विज्ञापन कला के सिद्धांत - Principles of Advertising

 विज्ञापन कला के सिद्धांत - Principles of  Advertising


आज विज्ञापन जनसंचार माध्यमों का आधार स्तंभ हो गया है। विज्ञापन व्यवसाय आज एक ऐसा प्रतिष्ठित व्यवसाय बन गया है जो सृजनात्मक क्षमता और संप्रेषण कला के हुनर से चमकता है। विज्ञापन निर्माण सृजनात्मक कार्य है। आजकल श्रव्य या दृश्य माध्यम से उपभोक्ताओं अथवा लक्ष्य जनसमूह को किसी विशिष्ठ उत्पाद सेवा या योजना के प्रति आकर्षित करने की कला का कौशल विज्ञापन की दुनिया खूब दिखाई पड़ रहा है। विज्ञापन निर्माण में आज विज्ञापन एजेंसियों और विज्ञापन कंपनियों के व्यावसायिक विभागों में सृजनात्मक प्रतिभा से संपन्न लोग नियुक्त किये जाते हैं जो अपनी प्रतिभा के जरिए एक से बढ़ कर एक विज्ञापन तैयार कर रहे हैं।


विज्ञापन एजेंसियों में विज्ञापन निर्माण की जिम्मेदारी क्रिएटिव विभाग निभाता है। वह विज्ञापन का कॉन्सेप्ट और डिजाइन तैयार करता है। कॉपी राइटिंग और आर्ट इस विभाग के दो भाग होते हैं। कॉपीराइट विभाग विज्ञापन के लिए टेक्स्ट और प्रचार के लिए थीम बनाने का काम करता है, जबकि कला विभाग प्रचार को श्रव्य, दृश्य अथवा प्रिंट माध्यम से दिखाने की तैयारी करता है। वस्तुतः रचनात्मक विभाग के दोनों भाग कॉपी राइटिंग और डिजाइन मिलकर एक टीम भावना के तहत अपने काम को अंजाम देते हैं। कॉपी लेखक और कला निदेशक, दोनों साथ साथ विज्ञापन के निर्माण कार्य को आगे बढ़ाते हैं। कॉपी लेखक शब्दों का पुल बनाता है और कला निदेशक चित्रों का विज्ञापन के सृजनात्मक आयामों में लेआउट, उसके सिद्धांत और विभिन्न स्तरों और उसके सिद्धांतों का ज्ञान आवश्यक है।


लेआउट और लेआउट के सिद्धांत विज्ञापन का लेआउट बनाना विज्ञापन निर्माण का पहला चरण है। प्रायः कॉपी राइटर और कला निर्देशक विज्ञापन के लिए विचार और चिंतन की प्रक्रिया से गुजरते हैं। इस प्रक्रिया में विज्ञापन का जो प्रारंभिक रूप या खाका तैयार होता है, वही लेआउट कहलाता है। विज्ञापन का लेआउट कई तत्वों के समन्वय से तैयार होता है, जैसे- हेडलाइन दृश्य सामग्री, सब लीड, पंक्तियां, कॉपी कैप्शन, बैकग्राउंड, बाई लाइन, नारे (Slogan) अंतिम हिस्सा (Punchline), लोगो (Logo), निचली पंक्ति (Signature), कंपनी की मुहर, प्रोडक्ट, कूपन आदि। यह विज्ञापनदाता पर निर्भर करता है कि वह एक विज्ञापन में किन-किन तत्वों को शामिल करवाता है। आमतौर पर आकार, क्षेत्र, रंगों का संयोजन, बैकग्राउंड, विज्ञापन के लेआउट के मुख्य तत्व होते हैं।







लेआउट के अंतर्गत कॉपी लेखक, कला निदेशक और फोटोग्राफर मिलकर यह तय करते हैं कि विज्ञापन के तत्वों का किस प्रकार संयोजन किया जाए। लेआउट के जरिए यह जाना जा सकता है कि विज्ञापनों में किस स्थान पर चित्र होगा, कौन सा स्थान सादा होगा, कैप्शन कहां होगा, लोगो कहां होगा, हेडलाइन कहां होगी आदि-आदि। इस तरह से ले आऊट विज्ञापन का प्रारूप (ब्लूप्रिंट ) तैयार करने का कार्य करता है। प्रिंट माध्यम में दिए जानेवाले विज्ञापनों के लेआउट में चित्र तथा कॉपी महत्वपूर्ण होती है, जबकि श्रव्य-दृश्य माध्यमों के विज्ञापनों का लेआउट स्टोरी बोर्ड के रूप में होता है।


लेआउट को तैयार करते समय निम्नलिखित सिद्धांतों को ध्यान में रखा जाता है


• संतुलन


• अनुपात


• गति


• एकता


• विरोध और प्राबल्य


जीवन समाज और प्रकृति, सभी के लिए संतुलन आवश्यक है। असंतुलन से अव्यवस्था पैदा होती है। किसी भी चीज की अतिशयता असंतुलन की स्थिति पैदा कर सकती है। इसीलिए संतुलन विज्ञापन निर्माण का प्रमुख सिद्धांत है। लेआउट में ऊर्ध्वाकार रेखा खींचने पर दोनों ओर के तत्वों के भार व दूरी की व्यवस्था असमान हो तो लेआउट असमान संतुलन के अंतर्गत आता है। यह संतु सृजनात्मक रुचिकर व जिज्ञासा उत्पन्न करने वाला होता है। लेआउट में चाक्षुषीय केंद्र उसका संदर्भ केंद्र होता है। अनुमानतः लेआउट का चाक्षुषीय केंद्र गणितीय विधि से निकाले गए केंद्र के ऊपरी हिस्से के एक तिहाई ऊपर की दूरी पर होता है। यही उसका संदर्भित बिंदु होता है।


अनुपात का सिद्धांत भी विज्ञापन के लिए जरूरी है। इसे संबद्धता का नियम ( Law of Relationship) भी कहा जाता है। इस सिद्धांत के अनुसार विज्ञापन के लेआउट में विज्ञापन के सब तत्वों के बीच उचित आनुपातिक समन्वय बैठाया जाता है। विज्ञापनों में कौन सा और कितना हिस्सा किस तत्व को दिया जाएगा इसका निर्णय लिया जाता है।


गतिशीलता का तत्व संपूर्ण सृष्टि को जीवंत बनाता है। नदी की लहरों का, झरनों का जल प्रवाह अपनी गतिशीलता और प्रवाह के कारण भला किसे आकर्षित नहीं करता है। लेआउट में गतिशीलता का सिद्धांत ही उसे प्राणवान बनाता है। इसमें विज्ञापन को इस तरह प्रस्तुत किया जाता है कि पाठक और दर्शक की दृष्टि गतिशील रहे। एक तत्व से दूसरे तत्व की ओर वह बड़ी स्वाभाविकता से बढ़ता चला जाए।







विज्ञापन के लेआउट के सिद्धांत के अंतर्गत सिद्धांतों में एकता, सहयोग या सामंजस्य का सिद्धांत भी बहुत महत्वपूर्ण है। इस सिद्धांत की अवधारणा यह है कि सामंजस्य का सिद्धांत भी बहुत महत्वपूर्ण है। इस सिद्धांत की अवधारणा यह है कि विज्ञापन के समग्र तत्व लेआउट में इस तरह संगठित हों कि वे आकर्षक लगें।


विरोध और प्राबल्य का सिद्धांत लेआउट को सुंदर और आकर्षक बनाने में मदद करता है। जहां एकता के सिद्धांत से लेआउट में विज्ञापन के तत्व परस्पर संगठित रहते हैं, वहीं विरोध उसमें आकर्षण जगाता है। विरोध के सिद्धांत के आधार पर आकारों, रंगों, टाइप चित्रों और आकृतियों में अंतर प्रदर्शित करके ध्यानाकर्षण का तत्व पैदा किया जाता है। प्रायः सफेद और काले के कॉन्ट्रास्ट द्वारा, छोटा और बड़ा चित्र एक साथ देकर पतले और मोटे व्यक्ति को एक साथ दिखाकर रोचकता का समावेश किया जाता है।


प्राबल्य के सिद्धांत से हेडलाइन या लोगो कॉपी के माध्यम से संदेश रचना के मूल बिंदु को उभारा जाता है। प्राबल्य सिद्धांत से लेआउट में किसी एक तत्व को प्रमुखता से उभारा जाता है।


लेआउट की तीन स्तरों पर संपन्न होती है


• थंबनेल रेखाचित्र निर्माण


• रफ लेआउट निर्माण।


• कॉम्प्रिहेंसिव लेआउट निर्माण।


थंबनेल रेखाचित्र लेआउट का आरंभ बिंदु होता है। इन रेखाचित्रों में विज्ञापनों के विभिन्न तत्वों की स्थिति दर्शाई जाती है। लेआउट के इस प्रथम चरण में जल्दी जल्दी कई रेखाचित्र बनाए जाते हैं, जो कि प्रयोग के स्तर पर होते हैं। थंबनेल रेखाचित्र में से चुनाव करके रफ लेआउट तैयार किया जाता है। इसमें विज्ञापन का कुछ-कुछ स्वरूप उभरकर सामने आ जाता है। रफ लेआउट में चित्र होते हैं, शीर्षक का कच्चा रूप होता है। विज्ञापनों के अन्य तत्वों के लिए जगह भी निर्देशित होती है। संदेश रचना को भी रेखाचित्र के माध्यम से दिखाया जाता है। कई-कई रफ लेआउट से गुजरने के बाद रचनात्मक विभाग की टीम जिस रफ लेआउट से संतुष्ट हो जाती है उसे अंतिम रूप दिया जाता है। यही अंतिम रूप कॉम्प्रिहेंसिव लेआउट कहलाता है। इसके अंतर्गत खींची गई रेखाओं पर पाठ्य सामग्री चिपका दी जाती है। लोगो चिपका दिया जाता है। आजकल कंप्यूटर के द्वारा ही यह कार्य संपन्न किया जाने लगा है।