स्वतंत्रता के बाद भारत में पत्रकारिता - Journalism in India after Independence

स्वतंत्रता के बाद भारत में पत्रकारिता - Journalism in India after Independence


राजनैतिक पराधीनता के युग में हिन्दी पत्रकारिता ने जिस साहस और संघर्ष क्षमता का परिचय दिया वह प्रशंसनीय है। जनमत निर्माण तथा जनशिक्षण की दिशा में हिन्दी पत्रों तथा पत्रकारों ने जिस मिशन भाव से कार्य किया वह मिशन भाव स्वतन्त्र भारत में धीरे-धीरे लुप्त होता चला गया और उसकी जगह व्यावसायिकता का भाव पैदा होने लगा। स्वतन्त्रता के पूर्व हिन्दी पत्रकारिता जिन उद्देश्यों और लक्ष्यों के लिए समर्पित थी वह भी अब बदल गए थे। पहले पत्रकारिता का मूल लक्ष्य था देश की आजादी का स्वतन्त्र भारत में पत्रकारिता का लक्ष्य हो गया देश के आर्थिक सामाजिक विकास में जन-जन की सक्रिय भागीदारी को प्रोत्साहित करना। राष्ट्र ने लोकतन्त्रात्मक शासन पद्धति को स्वीकार किया। यह पद्धति तभी सफल हो सकती है जब आम जन इस शासन पद्धति से सीधे जुड़े। इस प्रकार सत्ता और जनता के मध्य एक कड़ी के रूप में कार्य करने का भारी दायित्व आजादी के बाद की पत्रकारिता के कन्धों पर आ पड़ा।


1947 में स्वतंत्रता मिली और उसके साथ ही पत्रकारिता का नया संघर्षमय दौर शुरू हो गया। आजादी मिलने के बाद नई चुनौतियां सामने आईं जिनका सामना पत्रकारिता को भी करना पड़ा। स्वातंत्र्योत्तर भारत का नेहरु युग राष्ट्रीय सामाजिक विकास के लिए नई जमीन तलाश रहा था। भारतीय संविधान ने सबको अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता प्रदान की, जिससे सूचना पाने और देने का अधिकार सबको मिल गया। इन परिस्थितियों में हिंदी पत्रकारिता का तेजी से विकास हुआ। हिंदी प्रदेशों में साक्षरता दर बढ़ी और इस वजह से समाचार पत्रों की प्रसार संख्या भी बढ़ी। समाचार पत्र तकनीक की दृष्टि से भी उन्नत हुए और मुद्रण की स्थिति भी पहले अच्छी हुई। कुछ पूंजीपति पत्रकारिता के क्षेत्र में आगे आए। इससे हिंदी पत्रकारिता का विकास हुआ लेकिन धीरे धीरे लोगों ने इसका गलत फायदा उठाया और भ्रष्टाचार बढ़ने लगा। इमरजेंसी के दौर में एक बार फिर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर अंकुश लगा। 1977 में इमरजेंसी ख़तम होते ही फिर से पूंजीपतियों और राजनीति का खेल शुरू हो गया। सनसनीखेज खबरों की वजह से विश्लेषणात्मक खबरें कम लिखी जाने लगी। आठवें दशक तक आते-आते अफसर और मंत्रियों के बीच लेनदेन की खबरें आने लगी। लेकिन इसी दौर में धर्मवीर भारती, मनोहर श्याम जोशी, रघुवीर सहाय, राजेंद्र माथुर, सुरेन्द्र प्रता सिंह और कमलेश्वर जैसे संपादक भी आए जिन्होंने पूंजीनियंत्रित समाचार पत्रों को विकृत होने से बचाया। उन्हें सत्ता का खिलौना नहीं बनने दिया।


इस दौर का एक और सकारात्मक पहलू यह भी है कि टैक्नोलॉजी के जरिए समाचार पत्रों का रंगरुप ही बदल गया। खबरें पहले से ज्यादा तेजी से आकर्षक और कलात्मक तरीके से प्रस्तुत की जाने लगी। कम्प्यूटर के उपयोग ने पत्रकारिता की दुनिया में क्रांति ही कर दी। साजसज्जा पर विशेष ध्यान दिया जाने लगा, लेकिन यह दुर्भाग्य है कि आज की पत्रकारिता पाठकों के भरोसे न चलकर विज्ञापन के भरोसे चल रही है। विषय की दृष्टि से भी काफी बदलाव आ गया है। अब धर्म और टैक्नोलॉजी से लेकर स्वास्थ्य और श्रृंगार कानून से लेकर मनोरंजन तक हर क्षेत्र की खबरें समाचार पत्रों में होती हैं। खबरों के साथ फीचर भी होते हैं।


पत्रकारिता के उद्देश्यों में बदलाव के साथ इसके स्वरूप में भी परिवर्तन होने लगा हैं। अब अधिकांश पत्र पत्रिकाएं कुछ 'बड़े' प्रकाशन गृहों तक ही सिमट कर रह गई। एक लम्बी अवधि तक अंग्रेजी भाषा के पत्रों का प्रभुत्व रहा। हिन्दी पत्रकारिता को अनुवाद प्रणाली पर निर्भर रहना पड़ा सम्पादक और अन्य पत्रकार वेतन भोगी होने लगे और सेवा के आदर्श की बजाय अब 'व्यक्ति हित साधना' को श्रेय मिलने लगा। प्रत्येक कार्य व्यावसायिकता से संचालित होने लगा। पीत पत्रकारिता भी अपना सिर उठाने लगी।


इतना सब कुछ होने के बाद भी पत्र-पत्रिकाओं की संख्या में तेजी से वृद्धि होने लगी। समाचार संकलन से लेकर समाचारों के प्रस्तुतीकरण मुद्रण तथा साजसज्जा आदि सभी क्षेत्रों में आधुनिकता का समावेश हुआ है। स्वतन्त्र भारत में पत्रकारिता के क्षेत्र में विविध जानकारी उपलब्ध कराने की दृष्टि से 1953 में गठित प्रथम प्रेस आयोग की सिफारिशों के आधार पर जुलाई 1956 को रजिस्ट्रार ऑफ न्यूज पेपर्स कार्यालय (आर० एन० आई०) की स्थापना की गई इसके माध्यम से सन् 1956 से लगातार भारत में प्रेस स्थिति की विशद जानकारी एकत्रित की जा रही हैं। भारत में प्रेस की स्थिति के अध्ययन के लिए दो प्रेस आयोगों की भी स्थापना की गई हैं। इन आयोगों ने अनेक महत्त्वपूर्ण सिफारिशें की हैं।