जनमत निर्माण के सिद्धान्त - Principles of Public Opinion
जनमत निर्माण के सिद्धान्त - Principles of Public Opinion
हम देख चुके हैं कि लोकसम्पर्क की दृष्टि से जनमत निर्माण का उद्देश्य मानव के वैयक्तिक एवं सामूहिक आचरण और व्यवहार को नियमित करके उसे किसी पूर्व निर्दिष्ट लक्ष्य की पूर्ति में संलग्न करना है। अतः जनमत निर्माण के लिए आवश्यक है कि मानव व्यवहार के प्रेरक और आधारभूत तत्वों का अध्ययन किया जाए।
मानव व्यवहार संसार का सबसे बड़ा रहस्य है। इससे बड़ी बिडम्बना क्या हो सकती है कि पिछली तीन शताब्दियों में भौतिक शक्तियों और पदार्थों के नियंत्रण और नियमन में मानव इतना विजयी हुआ है कि उसने चन्द्रमा पर भी अपने कदम रख दिए हैं। मानव की बनाई मशीनें लाखों प्रकाश वर्ष दूर स्थित सितारों की परिक्रमा करके और चन्द्रमा से चढ़ाने उखाड़ कर धरती पर अपने निर्दिष्ट स्थल पर लौट आती हैं, किन्तु मानव अभी अपने आचरण और व्यवहार पर नियमन नहीं कर सका है क्योंकि जो शक्तियां उसकी भावनाओं और वासनाओं को जगाती हैं उनके रहस्यों को मानव अब भी पूरा-पूरा जान भी नहीं सका है। उन पर नियन्त्रण करना तो दूर की बात है। रूस के सुप्रसिद्ध उपन्यासकार तुर्गनेव ने कहा भी था कि मानव मस्तिष्क किसी भी रहस्य का उद्घाटन कर सकता है, मानव ने अन्तरिक्ष की ऊंचाइयों को माप लिया है और उसने सूर्यमंडल तक अपनी जानकारी का विस्तार कर लिया है, लेकिन वह अपने आचरण को ही नहीं जान पाया है।
व्यक्तिगत रूप से मानव आचरण में सब प्रकार के गुण दोषों की पराकाष्ठा देखी जा सकती है। अच्छे से अच्छे और बुरे से बुरे व्यक्ति एक ही परिवार घर या शहर में मिल सकते हैं। सुनिश्चित रूप से यह कहना कठिन है कि एक ही जलवायु और अन्न भोजन का सेवन करने वाले दो व्यक्तियों में से एक अच्छा नागरिक और दूसरा अपराधी क्यों बन जाता है। हम जब राम का स्मरण करते तो 'रावण' का जिक्र किए बिना नहीं रह सकते। इसी तरह कृष्ण और कस, जीजस और जूडास, गांधी और गोडसे सभी दो परस्पर विरोधी शक्तियों के ऐसे प्रतीक थे जिनको एक दूसरे का सामना करना पड़ा तो इस प्रकार हम कह सकते हैं कि इतिहास में संघर्ष और अन्तद्वंद्व तो चलते ही रहते हैं।
जनसमुदाय की मनोदशा कितनी विलक्षण और चंचल होती है, इसका उदाहरण शेक्सपियर के प्रसिद्ध नाटक "जूलियस सीजर के उस प्रसंग से मिलता है जहां पहले तो रोम की जनता जूलियस सीजर के हत्यारे बूटस और उसके षड्यन्त्रकारी साथियों से सहानुभूति प्रकट करती है, किन्तु जब बूटस का विरोधी मार्क एण्टनी मंच पर आकर अप्रत्यक्ष ढंग से जूलियस सीजर की श्रद्धांजलि अर्पित करता है और उसके हत्यारों की प्रच्छन्न निन्दा करता है तो वही जन समुदाय उसी क्षण बूटस और उसके साथियों के रक्त का प्यासा बन जाता है और इतना उत्तेजित हो जाता है कि एक निरपराध व्यक्ति के टुकड़े-टुकड़े कर देता है क्योंकि उसका नाम भी षड्यन्त्रकारियों में से एक के साथ मिलता जुलता होता है।
जनमत को रेखांकित करने के लिए विद्वानों ने कई सिद्धांत प्रतिपादित किए हैं जिनमें से कुछ इस प्रकार हैं
1. यह जरूरी नहीं जो कुछ आप कहें सब सच्चाई ही सच्चाई हो। जरूरी तो यह है कि जनता को यह विश्वास हो जाए आप जो कुछ कह रहे हैं वह सच है। यह बात बिल्कुल वैसी ही है जैसे अदालत में दोनों पक्षों के वकील अपनी-अपनी बात को सच्ची कहते हैं लेकिन फैसला उसी के हक में होता है जिसकी सच्चाई पर न्यायाधीश को विश्वास हो जाए।
2. प्रोपेगण्डा में सफलता का पहला सोपान यह है कि वक्ता अपने श्रोताओं का ध्यान अपनी ओर आकर्षित करें ताकि वे उसकी बात सुनें सार्वजनिक समाओं में, जहां विरोधी भी मौजूद हों, अपना पक्ष प्रस्तुत करने में संकोच नहीं होना चाहिए क्योंकि अपनी प्रतिष्ठा को स्थापित करने के लिए ऐसे मौके बड़े उपयोगी होते हैं।
3. अगर आप समझते हैं कि अधिक संख्या में श्रोता आपके विरोधी हैं, तो समझ-बूझ से काम लें लोगों को बहला-फुसला कर उनका समर्थन प्राप्त करने की कोशिश करें जहां तक हो सके उनसे टकराद या झगड़ा मोल न लें क्योंकि आपके भाषण के दौरान अगर कोई गड़बड़ हुई तो नुकसान आपका है, आप अपनी बात नहीं कह पाएंगे।
4. प्रोपेगेंडा में भी एक युद्ध की तरह चालें चली जाती हैं। जो भी किया जाए, शत्रु या विरोधी के लिए इतना अप्रत्याशित हो कि वह हैरानी या परेशानी में निष्क्रिय हो जाए।
5. प्रोपेगण्डा चाहे लोकतंत्र का हो या अधिनायकवादी व्यवस्था का, उस का मूल मंत्र होता है जनता को अपेक्षित दिशा में प्रेरित करना प्रेरणा तभी सफल होती है जब लोग यह विश्वास कर लें कि उन्हें वही कुछ करने के लिए कहा जा रहा है जो उनके मन की पुकार है। यह भी हो सकता है कि उन्हें ठीक ठीक यह भी न पता हो कि वे क्या चाहते हैं। लेकिन जब पब्लिसिटी उनके सामने एक संदेश लेकर जाती है तो वे उसे स्वीकार कर लेते हैं क्योंकि उनका मन उसकी गवाही देने लगता है। जनता के साथ इस प्रकार का मानसिक तालमेल स्थापित करने के लिए मनोविज्ञान के व्यावसायिक अनुभव की कोई विशेष आवश्यकता नहीं। लोकसम्पर्क कर्ता यदि थोड़ी सी साधारण समझ बूझ से काम ले और ईमानदारी के साथ लोगों की भावनाओं को समझने की कोशिश करे और परिश्रम से मुंह न मोड़े तो सफलता दूर नहीं।
6. कई बार ऐसा भी होता है कि विश्वविद्यालयों में छात्र और छात्राएं उत्तेजना में आकर खिड़कियों के शीशे तोड़ डालते हैं या कोई और उपद्रव करते हैं। किसी को पता ही नहीं चलता कि ऐसा क्यों हुआ, या कोई शिकायत भी होती है तो बिल्कुल मामूली सी जिस पर इतनी गड़बड़ का कोई औचित्य नहीं हो सकता। ऐसी स्थिति को निपटाने का एक तरीका तो यह है कि बल प्रयोग से छात्रों के इस दंगे फसाद को दबा दिया जाए। लेकिन ऐसा वही करते हैं जिनका दृष्टिकोण संकुचित होता है या जो पुलिस की तकनीकों के अतिरिक्त और कुछ नहीं जानते। "लोक सम्पर्क में विश्वास रखने वाला कोई भी व्यक्ति इस स्थिति को अपने ही तरीके से निपटायेगा वह यह सोचेगा कि ये पढ़े लिखे युवाजन हंगामा करने और अपने अभिभावकों की कमाई बर्बाद करने के लिए तो विश्वविद्यालय में नहीं आते वह इस निष्कर्ष पर पहुंयेगा कि यह दंगा फसाद तो एक बीमारी की निशानी है, जो बहुत गहरी है। अगर बीमारी का इलाज हो जाए तो यह निशानी यानी उपद्रव स्वतः ही बंद हो जाएगा।
प्रोपेगण्डा में दो अन्य मनोवैज्ञानिक सिद्धान्तों का लाभ उठाया जाता है। एक है संयुक्तिकरण का जिसे अंग्रेजी में rationalization कहते हैं। इसका मतलब है कि हम बहुत से फैसले तो अपने मन में छिपे हुए झुकावों के कारण पहले कर लेते हैं और फिर प्रकट करते समय या उनको कार्य रूप देते हुए उनके समर्थन में युक्तियां तलाश कर लेते हैं शादी ब्याह से लेकर चुनावों में मत देने तक फैसले अक्सर हम अपने मन की गहराइयों से निकली प्रेरणाओं से प्रभावित होकर पहले कर लेते हैं, इसके बाद अपने फैसलों को सिद्धान्तों, आदशों और नैतिक मूल्यों या सांस्कृतिक अभिरूचियों के आधार पर युक्तियुक्त सिद्ध करते हैं। प्रोपेगण्डा में सफलता उसी को मिलती है जो जनता के अवचेतन मन की छिपी प्रेरणाओं का लाभ उठा सके।
इसी सन्दर्भ में दूसरा सिद्धान्त है पसंद या नापसंद के मूल रूपों का कम्युनिस्ट विचारों के लोगों में "बुर्जुआ" कल्चर को बुरा समझा जाता है। इसलिए अगर कोई कम्युनिस्ट अपने किसी विरोधी को "बुआ" या पूंजीवादियों का एजेंट कह दे तो उस व्यक्ति के प्रति कम्युनिस्ट लोगों के मन में गलत छवि बन जायेगी। इसका कारण यह है कि सभी लोगों ने अपने मन में अच्छाई या बुराई की धारणाएं स्थिर कर ली है। हमारे मन में जो मूल रूप से स्थिर हो जाए, उनको हम आसानी से छोड़ नहीं सकते, और हमारे लिये यह बहुत मुश्किल है कि प्रत्येक फैसला करने से पहले हम मामले की गहराई में जाएं जो कुछ हमारी पसंद की कल्पना में ठीक उतरेगा हम तुरंत उसे अपना लेंगे या इसके विपरीत उसे नकार देंगे। इसलिए किसी के विरोध या समर्थन का प्रोपेगण्डा खुले तौर पर या तो बढ़ा चढ़ा कर तारीफ करने से होता है या कड़वे कटाक्षों से, क्योंकि साधारण जनता अपनी पसंद या नापसंद के मुताबिक इधर या उधर की अपनी राय बना लेती है तर्क की गहराईयों में जाने के लिए न तो जनसाधारण में सामर्थ्य होती है और न ही कोई सुविधाएं।
हम अपने विचारों या अपनी राय की उन मूल्यों के आधार पर रचना करते है, जो धर्म या संस्कृति ने हमें दिए हों। धर्म या राजनीति या अन्य किसी प्रतिबद्धता को लेकर ही उन मानदंडों का सृजन होता है जो हमें किसी स्थिति को स्वीकारने या नकारने के लिए मजबूर करते हैं। धर्म हमें "सात्विकता" और "तामसिकता" में भेद करना सिखाता है। पाप और पुण्य के मानदण्डों का प्रयोग करके भी विवाद और टकराव की स्थिति में यह निश्चय किया जाता है कि दो परस्पर विरोधी पक्षों में हम किसका समर्थन करें या किसका विरोध ऐसे मामले में हर कोई विवादग्रस्त प्रश्नों की तह में नहीं जाता। केवल एक संकेत की जरूरत होती है कि उस का धर्म या उसके सिद्धान्त उससे किस किस्म के आचरण की अपेक्षा करते हैं। जनसाधारण या तो "पाप" समझता है या "पुण्य" दोनों के बीच क्या है, यह वह नहीं जानता। इसलिए जनता से जो अपील की जाती वह सोधी और स्पष्ट होनी चाहिए। दुलमुल नीतियां जो न इधर की हो और न उधर की जनता को अपनी ओर आकर्षित नहीं कर सकतीं।
उपरोक्त सिद्धांतों का अध्ययन करने से यह स्पष्ट है कि जनता से जनमत हासिल करने के लिए जनता से लोकसम्पर्क बड़ी स्पष्टता से किया जाना चाहिए। लोकसम्पर्क उद्देश्यपरक होना चाहिए, सहनशीलता और सरलता से किया जाना चाहिए।
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