महात्मा गांधी द्वारा जनमत निर्माण - Opinion Formation by Mahatma Gandhi

महात्मा गांधी द्वारा जनमत निर्माण - Opinion Formation by Mahatma Gandhi


महात्मा गांधी ने भारत का ही नहीं पूरे विश्व का लोकमत हासिल किया और यही बात है कि आज भी बापू को पूरे विश्व में अहिंसा के पुजारी व एक आदर्श जन नेता के रूप में पूजा जाता है।


इस पृष्ठभूमि में लोकमत निर्माण कला के सिद्धान्तों के क्रियात्मक प्रयोग को भारत के स्वतंत्रता संग्राम में अपनाए गए प्रचार-साधनों के विश्लेषण से आसानी से समझा जा सकता है। महात्मा गांधी और लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक आदि महान नेताओं ने राष्ट्रीय संग्राम के लिए जनता का आह्वान किया। वे लोकसम्पर्क शास्त्र के विशेषज्ञ तो नहीं थे और न ही लोकसम्पर्क इनका व्यवसाय या पेशा था। फिर भी जिस कार्यकुशलता से उन्होंने प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से व्यवहारवादी मनोविज्ञान की उपर्युक्त मान्यताओं का उपयोग किया, उसका प्रमाण राष्ट्रीय आन्दोलन की सफलता से मिलता है।


सामाजिक जीवन के विभिन्न प्रेरक तत्वों के अध्ययन और विश्लेषण से इस बात का अनुमान लग सकता है कि जनसमुदाय का झुकाव किस ओर है और सामाजिक जीवन की धारा किस ओर बह रही है। इस प्रकार नए आदर्शों और सिद्धांतों का निर्माण होता है। "समाजवाद" का आदर्श भी इसी तरह उभरा और फिर इसे प्राप्त करने के लिए जन-आंदोलनों का सृजन और संगठन हुआ।


प्रत्येक आन्दोलन का अपना अपना कार्यक्रम होता है और उसे सामुहिक रूप देने के लिए नारा दिया जाता है। जैसे विश्वव्यापी मजदूर आन्दोलन ने सारी दुनिया के मजदूरों एक हो जाओ" का नारा दिया। इसी नारे का प्रतीक बना दरांती और हथौड़े वाला लाल झंडा इस सन्दर्भ में भारत के स्वतंत्रता संग्राम का उल्लेख भी अप्रासंगिक नहीं होगा राष्ट्रीय स्वतंत्रता बापू का ध्येय था। उनका यह विश्वास था कि जब तक राष्ट्र बिट्रिश साम्राज्य की दासता से मुक्त नहीं होता, देश का राजनीतिक और सामाजिक विकास अवरुद्ध रहेगा। उन्होंने अहिंसा और सत्य के आदर्शों के अनुसार सामूहिक एवं वैयक्तिक सत्याग्रह और रचनात्मक सेवाओं को राष्ट्र जागरण का कार्यक्रम बनाया।


"करो या मरो" का मंत्र गांधी जी ने सन् 1942 के "भारत छोड़ो आन्दोलन में दिया था। यह नारा अखिल भारतीय कांग्रेस समिति की उस बैठक में दिया गया था जिसमें भारत छोड़ो" प्रस्ताव स्वीकृत हुआ था। यह घटना 8 अगस्त 1942 की रात की है। इसके सात घंटे बाद यानी 9 अगस्त 1942 को प्रातः ही गांधी जी व अन्य राष्ट्रीय नेताओं की गिरफ्तारियां हो गई और "भारत छोड़ो आंदोलन शुरू हो गया। बापू ने न नारे ही नहीं दिये, अपितु तिरंगा झंडा भी देश को दिया जो स्वतंत्रता के प्रति हमारी निष्ठा का प्रतीक बन गया राष्ट्रीय ध्वज को अपना लेने के पश्चात् हमारा स्वतंत्रता आन्दोलन स्पष्ट और सुनिश्चित रूप धारण कर गया। बापू ने खादी और चरखे को भारतीय ग्रामों के पुनर्जागरण और पुनरुद्धार का प्रतीक बनाया गांधी टोपी और खादी का परिधान स्वतंत्रता समर का सिपाही होने की निशानी बन गया गांधी टोपी और खट्टर धारी हर व्यक्ति को बापू के आदर्शों का प्रचारक और संदेशवाहक माना जाता था माहे वह मुख से एक शब्द भी न निकाले। खद्दरधारी स्वयंसेवक जब "विजयी विश्व तिरंगा प्यारा झंडा ऊंचा रहे हमारा गाकर झण्डे का अभिवादन करते थे तो बिना किसी विशेष प्रयास के राष्ट्रीय जागरण का संदेश घर-घर पहुंच जाता था और लोग घडाघड आन्दोलन में सम्मिलित होने लगते थे। गांधी जी के पास ऐसे विचार थे, ऐसे सिद्धान्त थे जो लोगों को उनके साथ जुड़ने को मजबूर कर देते थे। यही उनका लोकमत अथवा जनमत निर्माण का एक तरीका था जिसने उन्हें एक आन्दोलनकारी से राष्ट्रपिता बना दिया।