साहित्यिक एवं सांस्कृतिक पत्रकारिता - Literary and Cultural Journalism

साहित्यिक एवं सांस्कृतिक पत्रकारिता - Literary and Cultural Journalism

साहित्यिक एवं सांस्कृतिक पत्रकारिता भी विशेषज्ञ पत्रकारिता के क्षेत्र हैं। सांस्कृतिक पत्रकारिता तो हमेशा से ही मुख्य दौर की पत्रकारिता से जुड़ी है और शुरुआती अखबारों में भी सांस्कृतिक समाचारों के लिए अलग कोना होता था। प्रायः सभी प्रमुख पत्र पत्रिकाओं में आज भी सांस्कृतिक समाचार, जानकारियों अथवा सूचनाओं के लिए अलग पृष्ठ अथवा स्तम्भ जरूर होता है। दैनिक समाचार पत्रों में सांस्कृतिक संवाददाता जैसा पद भी काफी पुराना है। हालांकि आज के दौर में सांस्कृतिक समाचारों के कवरेज में प्रायः गम्भीरता नहीं दिखाई देती लेकिन रंगीन पृष्ठों की पत्रकारिता के कारण अखबारों के तीसरे अथवा चौथे-पांचवे पृष्ठ पर सांस्कृतिक गतिविधियों से जुड़े चित्रों का प्रकाशन जरूर होता है। अगर यह मान लें कि आज संस्कृति के अर्थ बदल रहे हैं, तो यह भी कहा जा सकता है कि नये जमाने की नई संस्कृति में पेज थ्री' मॉल कल्चर, थीम पार्टी या स्टार नाइट आदि नए-नए नामों के साथ सांस्कृतिक पत्रकारिता ने भी अपना चोला बदल लिया है ओर वह नए जमाने की रफ्तार से कदम मिलाने लगी है।


साहित्यिक पत्रकारिता का क्षेत्र भी विशेषज्ञ पत्रकारिता का क्षेत्र है। भारत में साहित्य सृजन की परम्परा आदि कवि वाल्मीकि से शुरू मानी जाती है। श्रुत परम्परा यानी एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक सुन-सुन कर आगे बढ़े ज्ञान को ताम्र पत्र, भोज पत्र, और अन्य हस्तलिखित ग्रन्थों ने सुरक्षित किया तो छापेखाने के इस्तेमाल के बाद साहित्य का मुद्रित रूप सामने आने लगा। पत्रकारिता के विकास के साथ साहित्य भी समाचार पत्रों का हिस्सा बनने लेकिन साहित्य का क्षेत्र इतना विशाल था कि सामान्य पत्रकारिता के साथ उसकी निभ नहीं पाई और साहित्य ने अपने लिए पत्रकारिता की एक अलग विधा ही विकसित कर ली। साहित्यिक पत्र पत्रिकाओं के जन्म के साथ ही साहित्यिक पत्रकारिता की विकास यात्रा शुरू हुई। आजादी से पहले चांद, हंस, मतवाला जैसी पत्रिकाओं ने तो आजादी के बाद नवनीत, कादम्बिनी, सारिका आदि से लेकर वर्तमान साहित्य, समकालीन भारतीय साहित्य, पहल, ज्ञानोदय आदि अनेक साहित्यिक पत्र-पत्रिकाओं ने समाज को जागरूक बनाने और आदर्श जीवन मूल्यों की रचना में महत्वपूर्ण योगदान दिया है। आज भी देश में हजारों अनियतकालीन साहित्यिक पत्रिकाएं छप रही हैं। एक सीमित दायरे में होने के बावजूद इन पत्रिकाओं का अपना महत्व हैं और इनमें छपे शब्दों का अपना असर भी।