सामाजिक आन्दोलनों का परिचय - Introduction to Social Movements
सामाजिक आन्दोलनों का परिचय - Introduction to Social Movements
स्वतंत्रता मनुष्य की सर्वश्रेष्ठ चाहत है। इसे पाने अथवा इसकी सुरक्षार्थ मनुष्य प्रतिकार करता है। प्रतिकार तथा प्रतिरोध किसी भी समाज के साथ किये जा रहे शोषक व्यवहार, अन्याय तथा आर्थिक, सांस्कृतिक घुसपैठ से स्वाभाविक असहमति की अभिव्यक्ति है। प्रतिकार का जैविक या मानवीय गुण सभी में होता है भारतीय स्वतंत्रता संग्राम सेनानी केवल नहीं लड़े थे वरन् उनका उद्देश्य एक नवीन व्यवस्था की स्थापना करना भी था। राजनीतिक स्वतंत्रता के लिये ही आर्थिक, सामाजिक असमानताओं को घटाने जनसाधारण की गरीबी, बेरोजगारी एवं मानव गरिमा की पुर्नस्थापना, नागरिक अधिकारों की गारंटी, साम्प्रदायिक सौहार्द की पुर्नस्थापना और सभी को न्याय दिलाने के सम्बन्ध में तत्कालीन नेताओं का एक स्पष्ट दृष्टिकोण था।
भगत सिंह ने कहा था-"देश को एक आमूल परिवर्तन की आवश्यकता है.....जब तक मनुष्य के द्वारा मनुष्य तथा एक राष्ट्र के द्वारा दूसरे राष्ट्र का शोषण, जो साम्राज्यशाही के नाम से विख्यात है, समाप्त नहीं कर दिया जाता तब तक मानवता को उसके कलेशों से छुटकारा मिलना असम्भव है।
जब जब किसी भी व्यवस्था ने मनुष्य की गरिमा के साथ खिलवाड़ किया है, शोषक व्यवहार या अन्याय किया है, आर्थिक, सांस्कृतिक घुसपैठ की है तो उसका विविध रूपों से प्रतिकार हुआ है और सामाजिक आन्दोलनों का जन्म हुआ है सामाजिक आन्दोलन शब्द से ही सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक तीनों तरह के आन्दोलनों का सामूहिक बोध होता है।
स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद भारत में अनेक आन्दोलनों ने जन्म लिया है इनमें राज्य बनाने के आन्दोलन, भाषायी आन्दोलन, महिला आन्दोलन, आपातकाल विरोधी आन्दोलन, जल, जंगल, जमीन, पानी एवं अन्य प्राकृतिक सम्पदाओं से जुड़े आन्दोलन आदि सामाजिक आन्दोलन प्रमुख हैं। आज भी हम देखते हैं कि हमारी आबादी का बहुत बड़ा हिस्सा असुरक्षा, हिंसा, अशिक्षा, बेरोजगारी, कुपोषण, स्वास्थ सेवाओं और शुद्ध पेयजल बिजली - सड़क के अभाव, भोजन के अभाव, सामाजिक, आर्थिक असमानता, अवसरों की असमानता एवं भेदभाव और अपमान से ग्रसित होकर दयनीय स्थिति में जीवन यापन कर रहा है। भारत में सामाजिक-आर्थिक न्याय की स्थापना के मार्ग में प्रमुख चुनौतियां शिक्षा, गरीबी हैं और इन सभी मुद्दों को लेकर समाज मे बार बार प्रतिरोध के स्वर सामाजिक आंदोलनों के रूप में फूटते रहे हैं ।
भारत में पत्रकारिता के विकास की सम्पूर्ण प्रक्रिया राष्ट्रीयता के विकास के समानान्तर रही है और पूरक भी भारतीय राष्ट्रवादियों का उद्देश्य था कि जनता का राजनीतिकरण किया जाऐ उसमे राजनीतिक चेतना का प्रसार किया जाये और प्रेस ही ऐसा एक मात्र साधन था, जो जनता को शिक्षित करने और उसमें राष्ट्रीयता के प्रसार का काम कर सकता था।
हम देखते हैं कि भारतीय राष्ट्रीय स्वतंत्रता संग्राम से जन मानस को जोड़ने का प्रयास सर्वप्रथम पत्र - पत्रिकाओं के माध्यम से ही हुआ और इसका आरम्भ सामाजिक सवालों को लेकर ही हुआ था।
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