जनसंपर्क माध्यम और साधन - PR Media and Tools

 जनसंपर्क माध्यम और साधन - PR Media and Tools


आधुनिक युग में नये-नये वैज्ञानिक आविष्कारों की वजह से जन सम्पर्क स्थापित करने के लिए विभिन्न साधनों में दिनों दिन अत्यधिक वृद्धि हो रही है। अब जनसम्पर्क के नये-नये और अत्यधिक शक्तिशाली साधन विकसित हो चुके हैं। आज जन सम्पर्क को एक विशिष्ट कला बना दिया गया है। विभिन्न प्रकार के श्रव्य दृश्य साधनों के प्रयोग के द्वारा इसे अधिकाधिक सुलभ और सुन्दर बना दिया गया है। साधारणतया जनसम्पर्क स्थापित करने के लिए निम्नलिखित प्रमुख साधन अपनाये जाते हैं:


1. प्रेस तथा प्रकाशन (Press and Publication) : प्रेस तथा प्रकाशन जन सम्पर्क स्थापित करने के विभिन्न साधनों में सर्वाधिक सशक्त माने जाते हैं। प्रत्येक सरकार अपने कार्यक्रमों और योजनाओं का जनता में प्रचार प्रसार करने के लिए अनेक प्रकार की पत्र-पत्रिकाओं का प्रकाशन करती है। प्रायः प्रत्येक सरकार का अपना एक सूचना अथवा प्रकाशन विभाग होता है। यह विभाग जनता को सरकारी कार्यों की आवश्यक जानकारी देने के लिए विभिन्न प्रकार के प्रकाशन यथा पत्रिकाएं, पुस्तिकाएँ, पैम्पलेट, इत्यादि निकालता है। ये काफी सस्ते होते हैं। कुछ प्रकाशन सामग्री बिल्कुल निःशुल्क भी दी जाती है। भारत में विज्ञापन तथा दृश्य प्रचार निदेशालय कुछ ऐसी पुस्तिकाएं डाक द्वारा निःशुल्क रूप से जनसामान्य को भी भेजता है जिसमें प्रधानमंत्री का भाषण तथा नीतिगत वक्तव्य छपा रहता है। प्रकाशन विभाग का प्रमुख उद्देश्य ही यह है कि सरकारी कार्यों के बारे में जनता को जानकारी दी जाय और उन्हें तथ्यों से अवगत कराया जाय।


सरकारी कार्यों तथा उपलब्धियों को बताने के लिए न सिर्फ अपने देश में प्रकाशन सामग्री उपलब्ध करायी जाती है, बल्कि विदेशों में भी अपने दूतावासों के माध्यम से जरूरतमंद व्यक्तियों को यह प्रकाशन सामग्री दी जाती है। सरकार के उच्च पदाधिकारी प्रेस सम्मेलन के माध्यम से भी देशी तथा विदेशी पत्रकारों को अपनी नीतियों तथा उपलब्धियों के बारे में बताते हैं। निजी क्षेत्र व संस्थाएं भी जनसंपर्क के लिए प्रेस तथा प्रकाशन की मदद लेती हैं। निजी संस्थाएं अपनी पत्र पत्रिकाओं का प्रकाशन भी करती हैं और अन्य प्रकाशनों के जरिए भी अपना पक्ष लोगों के सामने रखती हैं।


2. आकाशवाणी (Radio) :- कुछ समय पूर्व तक जब दूरदर्शन नहीं था, तब तक आकाशवाणी ही जन सम्पर्क स्थापित करने का अत्यंत महत्वपूर्ण साधन था। आज भी यह सस्ता, सुलभ और विस्तृत प्रसार वाला जन सम्पर्कीय साधन माना जाता है। शिक्षित तथा अशिक्षित अमीर तथा गरीब, बुद्धिजीवी तथा किसान सभी लोगों को इससे जानकारी प्रदान की जाती है। जब भी कोई नयी सरकार आती है या कोई महत्वपूर्ण बात होती है अथवा राष्ट्रीय दिवसों पर तो शासनाध्यक्ष स्वयं आकाशवाणी से जनता को सम्बोधित करता है।

सरकार अपनी गृह नीति, विदेश नीति, आर्थिक नीति, औद्योगिक नीति, पंचवर्षीय योजनाओं आदि के बारे में आकाशवाणी के माध्यम से प्रकाश डालती है। आकाशवाणी पर प्रसारित होने वाले कार्यक्रम भी जनसम्पर्क के प्रमुख साधन हैं। आज निजी एफएम रेडियो भी जनसंपर्क का एक अच्छा साधन बन गया है। निजी संस्थाओं के प्रतिनिधि इसमें कम मूल्य पर अपना पक्ष रख कर अपना जनसंपर्क बढ़ा रहे हैं।







3. चलचित्र (Films):-  फिल्मों का प्रयोग भी सरकार अपने प्रचार के साधन के रूप में करती है। किसी विशेष विषय की जानकारी या शिक्षा देने के लिए विभिन्न प्रकार के वृत्तचित्र बनाये जाते हैं। देश-विदेश में होने वाली घटनाओं की जानकारी देने के लिए समाचार दर्शन का निर्माण किया जाता है। केन्द्र सरकार ने इसके लिए अलग से एक फिल्म डिवीजन की भी स्थापना की है, जो सरकारी चलचित्र तैयार करता है। गांव गांव एवं मोहल्लों में सरकारी गाड़ियों से घूम घूम कर भी ये चलचित्र दिखाये जाते हैं तथा इसके द्वारा प्रचार के साथ साथ मनोरंजक फिल्में भी दिखायी जाती हैं। हालांकि अब इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के आने से यह प्रथा समाप्त होने लगी है।


4. दूरदर्शन (Television):-  दूरदर्शन को आधुनिक युग की एक ऐसी देन के रूप में स्वीकार किया जाता है जो जनसम्पर्क का सर्वाधिक महत्वपूर्ण साधन बन गया है। आकाशवाणी सिर्फ श्रव्य माध्यम है परन्तु दूरदर्शन में श्रव्य और दृश्य दोनों रूप साथ-साथ दिखाये जाते हैं। फलतः इसकी विश्वसनीयता अधिक हो जाती है। दूरदर्शन के माध्यम से समाचारों का संकलन दृश्य सहित प्रस्तुत किया जाता है। महत्वपूर्ण सामयिक प्रश्नों पर विशेषज्ञों के परिसंवाद, गोष्ठियां और चर्चाएं आदि आयोजित की जाती हैं। भारत में जब से दूरदर्शन का विस्तार हुआ है तब से सरकार ने छविगृहों में अपना प्रचार लगभग बन्द सा कर दिया है तथा अब वृत्तचित्र इत्यादि दूरदर्शन पर ही दिखाई जाते हैं। देश के प्रधानमंत्री, राष्ट्रपति व अन्य महत्वपूर्ण शासन अधिकारियों के वक्तव्य आदि सम्बोधन दृश्यों सहित टेलीविजन के माध्यमों के जरिए जनता को देखने को मिल जाते हैं। जब प्रधानमंत्री अपना सम्बोधन राष्ट्र के नाम दूरदर्शन पर देते हैं तो सामान्य दर्शकों को ऐसे लगता है मानो प्रधानमंत्री उनके कमरे में बैठकर उनसे आमने सामने बातें कर रहे हैं। इस तरह की वार्ताएं और प्रचार जन सम्पर्क के अति उत्तम सहायक है। निजी क्षेत्र और कारपोरेट घराने भी जनसंपर्क के लिए टेलीविजन की ताकत को पहचान चुके हैं इसलिए वे भी अब इस माध्यम को जनसंपर्क की पहली पसंद मानने लगे हैं।


5. इलेक्ट्रॉनिक मीडिया (Electronic Media) :- बीसवीं सदी के अंतिम दशक में इलेक्ट्रॉनिक मीडिया ने काफी तीव्र और प्रभावशाली ढंग से भारतीय परिवारों के शयन कक्ष में प्रवेश किया। इसके प्रभाव और आकर्षण ने लोगों को इतना प्रभावित किया कि जनसम्पर्क के अन्य माध्यम काफी पीछे छूट गये इसमें श्रव्य और दृश्य का एक साथ सुन्दर समायोजन दिखने लगा। सन् 2000 तक ही टेलीविजन पर पचासों चैनल अपना प्रभाव जमाने के लिए प्रयत्नशील हो चुके थे। सूचना, समाचार, विश्लेषण रिपोर्ट, पैनल चर्चा आदि के माध्यम से लोगों को जाग्रत करने की जैसे होड़ मच गयी। एक दर्जन से अधिक चैनल समाचार देने लगे और आधे दर्जन चैनल तो चौबीसों घण्टे समाचार का ही प्रसारण करने लगे। अतः इसने जनसंपर्क के क्षेत्र में बहुत बड़ी क्रांति ला दी। अब तो टेली कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से समाचार कक्ष में बैठा पत्रकार देश दुनिया के विभिन्न कोनों में उपस्थित विशेषज्ञों और पत्रकारों से सजीव वार्ता कर लेता है। देश के प्रधानमंत्री राष्ट्रपति और अन्य उच्च शासन अधिकारियों के वक्तव्य आदि जनता को नित्य देखने को मिल जाते हैं। समाचार देखने और सुनने के लिए अब किसी निर्धारित अवधि का इंतजार नहीं करना पड़ता हर वक्त हर समय पूरे विश्व का घटनाक्रम रिमोट के एक बटन पर उपलब्ध रहता है। इलेक्ट्रॉनिक मीडिया ने निजी क्षेत्र के लिए भी जनसंपर्क आसान बना दिया है।


6. कम्प्यूटर एवं इन्टरनेट ( Computer and Internet):-  वैसे तो कंप्यूटर का प्रवेश भारत में नब्बे के दशक में ही होने लगा था परन्तु बीसवीं सदी के अन्त एवं इक्कीसवीं सदी के प्रारम्भ में इसका विकास इतनी तीव्र गति से हुआ कि सुविधा, संचार और व्यवस्था की एक बहुत बड़ी ताकत से हमारा देश एकाएक जुड़ गया। इंटरनेट का प्रवेश होने के बाद लोग घर बैठे सूचनाओं के समुद्र से जुड़ गये और कंप्यूटर के जरिए इतनी सारी जानकारियां घर बैठे ही उपलब्ध होने लगीं कि "गागर में सागर" की कहानी चरितार्थ हो गयी। बड़ी-बड़ी पोर्टल कंपनियां, पुस्तकालय, समाचार पत्र पत्रिकाएं, शैक्षणिक संस्थान, व्यावसायिक गतिविधियां और मनोरंजन व खेल से जुड़ी संस्थाओं द्वारा अपनी सारी सूचनाएं कम्प्यूटर में उड़ेल दी गयीं। वस्तुतः कम्प्यूटर व इंटरनेट ने आज जनसंपर्क के क्षेत्र में एक ऐसी आधुनिक क्रान्ति ला दी है जो अवर्णनीय है।






7. प्रदर्शनियां (Exhibitions ) : जन सम्पर्क स्थापित करने के लिए विभिन्न प्रकार की प्रदर्शनियों का भी सहारा लिया जाता है। सरकारी निजी संस्थाओं के कार्यकलापों से जनसाधारण को अवगत कराने के लिए समय-समय पर सार्वजनिक स्थलों और मेलों में प्रदर्शनियों का भी आयोजन किया जाता है। इन प्रदर्शनियों में सभी प्रकार की दृश्य सामग्रियां फोटो चार्ट, ग्राफ रेखाचित्र, मॉडल युक्त चित्र नक्शों आदि से विभिन्न विभागों या संस्थाओं के कार्यों आदि को दिखाया जाता है। इन प्रदर्शनियों में विभाग विशेष से सम्बन्धित महत्वपूर्ण जानकारियां दी जाती हैं, पैम्पलेट बांटे जाते हैं तथा उपलब्धियों को जनता के समक्ष रखा जाता है। निजी क्षेत्र के संगठन भी प्रदर्शनियों के जरिए अपना जनसंपर्क बढ़ाती हैं।


8. व्याख्यान अथवा भाषण (Speeches) :- व्याख्यान अथवा भाषण के द्वारा जन सम्पर्क करना एक प्राचीनतम साधन है जो आज भी अत्यंत प्रभावशाली माना जाता है। सार्वजनिक स्थलों पर जनसमूह के समक्ष मंच से अपने विचारों को जनता तक पहुंचाना तथा विरोधी दलों के दोषारोपणों का जवाब देना भी जन सम्पर्क का माध्यम है। इसमें जनसाधारण प्रत्यक्ष रूप से अपने सामने प्रधानमंत्री, अन्य मंत्री अथवा उच्च पदस्थ नेताओं के विचार जानता है। जनसमूह के समक्ष दिये जाने वाले भाषणों में विभिन्न सरकारी योजनाओं और कार्यक्रमों पर प्रकाश डाला जाता है। इस प्रकार के व्याख्यानों से सरकारी विभागों के कार्यों के बारे में जनता में प्रचलित अनेक भ्रांतियां दूर होती हैं तथा जनता तथ्यों और वास्तविकताओं से अवगत होती है।


9. विज्ञापन (Advertisement):- विज्ञापन सिर्फ निजी कंपनियों द्वारा ही नहीं अपितु सरकार द्वारा भी दिए जाते हैं जन हित के उद्देश्य में सभी सरकारें जनसम्पर्क के इस साधन का उपयोग करती हैं। जनता को उसके कर्तव्यों का स्मरण दिलाने तथा उन्हें सचेष्ट और सावधान करने की दृष्टि से भी सरकारी विज्ञापन उपयोगी होते हैं। परिवार कल्याण अल्प बचत योजना रेल संपत्ति की सुरक्षा, विद्युत बचत, टेलीफोन के दुरुपयोग को रोकना, अग्नि से सुरक्षा, बच्चों को रोग निरोधक टीका देने, गर्भ निरोधक उपाय अपनाने तथा समय पर कर जमा करने इत्यादि से सम्बन्धित अनेक विज्ञापन श्रव्य और दृश्य माध्यम के साथ-साथ प्रकाशन माध्यम से तैयार किये जाते हैं। इन्हें पत्र पत्रिकाओं, रेडियो, दूरदर्शन इत्यादि पर प्रसारित और प्रचारित किया जाता है। निजी क्षेत्र के लिए तो विज्ञापन से बढ़कर दूसरा कोई जनसंपर्क का साधन है ही नहीं।


10. परम्परागत साधन (Traditional Means): देहाती क्षेत्रों में प्रचार एवं प्रसार के लिए अनेक देशों में परंपरागत साधनों को भी इस्तेमाल किया जाता है। लोक गायक, लोक नर्तक मंडलियां, नौटंकी, कठपुतलियों का नाच, हरि कथाएं कव्वालियां आदि भारत में ऐसे पुराने परम्परागत साधन हैं जो सीधी सादी जनता को ज्यादा आकर्षित करते हैं।

प्रत्येक जिले के सूचना और जन सम्पर्क विभाग में इस तरह के कलाकारों की नियुक्तियां कर मंडलियां बनायी जाती हैं। इनके माध्यम से परिवार नियोजन, राष्ट्रीय एकता पंचवर्षीय योजनाओं, सामुदायिक योजनाओं इत्यादि के बारे में विधिवत् जानकारी दी जाती है।







11. व्यक्तिगत सम्पर्क (Personal Contact): जनसम्पर्क अथवा लोक- सम्पर्क का एक सीधा सा अर्थ है जनसाधारण के साथ संपर्क। अगर यह सम्पर्क व्यक्तिगत रूप से प्रत्यक्ष हो तो बात कुछ ज्यादा प्रभावशाली बन जाती है। इसमें यांत्रिकता या मशीनीकरण कम होता है, जबकि मानवीयता होती है। अगर जनसाधारण किसी मंत्री अथवा उच्च शासनाधिकारी से मिलता है तो यह समझता है कि वह सरकार से बात कर रहा है। मंत्री या अधिकारी का सामान्य नागरिक के प्रति कैसा रुख है, इससे शासन की छवि बनती है। बहुत सी निजी कंपनियां भी अपने क्षेत्र में लोगों से प्रत्यक्ष संपर्क के जरिए जनसंपर्क करती हैं।


12. अन्वेषण तथा जनमत सर्वेक्षण (Research and Opinion Survey) :- आधुनिक एवं विकसित देशों में अन्वेषण तथा जनमत सर्वेक्षण के द्वारा भी लोकमत को प्रभावित किया जाता है। अमेरिका और ब्रिटेन जैसे देशों में यह प्रथा काफी लोकप्रिय है। सरकार की किसी नयी नीति और कार्यक्रमों के प्रभावों को जानने के लिए शोध और मत सर्वेक्षण कराये जाते हैं। अगर इन शोधों से यह ज्ञात होता है कि बहुत बड़ी संख्या और अधिक प्रतिशत लोगों ने इस कार्य को पसंद किया है तो इसका खूब प्रचार प्रसार किया जाता है ताकि अन्य व्यक्ति भी इसके पक्ष में अपनी सहमति दे सकें। लोक सम्पर्क अधिकारियों का यह कर्तव्य है कि वह सरकार अथवा अपने संस्थान को जनता की राय के बारे में सूचित करें। जनसम्पर्क के उपर्युक्त सभी माध्यम सामान्यतः आज के अधिसंख्य देशों में लोकप्रिय हैं। परन्तु आधुनिक वैज्ञानिक आविष्कारों की वजह से पुराने और परम्परागत साधनों की उपेक्षा होने लगी है तथा विकसित राष्ट्रों में जनसम्पर्क के नये नये साधनों का विकास किया जाने लगा है। जनसंपर्क के महत्व को आज सिर्फ सरकारी विभाग ही नहीं बल्कि निजी उद्योग और निजी कंपनियां भी काफी समझने लगी हैं और प्रायः सभी सरकारी और निजी विभागों में जनसम्पर्क अधिकारी की नियुक्ति की जाने लगी है।