उन्नीसवीं सदी के उत्तरार्ध की पत्रकारिता और भारतेन्दु युग - Journalism of the Late Nineteenth Century and the Bharatendu era.
उन्नीसवीं सदी के उत्तरार्ध की पत्रकारिता और भारतेन्दु युग - Journalism of the Late Nineteenth Century and the Bharatendu era.
1857 की क्रांति, भारतीय इतिहास, समाज, साहित्य और संस्कृति में एक नया मोड़ लाने वाली घटना थी। बंगाल और महाराष्ट्र को छोड़कर पूरे भारत में इसी क्रांति के फलस्वरूप चेतना का विकास हुआ। संपूर्ण भारत में उपनिवेश विरोधी चेतना और स्वतंत्रता प्राप्ति की चेतना जाग गई। 1857 के बाद 10-12 सालों तक हिंदी पत्रकारिता में कोई विशेष बदलाव तो नहीं आया मगर हिंदी पत्रकारिता में उपनिवेश विरोधी स्वर तेज हो गया था। हिंदी के पत्रकार अंग्रेजों की मंशा को अच्छी तरह से समझ गए थे इसीलिए वह जनता को अंग्रेजों के दमन के लिए आगाह कर रहे थे। 1859 में धर्मसभा नामक पत्र प्रकाशित हुआ यह सनातन धर्म का समर्थक पत्र था। 1867 में यह पत्र आगरा से हिंदी और संस्कृत में प्रकाशित हुआ इसके संपादक थे ज्वाला प्रसाद 1861 में आगरा से सूरजप्रकाश नामक पत्र निकला। इसके संपादक गनेशीलाल थे। इसी साल आगरा से शिव नारायण ने उर्दू और हिंदी में अखबार निकाला। मुफीद उल खलाइक नामक पत्र उर्दू में प्रकाशित होता था इसके हिंदी भाग का नाम सर्वोपकारक था। 4 साल बाद 1865 में सर्वोपकारक स्वतंत्र हो गया। 1861 में अजमेर से प्रकाशित खैरख्वाहे खलाइक नामक पत्र के सम्पादक सोहनलाल बने। हकीम जवाहरलाल ने इटावा से पप्रजाहित पाक्षिक पत्र प्रकाशित किया उसके अंग्रेजी और उर्दू संस्करण भी प्रकाशित हुए। 1863 ई. में सिकंदरा, आगरा से लोकमित्र का प्रकाशन हुआ, यह ईसाइयों का पत्र था। लेकिन इसकी हिंदी बहुत शुद्ध थी। पं अंबिका प्रसाद वाजपेयी ने लिखा है कि चाहे स्वार्थवश हो या किसी अन्य कारण से ईसाइयों की हिंदी वास्तव में हिंदी ही होती थी। यह बात बाइबिल के हिंदी अनुवाद या ईसाइयों द्वारा समय समय पर प्रकाशित हिंदी पुस्तकों से भी प्रमाणित होती है। 1864 में आगरा से भारत खंडामृत प्रकाशित हुआ, इसका उर्दू नाम आबेहयात था इसके संपादक पं.बशीधर थे। 1859 में तत्वबोधिनी पत्रिका का प्रकाशन शुरू हुआ और इसके संपादक गुलाब शंकर थे। सत्यदीपक 1866 में बंबई से प्रकाशित हुआ। 1867 में वृतांतविलास और विद्याविलास प्रकाशित हुए। इसी साल आगरा से सर्वजनोपकारक और रतलाम से रत्नप्रकाश प्रकाशित हुए। सर्वजनोपकारक के संपादक पं पूर्णचंद्र थे और रतनप्रकाश के किशोरलाल नागर हिंदी की मशहूर मासिक पत्रिका कविवचन सुधा का प्रकाशन 1868 में बनारस से हुआ इसके संपादक प्रकाशक भारतेंदु हरिश्चंद्र थे। कृष्ण बिहारी मिश्र ने कविवचनसुधा को पहले दौर की पत्रकारिता में शामिल किया है उनकी राय में हिंदी पत्रकारिता का दूसरा दौर 1877 में शुरू हुआ। दूसरे दौर की हिंदी पत्रकारिता की शुरुआत भारतमित्र से हुई। 1857 के बाद हिंदी पत्रकारिता मे तेजी से परिवर्तन आया। कविवचनसुधा एक मानक तैयार करने में सफल रही। भारतेंदु हरिश्चंद ने कई पत्रिकाओं का संपादन किया साथ ही उन्होंने अनेक ऐसे पत्रकारों को भी तैयार किया, जिन्होंने आगे चलकर उनकी सोच को बढ़ाया।
15 अगस्त 1867 को प्रकाशित कविवचनसुधा के जरिए हिंदी पत्रकारिता में एक नए युग का सूत्रपात हुआ। पहले यह मासिक साहित्यिक पत्रिका थी। बाद में पाक्षिक हो गई धीरे- धीरे इसमें राजनैतिक लेख भी प्रकाशित होने लगे। 1875 में यह साप्ताहिक हो गई और 1885 में अंग्रेजी में भी निकलने लगी। लेकिन इसी साल यह बंद भी हो गई। 1873 में बनारस से ही हरिश्चंद्र मैग्जीन का प्रकाशन प्रारंभ हुआ। 1874 में इस मैग्जीन का नाम बदलकर हरिश्चंद्र चंद्रिका रख दिया गया। 1880 में इसे मोहन चंद्रिका के साथ मिला दिया गया। भारतेंदु ने स्त्री शिक्षा के प्रचारार्थ बालाबोधिनी नामक पत्रिका भी प्रकाशित की । यह 1874 में निकलनी शुरू हुई। भाषाशैली की दृष्टि से यह पत्रिका महत्वपूर्ण थी। इसके अलावा हिंदी प्रदीप, ब्राह्मण, हिन्दुस्थान, भारतमित्र, सारसुधानिधि और उचित वक्ता इस दौर के कुछ अन्य प्रमुख पत्र हैं। हिंदी प्रदीप 1877 में प्रकाशित हुआ यह भारतेंदु युग का महत्वपूर्ण पत्र था जिसके संपादक बालकृष्ण भट्ट थे। ब्राह्मण नामक पत्र 1883 में निकला और इसके संपादक प्रताप नारायण मिश्र थे। यह कानपुर से निकलता था और इसका बड़ा महत्व था। भारतेंदु युग की तीसरी सबसे महत्वपूर्ण पत्रिका 'आनंद कादम्बिनी थी इसके संपादक और प्रकाशक बद्री नारायण चौधरी प्रेमघन थे। भारतेंदु युग की अन्य प्रतिष्ठित पत्र पत्रिकाओं में 17 मई 1878 को प्रकाशित भारत मित्र प्रमुख है इसके प्रकाशक संपादक छोटू लाल मिश्र और प्रबंध संपादक दुर्गाप्रसाद मिश्र थे । भारत मित्र के अन्य संपादकों में पं रुद्रदत्त शर्मा, अमृतलाल चक्रवर्ती, बालमुकुन्द गुप्त, बाबूराव विष्णु पराड़कर, अंबिकाप्रसाद बाजपेयी और लक्ष्मीनारायण गर्दै के नाम उल्लेखनीय हैं।
सार सुधा निधि अपने युग का तेजस्वी पत्र था यह 1879 को प्रकाशित हुआ। भारतमित्र से अलग होने के बाद दुर्गादत्त मिश्र ने इसे सदानंद मिश्र के सहयोग से निकाला 1890 में यह पत्र बंद हो गया। दुर्गाप्रसाद मिश्र ने आगे चलकर 1880 में उचितवक्ता नामक पत्र भी निकाला, इसके संपादक वही थे। इस दौर में भारतेन्दु युगीन पत्रकारिता निरंतर विकसित होती गई और यह सामाजिक और राष्ट्रीय हितों से जुड़ी भी रही। आजादी की लड़ाई में इसने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इस युग में बहुत सारे पत्र निकले, पर कभी आर्थिक अभाव तो कभी सरकार के कोपभाजन बनने के बाद बंद हो गए, लेकिन पत्रों का निकलना बंद नहीं हुआ। उन्नीसवीं शताब्दी के उत्तरार्ध में अनेक जातीय, साम्प्रदायिक, धार्मिक पत्र भी निकले पर कहीं न कहीं वे सब देशप्रेम की भावना से जुड़े हुए थे। स्त्री शिक्षा पर केंद्रित बालाबोधनी ने स्त्रियों को अधिकार दिलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई और उसके बाद महिलाओं से जुड़ी कई अन्य पत्रिकाएं भी निकलीं। जिसमें भारत भगनी, सुगृहणी और अबलाहितकारक प्रमुख हैं। इस काल में प्रकाशित होने वाली प्रायः सभी पत्रिकाओं से भारतेन्दु किसी ने किसी प्रकार सम्बद्ध अवश्य रहे। भारतीय जनमानस को इन पत्र-पत्रिकाओं के द्वारा भारतेन्दु ने चिन्तनशील तथा उदार बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका का निर्वाह किया। राम रतन भटनागर के शब्दों में भारतेन्दु हरिशचन्द्र हिन्दी साहित्य के ही जन्मदाता नहीं हैं, वह हिन्दी पत्र सम्पादन कला के भी जन्मदाता हैं।
भारतेन्दु के समय देश में नवीन राजनैति -सामाजिक चेतना का उदय होना प्रारम्भ हो गया था। पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित समाचारों तथा लेखों पर जन-सामान्य अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त करने 7 लगा तथा उनमें व्यक्त विचारों से उद्वेलित भी होने लगा ब्रह्म समाज प्रार्थना सभा आर्य समाज थियोसोफिकल सोसायटी जैसे समाज सुधारक संगठनों के सुधारवादी आन्दोलनों ने जनमानस के चिन्तन को व्यापक स्तर पर प्रभावित किया और यह प्रभाव तत्कालीन पत्र पत्रिकाओं में भी उभर कर सामने आया।
पं० झाबरमल शर्मा की धारणा है कि भारतेन्दु युग रानजैतिक दृष्टि से एक कठिन परीक्षाओं का युग था। वर्नाक्यूलर प्रेस एक्ट सम्पादकों के सिर पर नंगी तलवार की भांति लटका रहता था, पत्रों के मार्ग में अनेक कठिनाइयां थीं।
डॉ० राजेन्द्र शर्मा का मत है कि हिन्दी पत्रकार कला का प्रारम्भ यों तो विद्वान् 30 मई, सन् 1826 (सम्वत् 1883) से मानते है जिस दिन हिन्दी का प्रथम समाचार पत्र उदन्त मार्तण्ड' निकला, किन्तु हिन्दी पत्रकार कला का वास्तविक प्रारम्भ सन् 1868 से माना जाना चाहिए, जबकि भारतेन्दु द्वारा सम्पादित 'कवि वचन सुधा का प्रकाशन प्रारम्भ हुआ। इससे पूर्व हिन्दी में जितने भी पत्र निकलते थे उनकी कोई निश्चित शैली नहीं थी।
ब्रिटिश सरकार भी कविवचन सुधा की सौ कापियां खरीदती थी। जब उक्त पत्र पाक्षिक होकर राजनैतिक सम्बन्धी और दूसरे लेख स्वाधीनता भाव से लिखने लगा तो बड़ा आन्दोलन मचा हरिशचन्द्र के ललित लेखों ने लोगों के जी में ऐसी जगह कर ली थी कि कविवचन सुधा के हर नम्बर के लिए लोगों को टकटकी लगाए रहना पड़ता था। 'मरसिया' नाम का एक लेख उक्त पत्र में छपा था, तो लोगों ने सर विलयम म्योर को समझाया कि यह आप की ही खबर ली गई हैं। इस पर पत्रिका को मिलने वाली सरकारी सहायता बन्द हो गई। 'हरिश्चन्द्र चन्द्रिका' और 'बालाबोधनी नामक दो मासिक पत्रिकाओं की सौ-सौ कापियां प्रान्तिय गवर्नमेंट लेती थी वह भी बन्द हो गई। स्वदेशी आन्दोलन का सूत्रपात -
स्वदेशी आन्दोलन को प्रारम्भ करने का श्रेय भी भारतेन्दु को ही हैं। 23 मार्च, 1874 को 'कवि वचन सुधा के माध्यम से उन्होंने देश की जनता से देश हित के लिए स्वदेशी वस्त्र पहनने का आह्वान किया।
"हम लोग सर्वन्तिदासी सत्र स्थल में वर्तमान सर्वद्रष्टा और नित्य सत्य परमेश्वर को साक्षी देकर यह नियम मानते हैं और लिखते हैं कि हम लोग आज के दिन से कोई विलायती कपड़ा नहीं पहनेंगे और जो कपड़ा पहिले से मोल ले चुके हैं और आज की मिति तक हमारे पास हैं उनके जीर्ण हो जाने तक काम में लायेंगे पर नवीन मोल लेकर किसी भांति का भी विलायती कपड़ा न पहिनेंगे। हिन्दुस्तान का ही बना कपड़ा पहिनेंगे। हम आशा रखते हैं कि हमको बहुत ही क्या प्रायः सब लोग स्वीकार करें और अपना नाम इस श्रेणी में होने के लिए श्रीयुत बाबू हरिश्चन्द्र की अपनी मनीषा प्रकाशित करेंगे और सब देश हितैषी इस उपाय के वृद्धि में अवश्य उद्योग करेंगे।"
'हरिश्चन्द्र मैगजीन' :
परिष्कृत हिन्दी गद्य की प्रेरक 15 अक्टूबर, 1873 को भारतेन्दु ने हरिश्चन्द्र मैगजीन' का प्रकाशन प्रारम्भ किया। यह डिमाईचौपेजी के 24 पृष्ठों में निकलता था। जून, 1874 में आठ अंकों के प्रकाशन के बाद यह पत्रिका 'हरिश्चन्द्र चन्द्रिका हो गई। इसके मुख पृष्ठ पर अंग्रेजी में लिखा रहता था -
HARIS CHANDRA'S MAGAZINE
A Monthly Journal Published in connection with the Kavi Vachan Sudha containing articles on literary, scientific, political and religious subjects, antiquities, reviews dramas, history, novels, poetic selections, gossip, humour and wit edited by
HARISCHANDRA
इस प्रकार भारतेन्दु इस पत्रिका को साहित्य, विज्ञान, धर्म विषयक लेखों, पुरातत्व पुस्तक समीक्षा, नाटक, इतिहास, उपन्यास, पद्य गद्य, हास-परिहास और व्यंग्य विषयक विविध सामग्री से युक्त सर्वविषय पत्रिका बनाना चाहते थे। 'हरिश्चन्द्र चंद्रिका के रूप में प्रकाशित होने पर इसके शीर्ष पर यह श्लोक तथा छन्द छपता था।
विद्वत्कुलामलस्वांत कुमुदामोददायिका ।
आर्याज्ञानतमोहंत्री श्री हरिश्चन्द्र चन्द्रिका ।।
कविजन कुमुद गन हिय विकसि चकोर रसिकन सुख भरै ।
प्रेमिन सुधा सो सींचि भारतभूमि आलम तम हरै ।।
उद्यम सु औषधि पोखि बिरहिन तापि खल चौरन दरै । हरिचन्द्र की यह चन्द्रिका परकासि जग मंगल करे ।।
सन् 1880 में उदयपुर के मोहनलाल विष्णुलाल पण्डेय, जो भारतेन्दु के घनिष्ठ मित्र थे, के अनुरोध पर भारतेन्दु ने यह पत्रिका उन्हें दे दी और उन्होंने इसका प्रकाशन काशी से ही 'हरिश्चन्द्र चन्द्रिका और मोहन चन्द्रिका' नाम से किया। इसके मुख पृष्ठ पर भी उक्त श्लोक तथा छन्द प्रकाशित होता रहा। सन् 1881 में संस्कृत का मासिक पत्र विद्यार्थी भी इसमें मिल गया। इसका प्रकाशन नाथद्वारा से होता था। इस पत्रिका का नाम अब 'विद्यार्थी सम्मिलित हरिश्चन्द्र चन्द्रिका और मोहन चन्द्रिका हो गया जिसके सम्पादक दामोदर शास्त्री थे। यहीं इसका प्रकाशन भी बन्द हो गया।
सन् 1884 में भारतेन्दु ने इसे 'नवोदिता हरिश्चन्द्र चन्द्रिका के नाम से पुनः प्रकशित किया पर उनके असामयिक निधन से इस पत्रिका के मात्र दो ही अंक प्रकाशित हो सके।
वार्तालाप में शामिल हों