धार्मिक पत्रकारिता - Religious Journalism

धार्मिक पत्रकारिता - Religious Journalism

धर्म भारतीय जीवन दर्शन से गहराई से जुड़ा है। भारत की भूमि भी हमेशा से धार्मिक विद्वानों, संतों, ज्ञानियों और सुधारकों की भूमि रही हैं। हिन्दू, सिख, जैन, बौद्ध आदि धर्मों का जन्म और विकास इसी धरती पर हुआ। भारत के जनजातीय समाजों की भी अपनी-अपनी धार्मिक मान्यताएं और परम्पराएं हैं। उत्तर से दक्षिण तक और पूर्व से पश्चिम तक हर काल में संतों और विचारकों ने भारतीय जीवन को गति और पवित्रता प्रदान की है। धर्म के प्रति भारतीय जनमानस में गहरी आस्था है। ऐसे में धार्मिक पत्रकारिता के लिए भी भारत भूमि में हर ओर सम्भावनाएं ही सम्भावनाएं हैं। कहीं लिखित न होते हुए कबीर जैसे संतों की वाणी आज भी जन-जन की वाणी बनी है तो इसके पीछे भी यही कारण है। हिन्दी के पहले पत्र 'उदन्त मार्तण्ड' में भी धर्म सम्बन्धी लेख प्रकाशित होते थे और आज भी सभी प्रमुख समाचार पत्रों में धर्म सम्बन्धी रचनाओं और जानकारी को प्रमुखता दी जाती है। बंगाल की दुर्गा पूजा हो या महाराष्ट्र का गणेश उत्सव स्थानीय पत्रकारिता के लिए वह अत्यन्त महत्वपूर्ण विषय होता है। कुम्भ का अवसर हो या रमजान का महीना, स्थानीय पत्रों में उसके कवरेज के लिए स्थान नियत होता है। 

स्वतंत्रता से पूर्व भी देश में अनेक धार्मिक पत्र पत्रिकाएं प्रकाशित होती थीं जिनमें काशी से धर्म प्रचारक', 'गौ सेवक', 'सनातन धर्म, मुम्बई से 'वैकटेश्वर समाचार और दिल्ली से 'गोपाल' आदि प्रमुख थीं। 1882 में काशी से प्रकाशित 'वैष्णव' पत्रिका को भारत में धार्मिक पत्रकारिता की शुरूआत माना जा सकता है। 1926 में काशी से कल्याण का प्रकाशन भारत में धार्मिक पत्रकारिता के क्षेत्र में एक बड़ी घटना थी। 50 से 70 के दशक में तो 'कल्याण उत्तर भारत के हर घर में अनिवार्य रूप से देखा जा सकता था। इसकी प्रकाशन संस्था गीता प्रेस गोरखपुर आज भी धर्म से जुड़े ग्रंथ और पुस्तकें प्रकाशित कर रही है और देश की सबसे बड़ी प्रकाशन संस्थाओं में एक है। अखण्ड ज्योति भी धार्मिक पत्रकारिता के लोकप्रिय उदाहरणों में एक है।


मौजूदा उदारीकरण के दौर में भारतीय जनजीवन पर बाजारवाद का जो प्रभाव पड़ा है उसके चलते तनाव, अवसाद और बीमारियों में भी इजाफा हुआ है। जिससे साधु-संतों, भजन गायकों और प्रवचन करने वालों की ओर लोगों का रुझान भी बढ़ गया है। ऐसे गुरु और संत भी आज धार्मिक पत्रकारिता का सहारा लेकर अपनी साख और बाजार साथ-साथ बढ़ा रहे हैं। आज अखबारों मे धार्मिक समाचारों और जानकारियों का स्थान बढ़ गया है तो टेलीविजन में आस्था, संस्कार, प्रज्ञा, क्यू टीवी, जी जागरण आदि धार्मिक चैनलों की संख्या न्यूज चैनलों से होड़ लेने लगी हैं।


स्वामी रामदेव का उदाहरण बताता है कि मीडिया का इस्तेमाल किस तरह जन उपयोगी हो सकता है। आज देश भर में योग प्राणायाम और भारतीयता का जैसा प्रचार स्वामी रामदेव ने मीडिया के जरिए कर दिखाया है वह अपने आप में एक रिकार्ड है। ऐसे में निसन्देह यह कहा जा सकता है कि धार्मिक पत्रकारिता का भविष्य काफी उज्जवल है और विशेषज्ञ पत्रकारिता के इस क्षेत्र में उत्तराखण्ड में अपार सम्भावनाएं मौजूद हैं।