भारत में जनसम्पर्क का उद्भव एवं विकास - Origin and Development of Public Relations in India

 भारत में जनसम्पर्क का उद्भव एवं विकास - Origin and Development of Public Relations in India


भारत की समस्त परम्पराएं, सामाजिक जीवन में जनसंम्पर्क के महत्व और जनसम्पर्क के निर्माण की कार्यविधियों पर आधारित हैं। वैदिक काल में देवासुर संग्राम में देवताओं द्वारा विजेताओं पर प्रसंगानुसार पुष्प वर्षा, नारद का संवादवाहक के रूप में तीनों लोकों का भ्रमण और राजसूय यज्ञों की व्यवस्था, ये सब पौराणिक बातें प्रागैतिहासिक काल में लोकमत निर्माण के उपक्रम का ही अंग समझी जाती थीं। अशोक के शिलालेख, राजस्थान का कीर्तिस्तम्भ अकबर की फतेहपुर सीक नगरी, मंदिरों के घंटे घड़ियाल, मुनादी वाले के ढोल, पंचायतों की घंटी से लेकर राजमहलों में लगी न्याय की जंजीर तक सभी का प्रचार व सम्पर्क की दृष्टि से अपना महत्व है।


भारत में प्रारम्भिक जनसम्पर्क :


जनसम्पर्क के आरम्भ को जानने के लिए हम इतिहास के ज्ञात स्रोतों की तरह किसी निश्चित तारीख को निर्धारित नहीं कर सकते हैं किन्तु माना जा सकता है कि मानव के उद्भव के साथ ही जनसम्पर्क का उद्भव भी हुआ। मानव सदैव ही समन्वयी प्रवृत्ति का रहा है। उसकी चेष्टा रही है कि परिवेश के अनुरूप उसके कार्य की सराहना की जाए और विरोध को समाप्त किया जाए। इसमें 'जनमत' अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। रामचरित मानस में प्रसंग मिलता है कि श्री राम ने एक धोबी के कहने पर सीता को वाल्मीकि के आश्रम में भेज दिया था। प्राचीन काल में राजा अपना देश बदल कर जनता के सुख-दुख की जानकारी रखते थे बड़े-बड़े सम्राटों और वंशों में गुप्तचर दूत आदि जनता से प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष सम्बन्ध बनाए रखते थे।


प्राचीन काल में पड़ोसी राज्यों से आक्रमण और सत्ता हस्तान्तरण का डर बना ही रहता था। ऐसे में दूर-दूर तक फैले साम्राज्य में सूचना देना व जनता को विपत्ति का आभास दिलाना जरूरी था अतः आवाजाही के प्रमुख मांगों पर बुर्जियां होती थी और घुडसवार, पैदल या अन्य सैनिक एक बुर्जी से दूसरी बुर्जी तक समाचार पहुंचाते थे। जनसम्पर्क को अधिक प्रभावी बनाने के लिए शासक जनता की आशाओं का अनुमान भी लगाते थे ऐसे राजा जो समाज के कल्याणकारी गतिविधियों के लिए जागरूक थे। वे अपने महत्वपूर्ण निर्णयों को 'शिलालेखों के रूप में राज्य के कई भागों में लगवा देते थे। अशोक का नाम इतिहास में ऐसे जनसम्पर्क करने वाले सम्राट के रूप में विख्यात है। इसी प्रकार अन्य शासक भी महत्वपूर्ण धर्मादिशों, राजाशाओं व फरमानों को जनता तक पहुंचाते थे। कई राजाओं ने अपने काल की उपलब्धियों के प्रचार हेतु अपने राज्य में प्रवीण लेखकों व कवियों को श्रेष्ठ स्थान प्रदान किया था जिससे उनकी उपलब्धियां दूर-दराज तक पहुंचती थीं मुनादी व फरमान द्वारा राजाज्ञा जनसामान्य तक पहुंचाई जाती थी। प्राचीन भारत में विभिन्न युगों में धर्म ने अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। हर एक राजा किसी न किसी धर्म का अनुयायी रहा है इसलिए उसकी इच्छा व प्रकृति के अनुरूप जनसम्पर्क का दायित्व ब्राह्मणों, ऋषि-मुनियों या मंत्रियों जैसे वर्ग पर होता था। यही वर्ग समय समय पर राजा को उचित शिक्षा और मार्गदर्शन भी देता था। चक्रवर्ती सम्राटों ने जनसम्पर्क के ऐसे तरीके अपनाए थे जिससे समान्यजन उन्हें समर्थन दें और छोटे राजाओं व सामता का साथ भी उन्हें मिलता रहे। राजा इसी प्रयोजन हेतु ऐसे दूत रखते थे जो शुद्ध हृदय, चतुर व कुलीन होते थे। वे देशकाल की स्थितियों के पारंगत भी होते थे।

राजामहाराजाओं और गुलामी का युग समाप्त हो जाने के पश्चात गणतन्त्र की घोषणा हुई। प्रजातंत्र में यह माना गया कि इसमें जनता द्वारा चुनी गई सरकार होने के नाते 'जनसम्पर्क का महत्वपूर्ण स्थान है। आज संसार का कोई भी शासनतन्त्र क्यों न हो वह जनसम्पर्क के बिना भली भांति कार्य नहीं कर सकता है। आज के युग में शासनतंत्र की कठिनाइयों व जटिलता के कारण शासक व शासित के बीच की दूरी को कम करने के लिए 'जनसम्पर्क' पुल का कार्य करता है।


प्राचीन भारत की सामाजिक-राजनैतिक व्यवस्था में जन सम्पर्क का विशेष महत्व माना जाता था, यद्यपि उस जमाने में इस शब्द का प्रचलन नहीं था। राजा और प्रजा के सम्बन्ध व्यक्ति की समाज के प्रति जिम्मेदारिया, व्यक्ति के व्यक्ति के प्रति कर्त्तव्य यह सभी विषय धर्म की परिकल्पना में ही शामिल समझे जाते थे। अतः लोकसम्पर्क भी धर्म का ही एक पहलू माना जाता था लोकरंजन राजा का धर्म था। आजकल के जमाने में भी लोकसम्पर्क के सामने मुख्य उद्देश्य लोकरंजन ही माना जाता है।


प्राचीन भारत में ग्रामीण लोकतंत्रों की व्यवस्था थी हमारे ग्राम स्वावलम्बी होते थे और सारी राजसत्ता विकेन्द्रित थी। लोग धर्म को सर्वोपरि मानते थे। धर्म से अभिप्राय मत-मतान्तर का संकीर्णतामूलक सम्प्रदायवाद नहीं होता था। धर्म तो एक व्यापक और विशाल दृष्टिकोण का सूचक समझा जाता था, जिसे मूल मानकर समाज में "बहुजन हिताए और बहुजन सुखाय के आदर्श से प्रतिबद्ध सारी व्यवस्था चलती थी। प्रजा की क्या आशाएं और आकांक्षाएं हैं, यह जानने के लिए राजा और शासक वे सब तरीके अपनाते थे जो प्रकारान्तर में आजकल के लोकसम्पर्क में बस्ते जाते हैं।


कौटिल्य ने अर्थशास्त्र में कहा है कि राजा को चाहिए कि वह प्रतिदिन कम से कम तीन घंटे आम दरबार लगाए और जनता की तकलीफें और शिकायतें सुने अगर राजा की प्रजा सुखी नहीं तो राजा भी चैन की नींद नहीं सो सकता। जनता की सुखसमृद्धि में राजा अपना पूर्ण योगदान दे प्रजा के सुख के लिए राजा को अपनी इच्छाओं की बलि भी देने के लिए तैयार रहना चाहिए। कौटिल्य के पथप्रदर्शन में चन्द्रगुप्त मौर्य ने अपने शासन तंत्र में एक सूचना विभाग भी संगठित किया था। सूचना विभाग का एक अनुभाग गुप्तचरों का भी होता था। यह अनुभाग "खुले" यानी सार्वजनिक लोकसम्पर्क की सहायता के लिए गुप्त जानकारी देता था। मौर्यकाल में प्रमुख नागरिकों की एक परिषद भी काम करती थी। इस परिषद का साल में एक बार अधिवेशन होता था। यह परिषद जनता की समस्याओं पर चर्चा करती थी और अपने सुझाव सरकार को भेजती थी।


सम्राट अशोक के शिलालेखों में ऐसे राजकीय कर्मचारियों का उल्लेख आया है जिन्हें "प्रतिवेदक" कहा जाता था। इनका काम सार्वजनिक हित की बातों पर सूचनाएं एकत्र करके राजा की जानकारी के लिए प्रस्तुत करना था। 'प्रतिवेदकों को यह सुविधा प्राप्त थी कि वे राजा के सामने आसानी से पेश हो सकें ताकि जनता की तकलीफें जितनी जल्दी हो सके राजा तक पहुंच जाएं।


अपने एक अन्य शिलालेख में सम्राट अशोक ने यह घोषणा भी की थी कि यह जनता का दुःख सुख सुनने के लिए हर समय तैयार रहते हैं। बाँध धर्म का तो पूरा प्रसार ही लोकसम्पर्क के जरिए हुआ था। 







मध्ययुगीन भारत में जनसम्पर्क :


हिन्दुस्तान के मुसलमान बादशाहों ओर शासकों ने प्रजा के साथ अपने सम्बन्धों को इस्लाम के सिद्धान्तों और हिन्दू प्रजा के परम्परागत रीतिरिवाजों के अनुसार निर्मित किया। उनका यह विश्वास था कि उन्हें परमात्मा के सामने इस बात का जवाब देना है कि उन्होंने अपनी प्रजा की सुखसमृद्धि के लिए क्या किया।


मुसलमान बादशाह विभिन्न विभागों में अधिकारी नियुक्त करते समय इस बात का ध्यान रखते थे कि वे कार्य कुशल, विश्वास पात्र और न्याय प्रिय हो। यह अधिकारी जनता के साथ सम्पर्क रखते थे और राजा को सूचना देते रहते थे कि लोकमत का झुकाव किस ओर है।


इन बादशाहों ने स्थानस्थान पर "वाकया नवीस यानी संवाददाता नियुक्त किए हुए थे। इसी तरह संवाददाताओं की एक श्रेणी “स्वान्ह नवीस होती थी जो प्रान्तीय या स्थानीय राजाओं या नवाबों की कचहरियों के हालात लिखकर केन्द्रीय सरकार यानी दिल्ली सम्राट को भेजा करते थे। जैसा कि नाम से स्पष्ट है कि गुप्त रिपोर्ट भेजने के लिए "खुफिया नवीस" भी रखे जाते थे। इन बादशाहों की कार्य प्रणाली का अनुसरण करते हुए हिन्दू राजाओं ने इसी प्रकार की व्यवस्था की जिसमें प्रजा के साथ उन के सम्बन्ध घनिष्ठ और सुदृढ़ हो गए। “स्वान्ह नवीस" हो या "वाकया नवीस" ये सभी लोगों के बीच में घूमते रहते थे और जनता में अगर कोई आक्रोश या असन्तोष देखते थे तो तुरन्त शासकों को सूचित करते थे। जनसम्पर्क की प्रक्रिया द्विपक्षीय होती है इसलिए राजा और शासक भी अपने आदेश भी जनता तक इन्हीं माध्यमों द्वारा लोगों तक पहुंचाते थे।


अकबर महान (1556-1605) के शासनकाल में राजा और प्रजा के सम्बन्ध बहुत सुमधुर रहे अकबर का एक दरबारी अबुल फजल लिखता है, "लोगों के कल्याण के लिए क्या कुछ हो रहा है राजा इस बात को पूरी तरह जानता है। जनता को भी सरकारी गतिविधियों की जानकारी दी जाती है इस में दोनों पक्षों (राजा प्रजा) दोनों का ही लाभ है। अकबर ने वाकया नवीसों की सेवाओं का भी खूब लाभ उठाया।