मीडिया की विज्ञापन विषयक रणनीति तथा युक्तियाँ - Media Advertising Strategy and Tips
मीडिया की विज्ञापन विषयक रणनीति तथा युक्तियाँ - Media Advertising Strategy and Tips
प्रकाशन या इलेक्ट्रॉनिक माध्यमों का संचालन आज एक बेहद खर्चीला कार्य हो गया है। पाठकों या दर्शकों की संख्या बढ़ने से भी संचालन का आर्थिक दबाव कम नहीं होता बल्कि और बढ़ने लगता है। ऐसे में मीडिया को आर्थिक संकट से बचाने के काम में विज्ञापन ही सबसे बड़े मददगार साबित होते हैं। इसलिए मीडिया को भी विज्ञापन के जरिए खुद को मजबूत करने के लिए विज्ञापन पर ही आश्रित होना पड़ता है। विज्ञापन किस तरह हासिल किए जाएं ? किस तरह विज्ञापन के नए नए क्षेत्र हासिल किये जाएं? किस तरह विज्ञापनों को हासिल करने के लिए। विशेष तरह का पाठक, श्रोता या दर्शक वर्ग बढ़ाया जाए। किस तरह विज्ञापन की आय बढ़ाई जाए? इन सभी मकसदों के लिए मीडिया को विशेष रणनीति बनानी पड़ती है। विशेष युक्तियां करनी पड़ती हैं। मीडिया समूहों में इसी उद्देश्य से विज्ञापन विभाग बनाए जाते हैं जहां विशेषज्ञों को नियुक्त किया जाता है। यह विशेषज्ञ लगातार रणनीति बनाते रहते हैं और उनमें परिवर्तन करते रहते हैं और इनका मीडिया पर व्यापक असर भी पड़ता है। एक तरह से कहा जाए कि आज मीडिया की नीतियां मीडिया की दिशा और मीडिया के तेवर तय करने में भी विज्ञापन प्रबन्धकों का दबदबा हो गया है तो यह अतिशयोक्ति नहीं होगी।
आज के दौर में विज्ञापन मीडिया की रीढ़ बन गया है समाचार पत्र एवं पत्रिकाओं का एक बहुत बड़ा हिस्सा और टी.वी. व रेडियो कार्यक्रमों के बीच 'आफ्टर द ब्रेक' या 'ब्रेक के बाद' का समय भी विज्ञापनों से भरा होता है। इस तरह आज के प्रतिस्पर्धात्मक युग में जब दैनिक उपयोग की छोटी-बड़ी हर चीज विज्ञापन पर निर्भर है, प्रिंट मीडिया और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में विज्ञापन की सत्ता प्रभावी हो गई है। आर्थिक उदारीकरण के इस युग में विज्ञापन उद्योग ने परंपरागत तरीकों को छोड़कर नए रूप-रंग में अपना नेटवर्क स्थापित किया है। सार्वजनिक व निजी क्षेत्र की विज्ञापन एजेंसियाँ, विज्ञापन कंपनियाँ, समाचार पत्रों के विज्ञापन विभाग, रेडियो व टेलीविजन के व्यावसायिक विभाग सभी विज्ञापन संबंधी गतिविधियों से जुड़े हुए हैं।
पश्चिमी संचार विशेषज्ञ रेमंड विलियम्स मानते हैं कि आज नई सूचना प्रणाली पर वित्तीय संस्थानों, वितरकों, ट्रैवल एजेंसियों और सामान्य विज्ञापनों का प्रभुत्व बहुत बढ़ गया है। आज भारतीय परिप्रेक्ष्य में और विश्व स्तर पर भी इस बात को स्वीकार कर लिया गया है कि विज्ञापन मीडिया की जान है। इसके अभाव में कोई भी मीडिया अपने कार्यक्रमों के निष्पादन और आर्थिक विनिमय की दृष्टि से संकट में आ सकता है।
आज निजी क्षेत्र तो निजी क्षेत्र, सरकारी दूरदर्शन का काम भी विज्ञापन के बिना नहीं चल सकता दूरदर्शन के कामकाज पर गठित 'जोशी कार्यदल ने भी अपनी रिपोर्ट में इस बात को स्वीकार किया है। कार्यदल ने कहा है कि "दल के बहुसंख्यक सदस्यों की यह राय है कि आधुनिक औद्योगिक अर्थव्यवस्था में, जहां स्थानीय आवश्यकताओं की पूर्ति स्थानीय उत्पादन से पूरी नहीं की जा सकती, बल्कि वह राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मंडियों पर निर्भर करती है, वहाँ विज्ञापनों के बिना काम नहीं चल सकता।"
मीडिया में विज्ञापन की सत्ता आज सर्वसम्मति से स्वीकार की जा रही है। इलेक्ट्रॉनिक मीडिया आज जनसंचार माध्यमों की नीतियों और आचार संहिता को पूरी तरह विस्मृत कर 'विज्ञापन उद्योग' के वशीभूत होकर उपभोक्ता संस्कृति का संवाहक बनकर उभर रहा है। बाजार की संस्कृति ने एक नए किस्म के विज्ञापन शास्त्र को लेकर इलेक्ट्रॉनिक मीडिया से अपना अटूट रिश्ता कायम कर लिया है।
आज इलेक्ट्रॉनिक मीडिया पर विज्ञापन हावी हो गया है। मीडिया के कार्यक्रमों में बीच-बीच में 'आफ्टर दी या 'ब्रेक के बाद' या 'छोटे से कामर्शियल ब्रेक के बाद कहकर जिस तरह विज्ञापनों को दिखाते हैं, उसे देखकर ऐसा लगता है कि 'मनोरंजन शिक्षा और सूचना के समन्वित आदर्श का झंडा लहराने वाले इलेक्ट्रॉनिक माध्यमों के पास कार्यक्रमों के लिए जगह कम है, मगर विज्ञापनों के प्रसारण के लिए जगह ही जगह है।
किसी कार्यक्रम की मूल संवेदना के साथ जब दर्शक या श्रोता तदात्म्य स्थापित करने की प्रक्रिया में होते हैं, तभी ब्रेक के बाद के साथ दिखाए और प्रसारित विज्ञापनों की श्रृंखला इस प्रक्रिया में विघ्न डाल देती है।
भूमंडलीकरण और आर्थिक उदारीकरण के कारण मौजूदा दौर में राष्ट्रीय और बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ विज्ञापन के माध्यम से अपने उत्पादों की श्रेष्ठता, उपादेयता सिद्ध कर बाजार पर कब्जा करने का सुनियोजित अभियान चला रही हैं। उनके इस अभियान ने दर्शकों और श्रोताओं को भी बाजार की चीज बना दिया है।
मैक्चेस्नी लिखते हैं- "भूमंडलीय की प्रक्रिया में जो विज्ञापनदाता है, वह श्रोताओं और दर्शकों को एक उपभोक्ता की तरह इस्तेमाल करता है, एक नागरिक की तरह नहीं और उसका सारा ध्यान उच्च आय वर्ग के उपभोक्ताओं को आकर्षित करने में लगा रहता है। इसमें विज्ञापनदाताओं की प्रवृत्ति यह है कि जनकल्याण, जनसेवा मूल्य समर्थित कार्यक्रमों पर उनका जोर नहीं के बराबर होता है। वे कार्यक्रम को बाजार के दृष्टिकोण से देखते हैं। वे इस तरह के कार्यक्रमों और विज्ञापनों को प्राथमिकता देते हैं, जिसमें सेक्स और हिंसा की भरमार होती है या इससे जुड़े हुए ऐसे तर्क होते हैं जो दर्शकों को आसानी से आकर्षित कर लेते हैं।"
भूमंडलीकरण की प्रक्रिया के कारण आज पचासों चैनलों से युक्त टी.वी. भारतीय जनता का हित नहीं साधता। वह वस्तुतः प्रायोजित मामला बनकर जनहित और जनसेवा की भावनाओं से विमुख होकर विज्ञापनदाता कंपनियों के हितों का संरक्षण कर रहा है। इसलिए विज्ञापनदाताओं की मरजी से मीडिया की समूची कार्यक्रम संरचना प्रभावित हो रही है। इस संरचना में निर्माताओं का ध्यान आम जनता के हितों पर केंद्रित नहीं होता। अर्जुन के लक्ष्य की तरह उनकी आँखें विज्ञापन से मिलनेवाली आय पर टिकी होती है।
टेलीविजन के विभिन्न चैनलों पर विज्ञापनो और सीरियल के प्रसारणों से व्यापारिक कंपनियों को उत्पाद बेचने का बहुत बड़ा जरिया हाथ लग गया है। आज टीवी चैनलों के अधिकांश कार्यक्रम बहुराष्ट्रीय कंपनियों द्वारा प्रायोजित होते हैं। दूरदर्शन को भी इनसे प्रतिस्पर्द्धा के कारण ऐसे ही कार्यक्रमों को गले लगाना पड़ता है। प्रायोजित कार्यक्रमों की भरमार के कारण ही रेडियो और टेलीविजन का अधिकांश समय फिल्मी संगीत, फिल्मी गॉसिप से भरा जाता है।
जो कंपनियाँ कार्यक्रम की प्रायोजक बनकर विज्ञापन पर पानी की तरह पैसा बहाती हैं, इसमें लाखों रुपए लगाती हैं, वे उन्हीं कार्यक्रमों की प्रायोजक बनना स्वीकार करती हैं, जो दर्शकों और श्रोताओं में खासे लोकप्रिय हो या हो सके। कार्यक्रम की लोकप्रियता किसी प्रायोजक की सबसे पहली प्राथमिकता होती है। इसलिए कार्यक्रम संरचना इस तरह की जाती हैं कि कार्यक्रम को लोकप्रियता के स्तर तक ले जाया जा सके। इसलिए कार्यक्रम निर्माताओं की मजबूरी है एक खास फार्मूला बद्ध प्रस्तुति ऐसी प्रस्तुति, जो सेक्स, हिंसा तथा चकाचौंध के समूचे मानदंडों पर खरी उतरती हो।
इस तरह से इलेक्ट्रॉनिक मीडिया जनसंचार विशेषज्ञ रेमंड विलियम्स की पुस्तक 'कम्युनिकेशंस' में कही हुई इस बात को साबित कर रहा है कि "संचार उपकरणों का राजनीतिक नियंत्रण और प्रचार अभियान या व्यापारिक लाभ (के रूप में) के लिए दुरुपयोग होता है।"
इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के कार्यक्रमों की संरचना और विज्ञापन उद्योग के बीच की सांठगांठ के कारण एक तरफ मीडिया कार्यक्रम हैरत में डालने वाले नए रूप-रंग को धारण कर रहा है तो दूसरी तरफ अनैतिक, भोंडे, मूर्खतापूर्ण, शोर-शराबे और दहशत भरी तथा सामाजिक मर्यादाओं के लिए घातक विज्ञापनों को टी.वी. प्रसारित कर रहा है। विज्ञापन अनेक बार सत्य से कोसों दूर होते हैं।
आज मीडिया कार्यक्रमों की संरचना और विज्ञापन उद्योग के संबंधों का नया गठन इतना दृढ़ हो गया है कि टी.वी. पर मनोरंजन के कार्यक्रम हों या समाचार अथवा समाचार विश्लेषण, ऐसा लगता है कि कार्यक्रमों से अधिक प्रमुखता उपभोग्य वस्तुओं के प्रचार-प्रसार को मिल रही है। इसलिए रेडियो तथा टीवी. के सूचना समाज के ताने-बाने में भी विज्ञापनों ने भरपूर मनमाना हस्तक्षेप कर लिया है। एक समय था, जब विज्ञापन के लिए समाचारों के बीच कोई गुंजाइश नहीं होती थी, समाचार ही सर्वोपरि थे, लेकिन आज समाचारों के बीच भी एक छोटा-सा विराम या 'ब्रेक के बाद' कहकर राष्ट्रीय बहुराष्ट्रीय कंपनियों के उत्पाद के विज्ञापन प्रदर्शित किए जाते हैं। आज 'खबर बन गए विज्ञापनों के लिए समाचारों में कटौती की जा रही है। यह वस्तुतः कार्यक्रम संरचना और विज्ञापन के बीच का नया रिश्ता है, जो भूमंडलीकरण और उदारीकरण की देन है।
इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में प्रायोजित कार्यक्रमों के इस युग में वस्तुतः इन्हीं कार्यक्रमों और विज्ञापनों ने भूमंडलीकरण की प्रक्रिया को सुगम बनाया है। मीडिया कार्यक्रम संरचना और विज्ञापन उद्योग के बीच विकसित हो रहे संबंधों ने महानगरों और शहरों में विज्ञापन उद्योग को नए आयाम दिए हैं। नई-नई विज्ञापन एजेंसियां खुल रही हैं। विज्ञापनों का जादू केवल उपभोक्ता पर ही नहीं चढ़ रहा है। इसकी मायावी शक्ति आए दिन समाचार पत्रों और पत्रिकाओं में देखने को मिलती रहती है। यह खबर तो पुरानी हो चुकी है कि आजकल बॉलीवुड के सितारे फिल्मों की जगह विज्ञापन फिल्मों की शूटिंग में व्यस्त हो रहे हैं, लेकिन इसके आगे की खबर यह है कि अब फिल्मी सितारे केवल टी.वी. के परदे पर ही टूथपेस्ट, साबुन, तेल आदि तमाम उत्पादों का विज्ञापन करते नजर आते हैं, बल्कि आजकल उन्हें ब्रांड एंबेसडर बनने का चस्का भी लग गया है।
मीडिया आज पूरी तरह से विज्ञापन के दबाव में आ गया है। बड़े मीडिया समूह जिनका एक मात्र ध्येय अब अधिक से अधिक लाभ कमाना रह गया है, वर्ना तो मीडिया की आंतरिक आबादी भी विज्ञापन की कमाई के हानि-लाभ के गणित से दब चुकी है। फिर भी छोटे मीडिया समूह या पत्र पत्रिकाएं जब भी विज्ञापन के दबावों के बावजूद अपने उद्देश्य की पूर्ति में जुटी हुई हैं।
इलेक्ट्रॉनिक मीडिया की तरह प्रिंट मीडिया ने भी अब विज्ञापन की अपनी रणनीतियों में बड़े बदलाव कर लिए हैं। आज समाचार पत्र बड़े समारोहों, आयोजनों आदि के प्रायोजक भी बनने लगे हैं और बदले में उस समारोह से जुड़े विज्ञापनों का बड़ा हिस्सा भी उन्हें मिल जाता है। विशेष परिशिष्ट अब पुरानी बात हैं अब तो अखबारों ने अपनी विज्ञापन नीतियों को बदल दिया है और अब तो अखबार के मुख पृष्ठ या अन्य पृष्ठ पूरे पूरे एक ही उत्पाद के विज्ञापन से रंगे दिखने लगे हैं। पूरे पृष्ठ का ऐसा विज्ञापन छोटे विज्ञापनों की तुलना में बहुत अधिक प्रभावी होता है।
वार्तालाप में शामिल हों