उत्तराखण्ड की पत्रकारिता का उद्भव एवं विकास - Origin and Development of Journalism in Uttarakhand

उत्तराखण्ड की पत्रकारिता का उद्भव एवं विकास - Origin and Development of Journalism in Uttarakhand


यद्यपि 1842 में एक अंग्रेज व्यवसायी और समाजसेवी जान मेकिनन ने अंग्रेजी भाषा में मसूरी से "द हिल्स" नामक समाचार पत्र का प्रकाशन शुरू कर दिया था, परन्तु 1868 में नैनीताल से प्रकाशित होने वाला "समय विनोद" उत्तराखण्ड से निकलने वाला पहला देशी (हिन्दी-उर्दू) पत्र था पत्र के संपादक - स्वामी जयदत्त जोशी वकील थे। पत्र पाक्षिक था तथा नैनीताल प्रेस से छपता था। 1877 के आसपास यह समाचार पत्र कदाचित बन्द हो गया। पत्र ने सरकारपरस्त होने के बावजूद ब्रिटिश राज में चोरी की घटनाएं बढ़ने, भारतीयों के शोषण, बिना वजह उन्हें पीटने, उन पर अविश्वास करने पर अपने विविध अंकों में चिंता व्यक्त की थी।


उत्तराखण्ड ही नहीं बल्कि उत्तर प्रदेश में पत्र पत्रिकाओं के प्रकाशन के क्षेत्र में 1871 में अल्मोड़ा से प्रकाशित "अल्मोड़ा अखबार" का विशिष्ट स्थान है। इसका सरकारी रजिस्ट्रेशन नंबर 10 था और यह प्रमुख अंग्रेजी पत्र "पायनियर” का समकालीन था। इसके 48 वर्ष के जीवनकाल इसका संपादन क्रमशः बुद्धिबल्लभ पंत, मुंशी इम्तियाज अली, जीवानन्द जोशी, सदानन्द सनवाल, विष्णुदत्त जोशी तथा 1913 के बाद बद्रीदत्त पाण्डे ने किया।


प्रारम्भिक चरण में "अल्मोड़ा अखबार" सरकारपरस्त था फिर भी इसने औपनिवेशिक शासकों का ध्यान स्थानीय समस्याओं के प्रति आकृष्ट करने में सफलता पाई। कभी पाक्षिक तो कभी साप्ताहिक रूप से निकलने वाले इस पत्र ने अंग्रेजों के अत्याचारों से त्रस्त पर्वतीय जनता की मूकवाणी को अभिव्यक्ति देने का कार्य किया। इस पत्र का मुख्य विषय आंचलिक समस्याएं कुली बेगार, जंगल बंदोबस्त, बाल शिक्षा, मद्य निषेध, स्त्री अधिकार आदि रहे।


सन् 1893 - 1894 में अल्मोड़ा से कूर्मांचल समाचार" 1902 में लैंसडाउन से गिरिजा दत्त नैथाणी द्वारा संपादित मासिक पत्र "गढ़वाल समाचार" और 1905 में देहरादून से प्रकाशित "गढ़वाली" भी अपनी उदार और नरम नीति के बावजूद औपनिवेशिक शासन की गलत नीतियों का विरोध करते रहे थे।


1913 में बद्रीदत्त पाण्डे के अल्मोड़ा अखबार" के संपादक बनने के बाद इस पत्र का सिर्फ स्वरूप ही नहीं बदला वरन् इसकी प्रसार संख्या भी 50-60 से बढकर 1500 तक हो गयी। बेगार जंगलात स्वराज, स्थानीय नौकरशाही की निरंकुशता पर भी इस पत्र में आक्रामक लेख प्रकाशित होने लगे अन्ततः 1918 में "अल्मोड़ा अखबार" सरकारी दबाव के फलस्वरूप बन्द हो गया। बाद में इसकी भरपाई 1918 में बद्रीदत्त पाण्डे के संपादकत्व में ही निकले पत्र "शक्ति" ने पूरी की। शक्ति पर शुरू से ही स्थानीय आक्रामकता और भारतीय राष्ट्रवाद दोनों का असाधारण असर था। 

"शक्ति" ने न सिर्फ स्थानीय समस्याओं को उठाया वरन् इन समस्याओं के खिलाफ उठे आन्दोलनों को राष्ट्रीय आन्दोलन से एकाकार करने में भी उसका महत्वपूर्ण योगदान रहा। "शक्ति" की लेखन शैली का अन्दाज 27 जनवरी 1919 के अंक में प्रकाशित निम्न पंक्तियों से लगाया जा सकता है :


"आंदोलन और आलोचना का युग कभी बंद न होना चाहिए ताकि राष्ट्र हर वक्त चेतनावस्था में रहे अन्यथा जाति यदि सुप्तावस्था को प्राप्त हो जाती है तो नौकरशाही, जर्मनशाही या नादिरशाही की तूती बोलने लगती है।"


एक ओर बेगार, जंगलात, डोला- पालकी, नायक सुधार, अछूतोद्धार तथा गाड़ी-सड़क जैसे आन्दोलनों को इस पत्र ने मुखर अभिव्यक्ति दी तो दूसरी ओर असहयोग, स्वराज, सविनय अवज्ञा, व्यक्तिगत सत्याग्रह, भारत छोड़ो आन्दोलन जैसी अवधारणाओं को इसने ग्रामीण जन मानस तक पहुँचाने का प्रयास किया यही नहीं "शक्ति" ने साहित्यिक-सांस्कृतिक अभिव्यक्तियों को भी मंच प्रदान किया।


"शक्ति" का प्रत्येक संपादक राष्ट्रीय संग्रामी था। बद्रीदत्त पाण्डे, मोहन जोशी, दुर्गादत्त पाण्डे, मनोहर पंत, राम सिंह धौनी, मथुरा दत्त त्रिवेदी, पूरन चन्द्र तिवाड़ी आदि में से एक - दो अपवादों को छोड़कर "शक्ति" के सभी सम्पादक या तो जेल गये थे या तत्कालीन प्रशासन की घृणा के पात्र बने।








उत्तराखण्ड में पत्रकारिता के विकास के क्रम में देहरादून से प्रकाशित "गढ़वाली" (1905 – 1952) गढ़वाल के शिक्षित वर्ग के सामूहिक प्रयासों द्वारा स्थापित एक सामाजिक संस्थान था। यह उत्तराखण्ड में उदार चेतना का प्रसार करने वाले तत्वों में से एक अर्थात् उदार सरकारपरस्त संगठनों के क्रम में स्थापित “गढ़वाल यूनियन” (स्थापित 1901) का पत्र था। इसका पहला अंक मई 1905 को निकला जो कि मासिक था तथा इसके पहले सम्पादक होने का श्रेय गिरिजा दत्त नैथानी को जाता है।


"गढ़वाली" के दूसरे सम्पादक तारादत्त गैरोला बने यद्यपि “गढ़वाली" का प्रकाशन एक सामूहिक प्रयास था, परन्तु इस प्रयास को सफल बनाने में विश्वम्भर दत्त चंदोला की विशेष भूमिका थी। 1916 से 1952 तक गढ़वाली का संपादन संचालन का सारा भार विश्वम्भर दत्त चंदोला के कंधों पर ही रहा था। 47 साल तक जिन्दा रहने वाले इस पत्र ने अन्तर्राष्ट्रीय घटनाओं से लेकर विविध राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक विषयों पर प्रखरता के साथ लिखा तथा अनेक आन्दोलनों की पृष्ठभूमि तैयार की।


देखिये "गढ़वाली" की लेखनी का एक अंश: -

"कुली बर्दायश की वर्तमान प्रथा गुलामी से भी बुरी है और सभ्य गवरमैण्ट के योग्य नहीं, कतिपय सरकारी कर्मचारियों की दलील है कि यह प्राचीन प्रथा अर्थात दस्तूर है, किंतु जब यह दस्तूर बुरा है तो चाहे प्राचीन भी हो, निन्दनीय है और फौरन बन्द होना चाहिए। क्या गुलामी, सती प्रथा प्राचीन नहीं थीं।"


गढ़वाल में कन्या विक्रय के विरुद्ध आंदोलन संचालित करना, कुली बेगार, जंगलात तथा गाड़ी सड़क के प्रश्न को प्रमुखता से उठाना, टिहरी रियासत में घटित रवांई कांड ( मई 1930) के समय जनपक्ष का समर्थन कर उसकी आवाज बुलंद करना (जिसकी कीमत "गढ़वाली" के सम्पादक विश्वम्भर दत्त चंदोला को जेल जाकर चुकानी पड़ी) तथा गढ़वाल में वहां की संस्कृति एवं साहित्य का नया युग "गढ़वाली युग" आरम्भ करना "गढ़वाली" के जीवन के शानदार अध्याय हैं ।


पत्रकारिता के इसी क्रम में पौड़ी से सदानन्द कुकरेती ने 1913 में "विशाल कीर्ति" का प्रकाशन किया और “गढ़वाल समाचा तथा "गढ़वाली" के सम्पादक रहे गिरिजा दत्त नैथाणी ने लैंसडाउन से "पुरुषार्थ" (1918-1923 ) का प्रकाशन किया। इस पत्र ने भी स्थानीय समस्याओं को आक्रामकता के साथ उठाया।


स्थानीय राष्ट्रीय आन्दोलन के संग्रामी तथा उत्तराखण्ड के प्रथम बैरिस्टर मुकुन्दीलाल ने जुलाई 1922 में लैंसडाउन से "तरुण कुमाऊँ" (1922 1923) का प्रकाशन कर राष्ट्रीय तथा स्थानीय मुद्दों को साथ-साथ अपने पत्र में देने की कोशिश की। इसी क्रम में 1925 में अल्मोड़ा से कुमाऊँ कुमुद" का प्रकाशन हुआ। इसका सम्पादन प्रेम बल्लभ जोशी, बसन्त कुमार जोशी, देवेन्द्र प्रताप जोशी आदि ने किया । शुरू में इसकी छवि राष्ट्रवादी पत्र की अपेक्षा साहित्यिक अधिक थी।


उत्तराखण्ड की पत्रकारिता के इतिहास में अल्मोड़ा से प्रकाशित "स्वाधीन प्रजा" (1930 - 1933) का भी महत्वपूर्ण स्थान है। इसके सम्पादक प्रखर राष्ट्रवादी नेता विक्टर मोहन जोशी थे। अल्पजीवी पत्र होने के बावजूद यह पत्र अत्यधिक आक्रामक सिद्ध हुआ। पत्र ने अपने पहले अंक में ही लिखा "भारत की स्वाधीनता भारतीय प्रजा के हाथ में हैं। जिस दिन प्रजा तड़प उठेगी, स्वाधीनता की मस्ती तुझे चढ़ जाएगी, ग्राम ग्राम नगर नगर देश प्रेम के सोते उमड़ पड़ेंगे तो बिना प्रस्ताव, बिना बमबाजी या हिंसा के क्षण भर में देश स्वाधीन हो जाएगा। प्रजा के हाथ में ही स्वाधीनता की कुंजी है।" इसी क्रम में 1939 में पीताबर पाण्डे ने हल्द्वानी से "जागृत जनता का प्रकाशन किया। अपने आक्रामक तेवरों के कारण 1940 में इसके सम्पादक को सजा तथा 300 रू० जुर्माना किया गया । भक्तदर्शन तथा भैरव दत्त धूलिया द्वारा लैंसडाउन से 1939 से प्रकाशित "कर्मभूमि" पत्र ने ब्रिटिश गढ़वाल तथा टिहरी रियासत दोनों में राजनैतिक, सामाजिक, साहित्यिक चेतना फैलाने का कार्य किया। गढ़वाल के प्रमुख कांग्रेसी नेता भैरव दत्त धूलिया, भक्तदर्शन, कमलसिंह नेगी, कुन्दन सिंह गुसांई, श्री देव सुमन, ललिता प्रसाद नैथाणी, नारायण दत्त बहुगुणा इसके सम्पादक मण्डल से जुड़े थे। “कर्मभूमि" को समय समय पर ब्रिटिश सरकार तथा टिहरी रियासत दोनों के दमन का सामना करना पड़ा। 1942 में इसके संपादक भैरव दत्त धूलिया को चार वर्ष की नजरबंदी की सजा दी गयी।


उत्तराखण्ड में दलित पत्रकारिता का उदय 1935 में अल्मोड़ा से प्रकाशित "समता" (1935 से लगातार) पत्र से हुआ। इसके संपादक हरिप्रसाद टम्टा थे। यह पत्र राष्ट्रीय आन्दोलन के युग में दलित जागृति का पर्याय बना। इसके संपादक संक्रिय समाज सुधारक होने के बावजूद संग्रामी नहीं थे।