शोध समस्या का निरूपण एवं चयन - Research Problem Formulation and Selection
शोध समस्या का निरूपण एवं चयन - Research Problem Formulation and Selection
सामाजिक क्षेत्र में बिना हल की हुई अनगिनत समस्याएँ हैं तथापि शोध व सर्वेक्षण का चुनाव अत्यंत दुष्कर कार्य है। अनेक बार शोध कार्य करते समय नक्शोधकर्ताओं को समस्या के उपयुक्त समस्या चयन तथा प्रतिपादन में कठिनाई अनुभव होती है। कई बार उन्हें ऐसा अनुभव होता है कि वे जिस क्षेत्र में कार्य करने जा रहे हैं उसका अन्वेषण पहले ही किया जा चुका है। नव-शोधकर्ता के साथ इस प्रकार की घटना घटित होनी स्वाभाविक है क्योंकि नव-शोधकर्ता प्रायः शोध समस्याओं के प्रति अपेक्षाकृत अत्यधिक जागरूक नहीं होते हैं। जब तक उनमें वास्तविक शोध मनोवृत्ति का विकास नहीं होता, तब तक उन्हें समस्या के चयन में कठिनाई का सामना करना पड़ेगा। समस्याओं के प्रति जागरूकता वैज्ञानिक दृष्टिकोण का परिचायक है।
समस्या क्या है?
शोध समस्या किसी ऐसी कठिनाई की ओर संकेत करती है जिसकी अनुभूति शोधकर्ता को उसके शोध के दौरान सैद्धान्तिक अथवा व्यावहारिक परिस्थिति के संदर्भ में होती है और वह उसके समाधान प्राप्ति की ओर उन्मुख रहता है।
जान सी. टाउनसेंड- "समस्या समाधान हेतु प्रस्तावित एक प्रश्न है।" करलिंगर- "शोध समस्या एक प्रश्नवाचक वाक्य/कथन है जो यह पूछता है कि दो अथवा उससे अधिक चरों के मध्य कैसा संबंध विद्यमान है?
"आर.एल.एकॉफ ने किसी शोध समस्या के निरूपण हेतु निम्न पाँच तत्वों की उपस्थिति को महत्वपूर्ण माना है -
1) शोध उपभोक्ता तथा अन्य सहभागी -
प्रत्येक समस्या किसी न किसी व्यक्ति अथवा समूह से संबंधित होती है। सहभागी की श्रेणी में उन लोगों को सम्मिलित किया जाता है जो प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष रूप से शोध से प्रभावित हो अथवा वे व्यक्ति जो शोधकर्ता के रूप में शोधकार्य का संचालन करेंगे।
2) उद्देश्य-
शोध उपभोक्ता के कुछ उद्देश्य होते हैं जिसकी पूर्ति हेतु वह शोधकार्य करता है। उद्देश्यों के आधार पर समस्या को विशुद्ध, व्यावहारिक अथवा क्रिया शोध के रूप में समस्या को परिलक्षित किया जाता है। स्पष्ट उद्देश्यों की स्थापना से प्राथमिकताओं को स्थापित करने तथा समस्या के समाधान को तलाशने में मदद मिलती है।
3) उद्देश्य प्राप्ति हेतु विकल्प-
शोधकर्ता के पास उद्देश्यों को प्राप्त करने के लिए कुछ विकल्प अवश्य होने चाहिए। किसी भी समस्या के समाधान के लिए एक से अधिक साधनों को प्रयोग में लाया जा सकता है।
4) उपभोक्ता में विकल्पों की उपयुक्तता के प्रति संदेश -
शोधकर्ता के मन में विकल्पों की उपयोगिता के संबंध में संशय का होना अत्यंत आवश्यक है अन्यथा समस्या का उद्भव ही नहीं होगा।
5) समस्या से संबंधित पर्यावरण -
प्रत्येक समस्या से संबंधित एक विशिष्ट वातावरण होता है। यहाँ वातावरण से अभिप्राय उस परिस्थिति से है जिसके अंतर्गत समस्या का अध्ययन किया जाएगा।
करलिंगर ने समस्याओं के लिए मूल रूप से तीन मापदण्डों को आवश्यक माना है -
समस्या के मापदंड
किसी समस्या को दो अथवा दो से अधिक चरों मध्य के संबंध को प्रदर्शित करना चाहिए। समस्या स्पष्ट प्रश्नात्मक कथन में होनी चाहिए। समस्या के प्रश्नात्मक कथन का आनुभविक विधियों द्वारा परीक्षण होना चाहिए। उक्त मापदण्डों के अतिरिक्त कुछ और भी मापदंड हैं जिन्हें नजरंदाज नहीं किया जा सकता है।
1) किसी शोध समस्या के प्रश्नों को नैतिक या नीतिपरक मूल्यों या निर्णयों से संबंधित नहीं होना चाहिए। प्रश्नों को दार्शनिक तथा तत्वमीमांसक नहीं होना चाहिए। इस प्रकार के प्रश्नों का आनुभविक अध्ययन कर पाना कठिन कार्य होता है।
2) वास्तविक शोध समस्या का जन्म मूल समस्या से होना चाहिए।
3) शोध समस्या को न तो अधिक सामान्य होना चाहिए जिससे कि उसके शोध की आवश्यकता अथवा प्रासंगिकता ही न हो और न तो अधिक विशिष्ट होना चाहिए ताकि वह शोध की दृष्टि से बेकार और निरर्थक साबित हो जाए।
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