रा में विचार ग्रहण किये हो । सिन्धु सभ्यता नगरीय और व्यापार प्रधान है। इसके अंतर्गत सिन्धु नागरिकों ने आश्चर्यजनक उन्नति की थी। उन्हें नागरीय जीवन की अगणित सुविधाएँ प्राप्त थीं।