पत्रकारिता का स्वरूप व विभिन्न आयाम - Nature and Different Dimensions of Journalism
पत्रकारिता का स्वरूप व विभिन्न आयाम - Nature and Different Dimensions of Journalism
इससे पूर्व कि पत्रकारिता के वर्तमान स्वरूप व इसमें निहित सम्भावनाओं पर विचार किया जाए, पत्रकारिता की उस बुनियाद पर चर्चा किया जाना जरूरी है जिसकी बदौलत आज पत्रकारिता बुलंदियों को छू रही है। यह विषय अलग है कि विश्व में पत्रकारिता कब से और किस रूप में प्रारम्भ हुई किन्तु अधिकांश हिन्दी पत्र स्वतंत्रता प्राप्ति की संकल्प भावना, समाज सुधार अथवा साहित्यश्री की अभिवृद्धि की कामना से ही प्रारम्भ हुए थे। वह पत्रकारिता का शैशव था। उनके जनकों को अपने आत्मजों के लालन-पालन का अनुभव भी नहीं था। दासता के विषाक्त वातावरण में विदेशी शासकों ने क्षय के कीटाणु छोड़ रखे थे। अधिकांश पत्र अपने जन्म के कुछ काल बाद ही रोगी हो जाते थे राजाराम मोहनराय ने पत्रकारिता प्रारम्भ करने का कारण बताया- "मुझे लगा कि यदि मैंने अपनी आत्मा की व्यग्रता को समाचार के माध्यम से कोटि-कोटि बन्धुओं तक नहीं पहुंचाया तो विवशता की घुटन मुझे आत्मसात कर लेगी।"
अदालत में पूछे गए एक प्रश्न के उत्तर में लोकमान्य तिलक ने घोषणा की थी कि "मेरा समाचार पत्र निकालने का उद्देश्य धन अर्जन करना या यश प्राप्ति की लिप्सा नहीं है। मैंने उसके अक्षर अक्षर में उस क्रान्ति के बीज बोए हैं जो विदेशी शासन के प्रासाद को धूल धूसरित कर देगी। शासन के प्रति विद्रोह ही मेरी पत्रकारिता का पहला और अन्तिम उद्देश्य है। इसी तरह पं. प्रताप नारायण मिश्र ने ब्राह्मण के एक सम्पादकीय में कहा था- "सामाजिक कुरीतियां राजनैतिक दासता को बल देती हैं। सम्पूर्ण समाज से इन कुरीतियों को दूर करने का कार्य मेरे और सक्षम भाई करेंगे। हां, एक सीमित वर्ग के जीवन में आमूल परिवर्तन लाना मेरे इस पत्र का उद्देश्य है। प्रबल मनोयोग और महती आकांक्षाओं में पालित यह पत्र-पत्रिकायें, अधिकांशतः अल्पजीवी रहीं। विदेशी सरकार के निर्मम प्रहार ग्राहकों की शून्यता, प्रकाशन, प्रसारण और मुद्रण की कठिनाई तथा सुरुचिपूर्ण सफल पत्रकारों का अभाव, इन सब तथ्यों पर ही अधिकांश पत्रों को आत्मसात करने का दायित्व है। हां, कुछ पत्रों का सौभाग्य रहा कि उन्हें जनता जनार्दन का वह सक्षम वरदहस्त मिला जिसने उन्हें विषम परिस्थितियों में भी सुरक्षित रखा।
मेरा समाचार पत्र निकालने का उद्देश्य धन अर्जन करना या यश प्राप्ति की लिप्सा नहीं है। मैंने उसके अक्षर अक्षर में उस क्रान्ति के बीज बोए हैं जो विदेशी शासन के प्रासाद को धूल-धूसरित कर देगी। शासन के प्रति विद्रोह ही मेरी पत्रकारिता का पहला और अन्तिम उद्देश्य है।" : एक ब्रिटिश अदालत में लोकमान्य तिलक का बयान
हिन्दी पत्रों का जीवन संकल्प की दृढ़ता पर निर्भर रहा है। व्यक्तिगत प्रचार की आकांक्षा तथा संस्थापक सम्पादक के स्थान पर अपना नाम मुद्रित देखने की कामना रखने वाले महानुभाव पत्रकारिता के पोषक नहीं शोषक होते हैं। कुछ दूसरे संस्थापक समाचार पत्रों को एक अस्त्र के रूप में प्रयुक्त कर शासन सत्ता में पैठ बनाने का प्रयास करते हैं। वे रोमांचकारी नामों व रोमांचकारी समाचारों में रुचि रखते हैं।
सम्भवतः इन सब प्रत्यक्ष अनुभवों से प्रभावित होकर ही पत्रकारों के जनक पराढकर जी ने कहा था- 'लोकमंगल के प्रति निष्ठा पत्रों की जीवनशक्ति है। उसके अभाव में पत्र सांस भरते हैं, जीवित नहीं रहते। संसार में दीर्घजीवी पत्रों का यही रहस्य है।'
सरकार जनता के हित के लिए है और समाचार पत्र भी प्रायः यही काम करते हैं। फिर दोनों में संघर्ष कैसा और प्रतिबंधक कानून किस लिए उत्तर स्पष्ट है। सरकार स्थायी व्यवस्था है और जन-जन का हित साधन व संरक्षण उसका लक्ष्य है। अधिकांश पत्र अपनी पावनता निभाने में असफल रहते हैं।
यह हिन्दी पत्रकारिता का दुर्भाग्य है कि जब उसके पास विचार था तब समाचार नहीं था और जब समाचार आया तो विचार नदारद हो गया। संकेत आजादी के पहले की पत्रकारिता और आजादी के बाद 20-25 वर्षों तक की पत्रकारिता की तरफ है। वह सामान्य समय की पत्रकारिता नहीं थी न उसका कोई मजबूत व्यावसायिक आधार था। अतः हिन्दी के समाचार पत्र भौतिक दृष्टि से दरिद्र थे। उनमें आवश्यक समाचार नहीं होते थे। उनकी जरूरत से ज्यादा क्षतिपूर्ति विचारों से की गई। स्वतंत्र भारत में हिन्दी के समाचार पत्रों की व्यावसायिक जमीन मजबूत होने लगी। आर्थिक दृष्टि से वे घाटे का सौदा नहीं रह गए। लेकिन इसके साथ ही विचार और विश्लेषण के मोर्चे पर मानो सांप सूंघ गया। इस सन्नाटे को तोड़ने का काम किया राजेन्द्र माथुर जैसे अनेक पत्रकारों ने खबर निश्चय ही महत्वपूर्ण है, लेकिन उसका अर्थ और भी महत्वपूर्ण है। इससे भी ज्यादा महत्वपूर्ण है वह अर्थ जो विभिन्न खंड-अर्थों को एक साथ रखने पर पर पैदा होता है।
पत्रकारिता को अंतरिक्ष की ऊंचाइयों तक ले जा रही वर्तमान पीढ़ी के लिए यह जानना भी जरूरी है कि आज से बीस-पच्चीस साल पहले किस तरह के अक्षरों को जोड़-जोड़ कर समाचार पत्र बनाया जाता था, कितना श्रमसाध्य था वह काम समाचारों का त्वरित प्रेषण भी आसान नहीं था। टेलीग्राफ तथा टेलीप्रिंटर द्वारा समाचारों के प्रेषण से आसानी जरूर बढ़ी किन्तु यह सर्वसुलभ साधन नहीं बन सका। जिन्होंने उन हालातों को झेला है वे इन अर्थों में पत्रकारिता के क्षेत्र में बहुत आशान्वित हैं। जीवन के हर क्षेत्र में कम्प्यूटर के प्रवेश ने सुविधाएं बढ़ा दी हैं और सम्भावनाओं में कई गुना बढ़ोतरी कर दी है। उस पीढ़ी के लिए वर्तमान बुलंदियां आश्चर्य में डालने वाली ही हैं। इसी पीढ़ी के पत्रकारों के लिए पत्रकारिता में आए बदलाव भी आश्चर्य में डालने वाले ही हैं। मिशन भावना की पत्रकारिता के रस में डूबी वह पीढ़ी वर्तमान में हवा और पानी को भी व्यवसाय बनते युग में पत्रकारिता में व्यावसायिकता के प्रवेश पर चिन्तित हैं। किन्तु विश्व समाज में हो रहे बदलावों से पत्रकारिता भी अछूती नहीं रह सकती है। पत्रकारिता का प्रारम्भिक स्वरूप, इसका इतिहास, उसकी मूल भावना अदि तमाम विषय महत्वपूर्ण होते हुए भी अपना एक अलग अस्तित्व रखते हैं।
पत्रकारिता के प्रारम्भिक दौर में गुलामी के खिलाफ संघर्ष, सामाजिक कुरीतियों के खिलाफ संघर्ष और साहित्य सृजन को प्रमुख स्थान मिला। इसमें व्यावसायिकता के बजाए जोखिम अधिक था और इसी जोखिम में जीना लेखकों-पत्रकारों ने अंगीकार किया किन्तु अब पत्रकारिता ने भी जीवन के तमाम व्यवहारों के साथ व्यावसायिकता में प्रवेश कर लिया है। अब हम इसे व्यावसायिकता से हटाकर नहीं देख सकते हैं और इसमें हमें अपनी मनोवृत्ति, क्षमता, रुचि के अनुसार सम्भावनायें तलाशनी ही होंगी। पूर्व में जनकल्याण की भावना प्रमुख थी और समझा जाता था कि पत्रों के दीर्घजीवी होने का कारण जनकल्याण की भावना में ही निहित है किन्तु इसके विपरीत अब पत्रों का दीर्घजीवी होना इसके सफल व्यवसाय पर निर्भर है। यह विषय भी बिल्कुल अलग है कि इस भावना का समाज और अन्ततः विश्व में क्या प्रभाव पड़ेगा। किन्तु आज जब हम इस क्षेत्र में प्रवेश कर रहे होते हैं, तो इससे पूर्व इसमें निहित सम्भावनाओं पर निश्चित रूप से विचार करते हैं।
आज पत्रकारिता केवल प्रकाशित होने वाले समाचारपत्रों पत्र-पत्रिकाओं तक ही सीमित नहीं रह गई है, प्रिंट मीडिया के अलावा इलेक्ट्रॉनिक मीडिया, इंटरनेट और यहां तक कि मोबाइल सेवा में भी पत्रकारिता का हस्तक्षेप शुरू हो गया है। इससे भी आगे जहां तक अभी हमारी सोच व नजर नहीं पहुंची है, पत्रकारिता के विस्तार की सम्भावनायें बढ़ी हैं, जैसा कि पहले कहा जा चुका है कि पूर्व में मिशन भावना से शुरू हुई पत्रकारिता जहां सामाजिक, राजनैतिक आदि समाचारों का संकलन, साहित्य का सृजन आदि तक ही सीमित थी वहीं अब पत्रकारिता के साथ जुड़ी व्यावसायिकता और विज्ञान के बढ़ते चरणों ने सम्भावनाओं को भी विस्तार दे दिया है। अपनी मनोवृत्ति, अभिरुचि के अनुसार इस क्षेत्र में सबके लिए द्वार खुले पड़े हैं। क्योंकि पत्रकारिता के साथ वाणिज्य व्यापार और व्यवसाय से जुड़े तमाम विषय, खेल, संस्कृति, भाषा, कला, सिनेमा, फोटोग्राफी, कार्टून, साहित्य, सामान्य राजनीति, अन्तर्राष्ट्रीय राजनीति, कूटनीति, विश्वव्यापी हलचलें, पर्यावरण, पर्यटन व साहसिक पर्यटन सहित आदि विषय जुड़ गए हैं। पूर्व में युद्ध के समाचारों का संकलन बहुत बड़े जोखिम का काम था। आज भी जोखिम के रहते हुए उसमें तकनीक भी जुड़ गई है।
जाहिर है पत्रकारिता के क्षेत्र में आए इस विस्तार ने व्यक्तित्व के विकास की सम्भावनाओं में भी नए आयाम जुड़े हैं और अपनी क्षमता और अभिरुचि के अनुरूप सम्भावनायें तलाशने का अवसर बढ़ा है। प्रिंट मीडिया हो अथवा इलैक्ट्रॉनिक मीडिया अब इनमें समाचार सहित तमाम अन्य विषयों के साथ विज्ञापनों का महत्व प्रमुख हो गया है यानी विज्ञापन कला भी पत्रकारिता से अलग नहीं की जा सकती है। पूर्व में जहां संवाद व विज्ञापन दो विपरीत कार्य समझे जाते थे अब इन दोनों का आपस में घालमेल हो गया है। विज्ञापन के क्षेत्र में आम लोगों को आकर्षित करने की तकनीक का भी विकास हुआ है और इसमें बहुत कुछ नया करने, तलाशने की सम्भावनायें विद्यमान है। किसी भी समाचार पत्र या पत्रिका में छपे समाचार की ओर पाठक का ध्यान सबसे पहले उसमें छपे चित्र में जाता है। यह चित्र समाचार का एक प्रकार से प्राण बन जाता है और जीवन्तता ला देता है। चित्र का हमारे मन मस्तिष्क में प्रथम दृष्ट्या प्रभाव पड़ता है। लेखन के साथ अथवा पृथक से फोटो पत्रकारिता का अपना एक अलग ही स्थान बनता जा रहा है। यह फोटो पत्रकारिता स्टूडियो में फोटो बनाने अथवा शादी-व्याह के फोटो लेने से अलग है। इस अन्तर को भी समझने की जरूरत है और इस तरह की पत्रकारिता के लिए एक अलग दृष्टि की जरूरत होती है। फोटो जर्नलिस्ट प्रेस रिपोर्टर के साथ कदम से कदम मिलाकर चलता है, कहानी के अनुसार फोटो लेता है। घटना को कैमरे में कैद करने के लिए चीते की जैसी फुर्ती होनी चाहिए, क्योंकि अगर चूक गए तो वह मौका फिर कभी न मिलेग हर पब्लिशिंग हाउस में फोटो डिपार्टमेंट मैनेजमेंट की संरचना अलग-अलग होती है। बड़े संस्थानों में फोटोग्राफी के लिए अलग एडीटर नियुक्त होता है, जिसका काम फोटो सम्पादन की एक टीम तैयार कर लगातार देखरेख करते रहना होता है। फोटो पत्रकारिता का काम अब केवल फोटो खींचने तक ही सीमित नहीं रह गया है। डिजीटल कैमरे से अथवा अन्य तकनीक के प्रयोग से कम्प्यूटर में लोड करना, एडिट करना, स्कैन करना और उसे उचित कलर देना आदि बातें भी शामिल हैं। यानी पत्रकारिता के हर क्षेत्र में उसके विविध आयामों की पहचान और समझ का होना बहुत जरूरी हो गया है।
पूर्व में जहां समाचार संकलन और समाचारों का प्रेषण कठिन था वहीं अब इस तकनीक में भी नए-नए प्रयोग हो रहे हैं और पत्रकारिता करने वालों के सामने प्रतिस्पर्धा के दरवाजे खुले हैं देश दुनिया की हर पल की खबरें और उन खबरों से पड़ने वाले प्रभावों पर विस्तृत चर्चा भी पत्रकारिता में शामिल हो गई है। यानी कि पत्रकारिता में सम्भावनायें खोजने वालों के सामने बहुत सारे विकल्प पड़े हैं। किन्तु यह ध्यान देने की बात है कि इस व्यापकता के साथ इस पेशे से जुड़ी सीमाओं को भी महत्व दिया जाना जरूरी है। हमें अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता है किन्तु यह स्वतंत्रता दूसरे की स्वतंत्रता का अतिक्रमण न करे यह ध्यान देना भी महत्वपूर्ण है।
पत्रकारिता थाना, कचहरी अस्पताल, हत्या, बलात्कार के समाचार लाने तक ही नहीं सिमटी है। इसका स्वरूप व्यापक हो गया है। वर्तमान में समाचार पत्रों का एक समूह व पत्रकार इसी तरह के समाचारों तक सिमट कर रह गए हैं और इसमें उन्होंने स्टिंग आपरेशन या खोजी पत्रकारिता का घालमेल कर दिया है। इसी लिए समाचार पत्र आलोचना के घेरे में भी आ रहे हैं। हम क्यों दिनमान, रविवार, धर्मयुग और साप्ताहिक हिन्दुस्तान सरीखी पत्रिकाओं व रघुबीर सहाय राजेन्द्र माथुर, सुरेन्द्र प्रताप सिहं जैसे पत्रकारों को याद करते हैं? इसीलिए कि उन्होंने आजादी के बाद की पत्रकारिता की गौरवशाली परम्परा का निर्वहन किया और पाठकों को बहुत कुछ दिया। पत्रकारिता में आए हास और गिरते स्तर के लिए व्यावसायिकता को जिम्मेदार ठहराया जाता रहा है लेकिन कौन सा ऐसा व्यवसाय या व्यवहार वर्तमान में रह गया है जिसमें व्यावसायिकता की घुसपैठ नहीं है। शिक्षा, स्वास्थ्य, न्याय जैसे कल्याणकारी व लोकहित के कार्यों को भी व्यवसाय ने जकड़ लिया है। किन्तु पत्र और मीडिया अपनी पाठक संख्या में तभी बढ़ोत्तरी भी कर सकता है जब वह अलग-अलग लोगों की जरूरतों और इच्छाओं के अनुरूप उन तक अपनी पहुंच बनाए और समाचार पत्रों को उनके जीवन का आवश्यक हिस्सा बना डाले। अर्थ व्यवस्था व वाणिज्य के क्षेत्र में भी पत्रकारिता ने अपना विशेष स्थान बना लिया है। समाचार पत्रों में पूरा स्थान अर्थ सम्बंधी समाचारों, समस्याओं, सम्भावनाओं आदि को दिया जाता है और इस क्षेत्र में महारथ हासिल लोगों का अच्छा दबदबा बना हुआ है। इसी तरह जहां पूर्व में खेल समाचार पत्रों में नहीं के बराबर होते थे अब इस क्षेत्र में रुचि रखने वाले लेखकों, समीक्षकों के साथ पाठकों का एक बहुत बड़ा वर्ग जुड़ा हुआ है। इस क्षेत्र में काम करने वाले पत्रकारों को खेल की बारीकियों से पूरी तरह परिचित होना चाहिए। इसी तरह सिनेमा जगत ने भी अपना दबदबा पत्रकारिता में बना डाला है। कोई भी पत्र वर्तमान में सिने जगत के समाचारों और उसके साथ जुड़े ग्लैमर से अलग नहीं है। ग्लैमर में जहां विस्तृत सम्भावनायें तलाशी जा रही हैं वहां निश्चित रूप से उस ग्लैमर को सामने लाने में मीडिया ही महत्वपूर्ण भूमिका अदा कर सकता है। सिने जगत की पत्रकारिता के लिए जरूरी है कि पत्रकार उन बारीकियों का ज्ञान रखे जो इस क्षेत्र में जरूरी हैं। आर्किटेक्चर, कला और संस्कृति के साथ रेखा चित्रों, कार्टूनों का भी अपना विशेष महत्व है। कानून की जानकारियां और उसके दांव-पेंचों के साथ सही जानकारियों को भी पत्रकारिता में स्थान मिला है। कृषि और कृषि से सम्बंधित व्यवसाय, तकनीक व अन्य जानकारियों पर अभिरुचि रखने वालों के लिए भी पत्रकारिता के क्षेत्र में भरपूर अवसर है। व्यंग लेखन, राजनैतिक समीक्षा, सामाजिक विश्लेषण तमाम ऐसे विषय है जिनमें अभिरुचि और क्षमता के अनुरूप प्रवेश के द्वार खुले हैं। समाचार पत्रों में मालिकाना हस्तक्षेप और शोषण की बढ़ती प्रवृत्ति को आम देखा जा रहा है और स्थापित पत्रकार भी असुरक्षित महसूस करने लगे हैं, किन्तु स्वतंत्र रूप से इस क्षेत्र में काम करने के लिए भी व्यापक सम्भावनायें बढ़ती जा रही हैं।
जहां हम व्यावसायिकता की ओर बढ़ते पत्रकारिता के चरणों से कभी-कभी भयमीत व आतंकित हो उठते हैं और इसे घातक लक्षण बताते हैं वहीं पत्रकारिता के व्यवसाय में प्रवेश करते ही उसके लिए अब कोई भी क्षेत्र पहुंच से बाहर नहीं रह गया है, जरूरत सिर्फ दृष्टि की रह गई है। घातक तो हर व्यवसाय तब बनता है जब उसमें माफिया, राजनीति व ब्यूरोक्रेसी का गठजोड़ हावी होने लगता है और वह उस व्यवसाय की आत्मा को मजबूर हो जाने या बिक जाने के लिए विवश कर देता है। पर्यावरण व सामाजिक प्रदूषण पैदा करने वाली साम्राज्यवादी शक्तियों के बढ़ते षड़यंत्र, जिनके कारण मानव जीवन संकटग्रस्त होने लगा है, साहित्य, कला, संस्कृति शिक्षा और वैज्ञानिक शोध के क्षेत्र में बहुराष्ट्रीय कम्पनियों का कसता शिकंजा, लगता है रोजगार की सम्भावनाओं के असंख्य द्वार खोलता जा रहा है लेकिन उसके दुष्परिणामों को देखने की शक्ति सामर्थ्य होना बदलती पत्रकारिता के स्वरूप के बावजूद भी जरूरी है और यही पत्रकारिता का मूल मंत्र भी है। शिक्षा के क्षेत्र में राज्य के अपने हाथ खींच लेने और उसके स्थान पर निजीकरण को खुली छूट दिए जाने के फलस्वरूप आम आदमी की पहुंच से शिक्षा का बाहर हो जाना समाज में असमानता और विसंगतियां पैदा करता जा रहा है. जिसके परिणाम अच्छे संकेत नहीं देते। बढ़ती असमानताओं और विसंगतियों से नजरअंदाज किया जाना भी पत्रकारिता की मूल भावना से आंख मूंद लेना ही कहा जाएगा। जहां पत्रकारिता के क्षेत्र में सम्भावनायें बढ़ी हैं, व्यापकता पैदा हुई है वहीं उसमें व्यापक, सम्यक और दूरगामी सोच का समावेश भी नितान्त जरूरी हो गया है।
पत्रकारिता का एक नया क्षेत्र खोजी पत्रकारिता का है। किसी भी घटना चाहे वह आर्थिक हो, सामाजिक हो, राजनैतिक या अपराध परक दुर्घटना सम्बंधी हो, साधरणतया वह कब, कहां, क्यों, कैसे, कौन जैसे समाचार के मूल सिद्धान्तों के आधार पर समाचार बनती है, किन्तु हर घटना के पीछे बहुत कुछ छिपा रहता है। उस सच्चाई को खोजबीन के बाद सामने लाना अन्वेषणात्मक या पत्रकारिता है। अन्वेषणात्मक पत्रकारिता का अपना एक विशेष स्थान बन गया है। इस प्रकार की पत्रकारिता मुख्यतः विवादास्पद तथ्यों या घटनाओं के उपर सच्चाई को जानने के लिए की जाती है। पत्रकारिता के कुछ विशेषज्ञ क्षेत्रों में खेल पत्रकारिता और पर्यटन पत्रकारिता भी शामिल हैं।
पत्रकारिता के क्षेत्र
खेल पत्रकारिता -
खेल पत्रकारिता ने आज विश्व में अपना एक अलग स्थान बना लिया है। एक समय था जब खेलों को पत्रों में स्थान नहीं मिल पाता था किन्तु अब खेल पत्रिकाओं के अलावा समाचार पत्रों में पृथक से खेल समाचारों को स्थान दिया जाता है। टेलीविजन के बाजार में आने से पूर्व रेडियो पर कमेंट्री सुनने के लिए भीड़ जुट जाया करती थी और आज टेलीविजन पर भी खेल का आखों देखा हाल देखने लोग उमड़ पड़ते हैं। खेलों में भी अलग-अलग अभिरुचियों के अनुसार पत्रकारिता के लिए द्वार खुले हैं। इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में तो खेल पत्रकारों का महत्व बहुत अधिक माना जाता है, लेकिन खेल पत्रकारिता के लिए खिलाड़ियों से भी अधिक पैनी नजर और विश्लेषण की क्षमता पत्रकार को जुटानी होती है।
पर्यटन पत्रकारिता -
तीर्थाटन और पर्यटन बहुत पुरानी परम्परा है। वेनसांग की यात्रा हो, इब्नबतूता की यात्रा हो, फाहियान की यात्रा हो, इत्सिंग की यात्रा हो, मार्कोपोलो की यात्रा हो, वास्कोडिगामा की यात्रा हो, कोलम्बस की यात्रा हो, राहुल सांकृत्यायन की यात्रा हो या पं० नैनसिंह किशनसिंह की इनका रोचक वर्णन हमें इतिहास में मिलता है और यह रोचकता हमें बहुत बड़े ज्ञान की उपलब्धि कराती है। तत्कालीन राजनीतिक स्थिति, सामाजिक स्थिति, भौगोलिक स्थिति आदि सबका ज्ञान इन यात्राओं के वर्णनों में समेटा गया है। इनके अलावा धार्मिक, आध्यात्मिक, सांस्कृतिक तिजारती व सर्वेक्षण अन्वेषण यात्राओं का वर्णन भी हमें बहुत कुछ देता है। यद्यपि अब तीर्थाटन, पर्यटन व खोज का स्वरूप बदल गया है किन्तु पुरातन को समेटते हुए वर्तमान के लिए अनेक दरवाजे उसके सामने खुले हैं। पर्यटन सम्बंधी समाचारों ने पत्रकारिता को और अधिक रोचक बना डाला है। इस तरह पर्यटन के साथ पत्रकारिता को जोड़कर चलना और उसमें नई दृष्टि पैदा करना पर्यटन पत्रकारिता को अधिक आकर्षक बना सकता है। एवरेस्ट की ऊंची चोटी से लेकर समुद्र की गहराइयों और दक्षिण ध्रुव अभियान के समाचार और इन अभियान दलों के यात्रा वृत्तांत भी रोचकता लिए होते हैं।
संसदीय पत्रकारिता -
संसद और विधानसभा में जब भी कोई कार्यवाही होती है। उसकी सम्पूर्ण जानकारी आम लोगों तक पहुंचाना इस पत्रकारिता के अन्दर आता है। संसदीय कार्यवाही को अब न केवल समाचार पत्रों में दिया जाता है बल्कि रेडियो और दूरदर्शन पर भी प्रसारित किया जाता है, लेकिन यह काम बहु जिम्मेदारी पूर्ण है।
अनुसंधनात्मक पत्रकारिता -
उन विषयों को उजागर करना जो पहले से विद्यमान हैं किन्तु प्रकाश में नहीं आए हैं या जिन विषयों पर नए अनुसंधान किए जा रहे हैं। ऐसे विषयों पर गहन अध्ययन व विषय वस्तु की जानकारी होना जरूरी है। इस तरह के विषयों में विज्ञान, कृषि, इतिहास, भूगर्भीय तथा इसी तरह की विविध विषय वस्तुयें हो सकती हैं।
फिल्म पत्रकारिता -
वर्तमान समय में अधिकांश पत्र-पत्रिकायें फिल्म समाचारों के बिना अधूरी सी जान पड़ती हैं। कुछ पत्रिकायें तो केवल फिल्मी समाचारों के लिए ही प्रकाशित होती हैं। रेडियो और दूरदर्शन तो फिल्म जगत से ही जुड़ा लगता है। पत्रकारिता का यह स्वरूप इतना लोक प्रिय हुआ है कि समाचर पत्रों के मुख पृष्ठों में भी फिल्म जगत से जुड़े लोगों के चित्र छपने लगे हैं। इसके अलावा विज्ञापनों में भी फिल्मी अभिनेताओं नेत्रियों को विशेष महत्व दिया जाने लगा है। कई महत्वपूर्ण संदेश तक इन्हीं के माध्यम से दिए जाने लगे हैं। इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के कारण भी फिल्म पत्रकारिता का बाजार बड़ा हो गया है। लेकिन फिल्मी पत्रकारिता के लिए कला की समझ और इसे अभिव्यक्त कर सकने वाली दृष्टि होनी जरूरी हैं।
कार्टून कला -
मर्म को छू जाने वाली बात जो एक साधारण से कार्टून के माध्यम से कही जा सकती है वह पन्ने दर पन्ने लिख डालने के बाद भी कभी-कभी नहीं कही जा सकती है। एक अच्छे कार्टूनिस्ट के लिए चित्रकला की जानकारी होना तो जरूरी है ही, उसे पात्रों की भावभंगिमाओं से पैदा होने वाले प्रभाव की भी जानकारी होनी चाहिए, साथ ही उसके साथ का कथन भी दमदार होना चाहिए। चित्र अच्छा हो और कथन दमदार न हो या कथन दमदार हो और चित्र अच्छा न हो तो वह प्रभावोत्पादक नहीं रह जाता है। समाचार पत्रों में कार्टून का अपना एक विशेष महत्व पाठक का ध्यान अपनी ओर खींचने के लिए है। इसके अलावा इस शैली में कई कार्टून पत्रिकायें भी प्रकाशित होती हैं। बच्चों को कार्टून अथवा चित्रमय पत्रिकायें अधिक अच्छी लगती हैं। बच्चों के ज्ञानवर्द्धन के लिए नई-नई व आकर्षक चित्रकथायें कार्टूनों के माध्यम से बनाई जा सकती हैं। समाचार पत्रों में प्रायः राजनैतिक विषयों पर चुटीले कटाक्ष अक्सर देखने को मिलते हैं। जिन समाचार पत्रों में चुटीले कार्टून हुआ करते हैं, उनमें पाठक पहले कार्टून को ही तलाशता है।
व्यंग्य लेखन -
व्यंग्य लेखन आम लेखन कला से भिन्न है। साधारण सी बात को अनूठे व्यंग्यात्मक और चुटीले अंदाज में कह देने पर पाठक सहज में ही विषय का आनन्द लेने लगता है। आज से कुछ साल पहले जब नवभारत टाइम्स में शरद जोशी का अन्तिम पृष्ठ के शीर्ष में प्रति दिन' नामक कालम छपता था तो पाठक नवभारत टाइम्स का मुख पृष्ट देखने से पहले अन्तिम पृष्ट में छपे इस कालम को पढ़ता था। विषय की दुरूहता और गम्भीरता को भी सहज, सामान्य व गुदगुदाने वाले अंदाज में जब मर्म को छूने वाली शैली में पाठक के समक्ष प्रस्तुत किया जाता है तो पाठक उसका अभ्यस्त हो जाता है। लेकिन सहज होते हुई भी यह शैली आसान नहीं है। जैसे कविता हर कोई नहीं लिख सकता है उसी तरह व्यंग्य लेखन भी सबके सबके बूते का नहीं हां जो इस विधा को विकसित कर लेता है वह लोकप्रियता हासिल कर लेता है। व्यंग्य राजनीति के अलावा तमाम सामाजिक विषयों पर लिखे जा सकते हैं तथा तत्कालिक घटनाओं पर लिखे गए व्यंग्य अधिक पसंद किए जाते हैं।
स्तम्भ लेखन -
समाचार पत्रों में कई स्तम्भ होते हैं। सम्पादकीय पृष्ठ पर ही तात्कालिक विषयों पर कई आलेख प्रकाशित हुआ करते हैं। इसके अलावा राजनीति, वैश्विक विषयों पर परिचर्चा, खेल, सिनेमा, व्यापार वाणिज्य, कानून, फैशन, सांस्कृतिक, धार्मिक, वैज्ञानिक, पर्यटन, ज्योतिष, योग सम्बंधी, आध्यात्मिक आदि विषयों पर अपनी अपनी अभिरुचि के अनुसार लिखने वाले विषय विशेषज्ञों, विचारकों को अच्छा स्थान मिलता है और एवज में अच्छा पारिश्रमिक भी दिया जाता है। इंटरनेट के माध्यम से यह कार्य अब और भी आसान होता जा रहा है। पत्र-पत्रिकाओं के लिए भी कई महत्वपूर्ण व प्रासंगिक जानकारियां तत्काल मिल रही हैं।
महिला पत्रकारिता -
महिला विषयों पर कई पत्रिकायें व समाचार पत्र प्रकाशित होते हैं। इनके अलावा तमाम पत्र पत्रिकाओं में महिलाओं से सम्बंधित समाचार तथा अय सामग्रियां प्रकाशित होती हैं। महिलायें इन विषयों को और अच्छी तरह व्याख्यायित कर सकती हैं। महिलाओं की स्वास्थ्य, शैक्षिक कानूनी, शिक्षा, साजसज्जा, सौन्दर्य प्रसाधन, खानपान आदि सम्बंधी जानकारियां इसमें समेटी जा सकती हैं इसके अलावा महिला जागरूकता के सवालों और दायित्वों पर विषय सामग्री समेटी जा सकती है।
बाल पत्रकारिता -
बच्चों के अभिरुचि के विषयों और समाचारों को समाचार पत्र अपने विशेष संस्करणों में दिया करते हैं। इनके अलावा भी कई पत्र पत्रिकायें बच्चों के ज्ञान व मनोरंजन के लिए प्रकाशित होती हैं। इस विषय पर अभिरुचि रखने वालों के लिए भी एक अच्छा विषय है। रेडियो और टेलीविजन में भी बच्चों के कार्यक्रमों को रोचकता के साथ प्रसारित किया जाता है। इन कार्यक्रमों को तैयार करना भी आसान नहीं हैं। बाल मन को टटोलना और उसकी भावनाओं को प्रदर्शित करना बहुत श्रमसाध्य है।
कृषि पत्रकारिता -
कृषि अनुसंधान केन्द्रों, कृषि विश्वविद्यालयों में कृषि सम्बंधी कई पत्रिकायें प्रकाशित होती हैं। कृषि के सम्बंध में नई खोजों, उनमें लगने वाली बीमारियों और उनका उपचार प्रौद्योगिकी की जानकारी आदि विषयों को इनमें लिया जाता है। कृषि के क्षेत्र में जानकारी रखने वाले यदि पत्रकारिता के क्षेत्र में प्रवेश करें तो वे आसानी से कृषि सम्बंधी विषयों पर काम कर सकते हैं। इसके अलावा भी किसानों और खेतीबाड़ी सम्बंधी कई पत्र-पत्रिकायें भी अलग से प्रकाशित होती हैं। केवल कृषि सम्बंधी ही नहीं बाजार भाव और कृषि उत्पादों में आ रहे उतार-चढ़ाव आदि भी इसमें समेटा जाता है। इस तरह की पत्रिकाओं में ग्रामीण परिवेश पर चर्चा, कानूनी जानकारी, विकास के विविध आयामों की चर्चा को भी समेटा जा सकता है ताकि ग्रामीण पाठकों के लिए आकर्षण की विषयवस्तु तैयार की जा सके ।
इंटरनेट पत्रकारिता -
रेडियो पत्रकारिता और टेलीविजन पत्रकारिता के बाद अब जमाना इंटरनेट पत्रकारिता का जमाना आ गया है। इंटरनेट ने पत्रकारिता के क्षेत्र में बहुत बड़ा क्रान्तिकारी परिवर्तन ला दिया है। टेलीविजन और कम्प्यूटर के विकास की कहानी के साथ इंटरनेट का भी अपना इतिहास है। कहा गया है कि तकनीकी संगठनात्मक और सामाजिक सम्पर्क स्थापित करने का प्रयास मैसाचुसेस्ट तकनीकी संस्थान के जे. सी. आर. लिकप्लाइडर द्वारा लिखे गए ज्ञापनों के रूप में सामने आए।
उन्होंने कम्प्यूटर की ऐसी विश्वव्यापी अंतरसंबंधित श्रृंखला की कल्पना की थी. जिसके माध्यम से वर्तमान इंटरनेट की ही तरह आंकड़ों और कार्यक्रमों को तत्काल प्राप्त किया जा सके। 1972 में अन्तर्राष्ट्रीय कम्प्यूटर संचार सम्मेलन में बोब कँहन ने पहली बार नेटवर्क का सार्वजनिक प्रदर्शन किया। सूचना क्रांति के इस दौर में इंटरनेट ने जो स्थान बना लिया है उससे तो समूचा पत्र जगत कभी-कभी भयभीत होने लगता है, क्योंकि तमाम सूचनाओं की और वह भी तत्काल जानकारी इंटरनेट के माध्यम से लोगों तक पहुंचने लगी है। यह विषय बहुत ही विस्तृत है और दिन प्रतिदिन इसमें नये प्रयोग परिवर्तन आते जा रहे हैं। जीवन की तीव्र होती जा रही रफ्तार के साथ नेट पत्रकारिता के लिए भी नए दरवाजे खोल दिए हैं। अतः निसंदेह यह कहा जा सकता है कि आने वाला कल, नेट पत्रकारिता का है और मोबाइल पत्रकारिता भी उसके साथ कदम से कदम मिला कर चलने वाली है।
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