विज्ञापन के प्रसारण माध्यम - Media Advertising

विज्ञापन के प्रसारण माध्यम - Media Advertising


विज्ञापन के प्रसारण माध्यमों में श्रव्य-दृश्य माध्यम शामिल हैं। प्रसारण माध्यम विज्ञापन के सबसे बड़े और प्रभावशाली माध्यम हैं जिनके जरिए विज्ञापनों को व्यापक प्रचार और उन्नत रूप मिला है। रेडियो और टेलीविजन इस श्रेणी के प्रमुख माध्यम हैं।


रेडियो : रेडियो एक श्रव्य माध्यम है। जो विश्व व्यापी है। ग्रामीण क्षेत्रों से लेकर शहरी इलाकों तक, हर कहीं इसकी पहुंच है। यह एक ऐसा माध्यम है जो निरक्षर लोगों तक भी विज्ञापन का संदेश पहुंचा सकता है। भारत में कृषि, ग्रामीण उपभोक्ता वस्तुओं और जनहित की योजनाओं तथा कार्यक्रमों के लिए इसकी अत्यधिक उपयोगिता है।


माध्यम के रूप में रेडियो का उपयोग कर विज्ञापनों को अनेक स्वरूपों में प्रस्तुत किया जा सकता है, जैसे


सामान्य उद्घोषणा के तौर पर


• नाटकीय संवादों के जरिए


• किसी खास व्यक्ति की आवाज में विज्ञापित वस्तु की प्रशंसा या उपयोगिता बताकर अथवा


• लोकगीतों, संगीत और ध्वनि प्रभावों की मदद से


रेडियो विज्ञापनों में लोकगीतों और संगीत का प्रयोग इन्हें अतिविशिष्ट बना देता है। ऐसे अनेक रेडियो विज्ञापन हैं जो अपनी सुरीली धुन और गेय शैली के कारण लोगों की जुबान पर चढ़ गए। एम एफ रेडियो का तेजी से विकास होने के कारण अब शहरी क्षेत्रों में भी रेडियो विज्ञापनों की लोकप्रियता खूब बढ़ गई है। हालाँकि दृश्य माध्यमों के विज्ञापनों की तुलना में रेडियो में उद्घोषणा के रूप में प्रस्तुत विज्ञापन अधिक समय तक उपभोक्ताओं की जृमति में नहीं रह पाते ।






टेलीविजन:- टेलीविजन आज विज्ञापन का सर्वाधिक प्रचलित और लोकप्रिय विज्ञापन माध्यम बन गया है। पश्चिम की तुलना में भारत में टेलीविज़न का आगमन अपेक्षाकृत नया है। देश में 1976 में दूरदर्शन से पहली बार विज्ञापनों का प्रसारण हुआ मगर आज दूरदर्शन देश का सबसे प्रभावी विज्ञापन माध्यम हैं। बड़ी-बड़ी कंपनियां, कॉरपोरेट हाउस, संस्थाएं और संगठन अपने उत्पादों अथवा सेवाओं के विज्ञापन टेलीविजन पर प्रसारित करने के लिए हमेशा तत्पर रहते हैं। टेलीविजन द्वारा प्रसारित होने वाले विज्ञापनों में दृश्य और श्रव्य प्रभावों के साथ-साथ संगीत और विज्ञापित वस्तु की विशेषताएं बताने के लिए विशेष प्रभावों का भी इस्तेमाल किया जाता है, जो टेलीविजन को एक सर्वाधिक प्रभावशाली विज्ञापन माध्यम के रूप में स्थापित करता है। यह एक चमत्कारिक और बहुसंवेदी माध्यम है जो विज्ञापनकर्ता को अपनी बात पूरी तरह संप्रेषित करने का पूरा पूरा अवसर देता है।


टेलीविजन के विज्ञापन उपभोक्ता और उत्पाद के बीच की दूरी को बहुत कम कर देते हैं। उपभोक्ता उत्पाद की खूबियों को सजीव ढंग से देखता है। इसलिए उस पर इन विज्ञापनों का असर भी अधिक होता है। इन विज्ञापनों के सीधे प्रभाव के कारण उपभोक्ता का निर्णय प्रक्रिया पर भी सकारात्मक प्रभाव होता है। टेलीविजन पर प्रसारित होने वाले विज्ञापन मुख्यतः दो प्रकार के होते है।


1. स्पॉट विज्ञापन


2. प्रायोजित कार्यक्रम


(i) स्पॉट एडवर्टाइजमेंट या समयबद्ध विज्ञापन बहुत छोटी अवधि के होते हैं। इस तरह के विज्ञापनों में उत्पाद की गुणवत्ता, खूबियों, मूल्य आदि के बारे में संक्षिप्त जानकारी दी जाती है। इनमें उत्पाद को आकर्षक रूप में प्रस्तुत किया जाता है और प्रायः इनका प्रभाव चौंकाने वाला होता है। इस तरह के कार्यक्रम न्यूज चैनलों में समाचारों के बीच-बीच में खेलों के प्रसारण के दौरान बीच-बीच में या अन्य चैनलों में कार्यक्रमों के बीच में कहीं भी दिखाए जा सकते हैं। क्रिकेट के मैचों में तो हर ओवर के बाद या किसी खिलाड़ी के आउट होने पर भी इस तरह के विज्ञापन दिखा दिए जाते हैं।


(ii) प्रायोजित कार्यक्रम :- इस तरह के विज्ञापन हैं जो दीर्घ अवधि के लिए किसी विशेष उत्पाद का प्रचार करते है। उदाहरणार्थ यदि किसी विशेष चैनल में 30 मिनट के किसी खास कार्यक्रम का नियमित प्रसारण होता है तो ऐसे किसी कार्यक्रम को किसी विशेष उत्पाद की ओर से प्रायोजित कर दिया जाता है तब प्रायोजक का नाम भी ऐसे कार्यक्रम से जुड़ जाता है और कार्यक्रम के दौरान कई बार प्रायोजक का उल्लेख किया जाता है। मनोरंजन चैनलों में इस तरह के प्रायोजित कार्यक्रमों की भरमार होती है। क्रिकेट में तो कई बार पूरी प्रतियोगिता ही किसी खास प्रायोजक द्वारा प्रायोजित होती है और ऐसे मैंचों के सजीव प्रसारण में बार-बार प्रायोजक का जिक्र होता रहता है।






टेलीविजन के विज्ञापन ब्रांड का महत्व बढ़ाने में भी अहम भूमिका निभाते हैं। सचिन तेंदुलकर या एम एस धोनी जैसे बड़े खिलाड़ियों या सिने कलाकारों को किसी खास उत्पाद के ब्रांड एम्बेसडर के तौर पर प्रस्तुत कर विज्ञापनकर्ता बड़ा लाभ पा सकता है, उसका उत्पाद रातोंरात लोकप्रिय हो सकता है। टेलीविजन ने जहां भाषा और लिपि की सीमाएं खत्म कर दी हैं वहीं इस माध्यम में एक बड़ी कमी हैं और वो यह है कि टेलीविजन बेहद खर्चीला माध्यम है। टेलीविजन विज्ञापन की निर्माण प्रक्रिया जटिल है और इसमें लागत भी अधिक आती है। साथ ही यदि विज्ञापन बार-बार नहीं दिखाया जाता तो इस बात की भी आशंका रहती है कि वह उपभोक्ता तक पहुंच भी पाया हैं अथवा नहीं।


फिल्म व वीडियो सिनेमा भी एक खास प्रकार का श्रव्य दृश्य विज्ञापन का माध्यम है। इसका इस्तेमाल सिनेमाघरों में लघु फिल्मों या स्लाइड्स के जरिए उत्पादों का प्रचार-प्रसार करने के लिए किया जाता है। इस माध्यम की खूबी यह है कि इसमें इस बात की गारंटी होती है कि इसे एक निश्चित दर्शक वर्ग देखेगा ही फिल्म माध्यम में स्थानीय उत्पादों के साथ-साथ मशहूर ब्रांड भी अपने विज्ञापन करते हैं। कई बार कोई विशेष उत्पाद किसी पूरी फीचर फिल्म के साथ ही इस तरह के अनुबंध कर लेता है कि फिल्म में उसी के उत्पाद मिलन होटल, रेस्तरां, विमान सेवा प्रतिष्ठान आदि का प्रदर्शन कहानी के हिस्से के रूप में कर दिया जाता है। उदाहरणार्थ किसी फिल्म का नायक विमान यात्रा कर रहा है तो फिल्म में उसे किसी विशेष विमान सेवा के विमान से जाते हुए दिखाया जाता है। दृश्यों में उस विमान सेवा के कर्मचारी, विमान आदि भी दिखा दिए जाते हैं। यह विज्ञापन का एक महंगा तरीका है। फिल्मों की तरह से ही वीडियो फिल्मों के जरिए भी विज्ञापन किए जाते हैं । आजकल स्थानीय तौर पर चलने वाले केबल नेटवर्क वीडियो फिल्मों के जरिए स्थानीय उत्पादों का विज्ञापन जमकर करने लगे हैं।


इंटरनेट :-  इंटरनेट आज विज्ञापन का सबसे नया और विस्तृत माध्यम बन चुका है। अंतरराष्ट्रीय व्यापार जगत आज इंटरनेट का इस्तेमाल कर अपने उत्पादों का विज्ञापन कर रहा है और अपना प्रचार-प्रसार कर रहा है। वेब एडवरटाइजिंग यानी इंटरनेट के जरिए विज्ञापन आज एक तेजी से लोकप्रिय हो रहा विज्ञापन माध्यम बन गया है। इंटरनेट के जरिए विज्ञापन अधिक महंगा भी नहीं है और इसका प्रसार क्षेत्र असीमित है इसलिए इसका असर भी व्यापक होता है। फिर भी इंटरनेट अभी सर्व जन का विज्ञापन माध्यम नहीं बन सका है और इसकी पहुंच एक खास वर्ग तक ही सीमित है। यही हाल मोबाइल विज्ञापनों का भी है।

कुल मिलाकर यह कहा जा सकता है कि वर्तमान में विज्ञापन माध्यम ही सर्वाधिक प्रभावशाली और असरदार माध्यम बन गए हैं और तकनीक के दृश्य श्रव्य विकास के साथ-साथ इन माध्यमों का भी उत्तरोत्तर विकास होता जा रहा है।