उपकल्पना की सीमाएँ - Limits of Hypothesis
उपकल्पना की सीमाएँ - Limits of Hypothesis
उपकल्पनाएँ सामाजिक शोध में मार्गदर्शन हेतु महत्वपूर्ण होती है। यदि इसका इस्तेमाल सजगता से नहीं हुआ तो यह शोध के लिए खतरा भी बन सकती है। इसकी सीमाएँ निम्नलिखित हैं -
1) उपकल्पनाओं में अटूट विश्वास -
बहुधा शोधकर्ता कार्यकारी उपकल्पनाओं को ही मार्गदर्शन का अंतिम स्वरूप मानकर तथ्य संकलन करने लगते हैं जो वैज्ञानिकता के विपरीत है।
इस संबंध में श्रीमती पी.वी. यंग का कहना है कि एक शोधकर्ता को अपनी उपकल्पना की शुद्धता को प्रमाणित करने के उद्देश्य से शोधकार्य आरंभ नहीं करना चाहिए।”
2) अनुसंधान की असावधानियाँ
कई बार शोधकर्ता उपकल्पना के निर्माण के दौरान स्वयं की भावनाओं, पूर्वाग्रहों तथा इच्छाओं को नियंत्रित नहीं कर पाता, इस असावधानी के कारण उपकल्पना में पक्षपात आ जाता है जिसके परिणामस्वरूप दोषपूर्ण निष्कर्ष मिलते हैं।
3) उपकल्पना पर आधारित तथ्य संकलन -
प्रायः शोधकर्ता उपकल्पना का निर्माण शोधकार्य आरंभ होने के पूर्व ही कर लेता है और उसी आधार पर तथ्यों का संकलन भी आरंभकर लेता है। परंतु यहाँ यह उल्लेख करना अति आवश्यक है कि अनुभवहीनता के कारण किए गए ये तथ्य संकलन अंत में शोध की गुणवत्ता के लिए हानिप्रद एवं निरर्थक सिद्ध हो सकते हैं।
4) विशिष्ट अभिरुचि तथा संवेगों का प्रभाव-
यदि अनुसंधानकर्ता अपनी किसी विशिष्ट रूचि और संवेग के कारण एक विशेष अध्ययन-विषय का चुनाव करता है तो निःसन्देह उसकी अभिरुचियों और संवेगों का प्रभाव उपकल्पनाओं पर पड़ेगा जिससे शोध के परिणाम पक्षपातपूर्ण हो जाएंगे। ऐसी स्थिति में किया गया शोध अवैज्ञानिक हो जाता है।
5) उपकल्पना आधारित तथ्य-
शोध के प्रारम्भ में अध्ययनकर्ता उपकल्पना के आधार पर ही तथ्यों का संकलन करता है। उसे वास्तविक तथ्यों के आधार पर अपनी उपकल्पना में संशोधन एवं परिवर्तन कर लेना चाहिए उसके उपरांत तथ्य संकलन के कार्य को वास्तविक रूप प्रदान करना चाहिए। ऐसा न करने पर संकलित तथ्य असंगत एवं व्यर्थ सिद्ध हो जाते हैं।
6) शोधकर्ता का प्रतिष्ठा बिन्दु-
बहुधा शोधकर्ता कार्यकारी उपकल्पना को सकारात्मक रूप से प्रमाणित करने में अपनी प्रतिष्ठा जोड़ लेते हैं। ऐसी स्थिति में वे उसे प्रमाणित करने में लगे रहते हैं जिससे शोध की विश्वसनीयता खतरे में आ जाती है।
श्रीमती पी.वी. यंग के अनुसार, 'यदि एक वैज्ञानिक किसी परिस्थिति में तथ्यों को सीखना चाहता है तो उसकी उपकल्पना स्वार्थ, अभिरुचि से संबंधित नहीं होगी तथा उसकी ख्याति प्रतिष्ठा और संकट में पड़ने के बजाय बढ़ सकती है।"
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