गैर सरकारी संगठन में लेजर खाता का प्रयोग - Ledger account in NGO

लेजर खाता Ledger account

खाता एक औपचारिक प्रस्तुतीकरण है जिसमें किसी एक मद या व्यक्ति या आया या व्यय संबंधी लेन-देन दर्शाया जाता है। खाता आम तौर पर 'T' फार्म में तैयार किया जाता है। इसमें बाई तरफ के भाग को डेबिट भाग कहा जाता है और दाई तरफ के भाग को क्रेडिट भाग कहा जाता है। सभी खाते (सिवाय कैश या बैंक के, जो कैश बुक में रखे जाते हैं) इस अंतरण प्रक्रिया को पोस्टिंग कहा गया है।


लेजर में एंट्री मूल लेखा पुस्तकों में रिकॉर्ड किए गए सभी लेनदेन की डेबिट तथा क्रेडिट रकमों को लेजर के उपयुक्त लेखों में अंतरित कर दिया जाता है। इस अंतरण प्रक्रिया को पोस्टिंग कहा जाता है। लेजर का शेष निकालना जब किसी खाते में संबंधित लेनदेन रिकॉर्ड कर दिये जाते है। तो आवश्यक हो जाता है कि अन्तिम स्थिति का पता लगाया जाए। उदाहरण के लिए अगर कोई एक व्यक्ति अनेक परिणामों (संख्याओं में कुछ सामान सप्लाई करता है, और इसी तरह अदायगी भी अनेक बार की जाती हैं, तो यह पता लगाना जरूरी हो जाता है कि किसी एक समय पर उसे कितनी रकम देय है या उससे वापिस ली जानी है। यह उस खाते के समीकरण की मदद से ही किया जाता है। समीकरण प्रतिदिन सप्ताह तिमाही वार्षिक किसी भी समय कारोबार की जरूरत के मुताबिक किया जा सकता है।


किसी एक खाते के एक तरफ के भाग की गई एंट्रियों का कुल योग अगर उस खाते के दूसरी तरफ के भाग में की गई एंट्रियों के कुल योग से अधिक हो तो उस अधिक राशि को उस खाते का शेष कहते है। अगर डेबिट भाग क्रेडिट भाग से अधिक हो तो वह डेबिट बैलेंस दर्शाता है और अगर क्रेडिट भाग डेबिट भाग हो तो क्रेडिट बैलेंस दर्शाता है।


डेबिट बैलेंस का अर्थ है:


1.निजी खातों में मामले में तात्पर्य है कि उस व्यक्ति ने वह रकम ट्रस्ट को देनी है। वास्तविक खातों के मामले में तात्पर्य है कि ट्रस्ट कुछ सम्पत्ति का मालिक है। 3. नामित खातों के मामलों में तात्पर्य है कि ट्रस्ट से कुछ रकम की हानि हुई है या ट्रस्ट ने कुछ खर्च किया है।


क्रेडिट बैलेस का अर्थ


1. निजी खातों के मामले में ट्रस्ट ने वह रकम उस व्यक्ति को देनी है। 

2. वास्तविक खातों के मामले में ट्रस्ट ने उतनी सम्पत्ति छोड़ दी है, और


3. नामित खातों के मामले में ट्रस्ट ने कुछ आय अर्जित की है। लेजर में सभी खातों के बैलेस एक निर्धारित अवधि पर निश्चित कर लिये जाते हैं और उन्हें बैलेंस कालम में लिख दिया जाता है साथ ही यथानुसार क्रेडिट या डेबिट भी लिख दिया जाता है।


बैंक सामाधान विवरण:-  सैद्धान्तिक रूप से कहा जाए तो बैंक खाते का शेष (या कैश बुक के बैंक कॉलम का शेष) एक विशेष तारीख के दिन बैंक द्वारा बनाए गए ग्राहक के खाते के शेष से बैंक पासबुक / विवरण के मुताबिक, मेल खाना चाहिए। परन्तु कई बार ये आपस में मेल नहीं खाते अगर कोई गलती न भी हो तो भी अन्तर आ ही जाता है। इसके निम्नलिखित कारण हो सकते हैं।


1. चैक प्राप्त हो जाते है और उन्हें बैंक अकाउंट में दर्ज भी कर दिया जाता है परन्तु उन्हें रकम वसूली के लिए बैंक नहीं भेजा जाता। इस मामले में लेजर के मुताबिक बैंक बैलेंस, बैंक के विवरण के मुताबिक बनाए गए बैलेंस से अधिक होगा। 


2. चैक जारी कर दिया जाते हैं और बैंक अकाउंट में दर्ज भी कर दिये जाते हैं परन्तु उन्हें रकम वसूली के लिए बैंक में पेश नहीं किया जाता है। इस मामले में लेजर में जो बैंक बैलेंस होगा वह बैंक के विवरण के बैलेंस से कम होगा।


3. ब्याज बैंक द्वारा क्रेडिट कर दिया जाता है। लेकिन उसे लेखा पुस्तकों में रिकार्ड में नहीं किया जाता बैंक खातों की यथार्थता और सही सही होने की जांच करने के लिए यह महत्वपूर्ण है कि बैंक बैलेंस बैंक के विवरण से मेल खाता है इसलिए एक बैंक समाधान विवरण तैयार किया जाता है। ताकि अंतर के कारणों का पता लगाया जा सके। अत: बैंक समाधान विवरण तैयार करना एक महत्वपूर्ण नियंत्रण की तकनीक है।


बैंक समाधान विवरण तैयार करने की तकनीक बहुत आसान है। कैश बुक या पास बुक के बैलेंस से शुरू करें और फिर यह देखें कि दूसरी किताबों में क्या किया गया है और क्या नहीं किया गया है। अतः अगर कोई व्यक्ति कैश बुक के बैलेंस से शुरू करता हैं तो उसे पास बुक की एंट्रीज के साथ उनका मिलान करना होता है।