क्रान्तिकारी आन्दोलन एवं पत्रकारिता - Revolutionary Movement and Journalism

क्रान्तिकारी आन्दोलन एवं पत्रकारिता - Revolutionary Movement and Journalism


स्वतन्त्रता संग्राम के आरम्भिक वर्षों में महामना मदनमोहन मालवीय ने 'दैनिक हिन्दोस्थान का सम्पादन किया और अभ्युदय' नामक साप्ताहिक तथा दैनिक पत्र भी प्रकाशित किया जिनकी प्रेरणा से अनेक पत्रों ने जन्म लिया और स्वतन्त्रता की महत्वपूर्ण लड़ाई में अपनी अहम् भूमिका निभाई। 'नवजीवन', 'हरिजन', 'हरिजन सेवक', यंग इण्डिया' और 'हरिजन बन्धु' जैसे पत्र भी इसी बीच प्रकाश में आए।


जहां तक क्रान्तिकारी आन्दोलन का सम्बन्ध है, भारत का क्रान्तिकारी आन्दोलन बन्दूक और बम के साथ नहीं समाचारपत्रों से शुरू हुआ। जिनमें तीन नाम अत्यन्त गौरवशाली हैं। सर्वप्रथम 'युगांतर, जिसका प्रकाशन और सम्पादन अरविन्द घोष के छोटे भाई वारीन्द्र कुमार घोष ने किया और भूपेन्द्र नाथ दत्त तथा अविनाश भट्टाचार्य की सहायता से इसे प्रकाशित किया। बाद में जब ये समाचार पत्र बन्द हो गया तो उसी के कार्यकर्ताओं ने एक क्रांतिकारी दल संगठित किया, जो 'युगांतर गुट के नाम से प्रसिद्ध हुआ। मानिकतल्ला स्ट्रीट पर स्थित युगांतर कार्यालय की तलाशी के समय सरकार अरविन्द घोष को एक लेख के लिए उत्तरदायी समझकर पकड़ना चाहती थी परन्तु उस समय सभी कार्यकर्ताओं ने अपने आपको पत्र का सम्पादक घोषित किया, जिसके बाद सरकार को दमनकारी कानून बनाने पड़े और इस पत्र को बन्द करना पड़ा। 1908 में इस पत्र की प्रसार संख्या 18000 के लगभग थी। जब समाचार पत्रों द्वारा अपराध भड़काने सम्बन्धी कानून के अन्तर्गत इसे बन्द कर दिया गया तो चीफ जस्टिस सर लारेंस जैकिनसन ने इस पत्र के बारे में लिखा था- "इनकी हरेक पंक्ति से अंग्रेजों के प्रति विद्वेष टपकता है। हरेक शब्द से क्रांति होती हैं।" रौलेट रिपोर्ट, जो दस साल बाद लिखी गयी थी, में भी युगांतर के बहुत से उद्धरण दिए गए, जिससे यह सिद्ध किया जा सके कि किस तरह इस पत्र ने अंग्रेजों के विरुद्ध विद्वेष भड़काया और लोगों को क्रांन्ति के लिए उकसाया। उसमें एक जगह यह मान लिया गया कि इस अखबार की पन्द्रह हजार प्रतियां छपती हैं और साठ हजार लोग उसे पढ़ते हैं।


इसी युगांतर के नाम पर जब अमरीका में गदर पार्टी की स्थापना हुई तो लाला हरदयाल ने पार्टी के कार्यालय तथा गदर पत्र के प्रकाशन स्थल का नाम युगांतर आश्रम रखा। स्वयं 'गदर' अखबार अपने आप में क्रांति का बड़ा दूत था । यह एक वर्ष की अवधि में ही हिन्दी, उर्दू, पंजाबी, गुजराती, मराठी, बांग्ला और अंग्रेजी भाषाओं में प्रकाशित किया जाने लगा और कुल मिलाकर इसकी लाखों प्रतियां छपती थीं और भारत से बाहर रहने वाले सभी भारतीयों को इसकी प्रतियां भेजी जाती थीं।


'युगांतर' के पश्चात् भारत में 'वन्देमातरम' पत्र ने राष्ट्रीय आंदोलन में बड़ी भूमिका निभायी। इसकी स्थापना श्री सुबोध चन्द्र मलिक, देशबन्दु चित्तरंजन दास और बिपिनचन्द्र पाल ने 6 अगस्त, 1906 को अरविन्द घोष के सम्पादकत्व में की थी। अरविन्द घोष पर मुकदमा चला और उनके साथ ही साथ 'संध्या के सम्पादक ब्राह्मबांधव उपाध्याय और 'युगांतर के सम्पादक भूपेन्द्रनाथ दत्त पर भी अरविन्द घोष को सजा नहीं हो सकी परन्तु ब्राह्मबांधव उपाध्याय व 'वन्देमातरम् के प्रेस मैनेजर को जेल भेज दिया गया। बाद में उन्होनें अंग्रेजी में 'कर्मयोगी' और बंगला में 'धर्म' नामक पत्र निकाला। यह वह दौर था जब ब्राम्हा पाल लाल नाम की तिकड़ी भारतीय चेतना को झकझोरने में लगी हुई थीं। बाल यानी बाल गंगाधर तिलक, पाल यानी विपिन चन्द्र पाल और लाल यानी लाला लाजपत राय ये तीनों ही अपने-अपने संग्रागी तेवरों के साथ पत्रकारिता की मशाल को भी थामे हुये थे।


जहां तक हिन्दी पत्रों का सम्बन्ध है प्रारम्भ में जो पत्र कलकत्ता में निकले, उन्हें सरकारी सहायता की अपेक्षा रहती थी, परन्तु इस दृष्टि से सबसे महत्त्वपूर्ण भूमिका भारतेन्दु हरिश्चन्द्र की थीं, जिन्होनें 1867 में 'कविवचन सुधा' नामक एक कविता की पत्रिका निकाली परन्तु बाद में उसमें गद्य भी सम्मिलित होता रहा। पहले वह मासिक थी, 1875 में साप्ताहिक हो गई और अगले दस वर्ष तक हिन्दी तथा अंग्रेजी में निकलती रही। उस पत्र की क्या नीति थी, उसका दिग्दर्शन उसके मुख पृष्ठ पर छपने वाले उस सिद्धान्त वाक्य से मिलता है जो इस प्रकार था: 


"खल-गननसों सज्जन दुखी मति होहिं, हरिपद मति रहै। 

अपधर्म छूटै, स्तत्व निज भारत गहै, करदुख बहै।

बुध तजहिं मत्सर, नारिनरसन होहिं, जग आनन्द लहै। 

तजि ग्रामकविता, सुकविजनकी अमृतबानी सब कहै।"


इस पत्र में इस प्रकार स्वत्व निज भारत गहै, करदुख बहै, नारिनरसम होहिं जैस विचार प्रकट किए गये थे, जो उस समय के लिए क्रान्तिकारी थे। जब ब्रिटेन के राजकुमार भारत आए तो उनके स्वागत में इस पत्रिका में एक कविता छपी, जिसके बारे में अंग्रेज अधिकारियों को समझाया गया कि इसमें श्लेष है और जिस शब्द 'पाद्यार्थ्य' का प्रयोग किया गया है, उसका अर्थ जूतों से पीटना भी सकता हैं। इससे पहले मर्सिया नामक एक लेख के कारण उस पत्र की सरकारी सहायता बन्द कर दी गई और उनके दो अन्य पत्रों 'हरिश्चन्द्र पत्रिका' और 'बाल बोधिनी' जिनकी 100-100 प्रतियां सरकार खरीदती थी उनकी भी खरीददारी सरकार ने बन्द कर दी हरिश्चन्द्र ने इसके बाद आनरेरी मजिस्ट्रेट के पद से इस्तीफा दे दिया। लेकिन यह पत्र फिर भी बहुत लोकप्रिय हो गया।







इस पत्र से भी अधिक महत्वपूर्ण यह हुआ कि भारतेन्दु हरिश्चन्द्र के जो अन्य मित्र थे जैसे कानपुर में प्रतापनारायण मिश्र तथा इलाहाबाद में पण्डित बालकृष्ण भट्ट, उन्होंने दो बड़े राजनैतिक पत्र निकाले जिनका बहुत असरदार प्रभाव हुआ। इलाहाबाद से बालकृष्ण भट्ट का हिन्दी प्रदीप निकला जो 1910 में 'प्रेस एक्ट' के अन्तर्गत बन्द कर दिया गया। 'ब्राह्मण' पत्र ने कानपुर में राष्ट्रीय पत्रों की परम्परा का जन्म दिया। लाहौर से मुकुन्दराम के सम्पादन में ज्ञान प्रदायिनी पत्रिका निकली। सन् 1885 में कालाकांकर से राजा रामपाल सिंह ने 'हिन्दोस्थान' पत्र निकाला, जिसके प्रथम सम्पादक मदनमोहन मालवीय थे। वे बालकृष्ण भट्ट की परम्परा के थे और उन्होंने न केवल हिन्दोस्थान के द्वारा बल्कि बाद में अन्य पत्रों के द्वारा राष्ट्रीय आन्दोलन को प्रोत्साहित किया। इसी पत्र में बालमुकुन्द गुप्त और अमृतलाल चक्रवर्ती जैसे यशस्वी संपादकों ने काम किया जिन्होंने दैनिक पत्रों के क्षेत्र में विशेषतया राजनैतिक पत्रकारिता के क्षेत्र में बहुत अधिक नाम कमाया।


कलकत्ता का एक प्रसिद्ध हिन्दी समाचारपत्र 'भारत मित्र था, जो 17 मई 1878 को पाक्षिक पत्र के रूप में निकला। बाद में यह दैनिक हो गया और इस पत्र ने राष्ट्रीय आंदोलन में बहुत बड़ा योगदान दिया। इस पत्र के प्रकाशक दुर्गाप्रसाद मिश्र और छोटूलाल मिश्र कश्मीरी थे। पचास वर्ष तक इस पत्र ने राष्ट्रीयता का प्रचार किया। कश्मीर को हड़पने की ब्रिटिश सरकार की योजना का इसने भंडाफोड़ किया और इसके सम्पादक बालमुकुन्द गुप्त ने लार्ड कर्जन के अत्याचारों पर 'शिवशम्भु' के चिट्ठे' नाम से जो टिप्पणियां की उससे देश में बहुत जन-जागृति फैली। इसी के सम्पादक दुर्गाप्रसाद मिश्र ने 'उचित वक्ता' नामक पत्र भी निकाला। इस पत्र में भारतेन्दु हरिश्चन्द्र जी भी लिखते थे।


कलकत्ता में हिन्दी के अनेक पत्र प्रकाशित हुए जिन्होनें राष्ट्रीय आन्दोलन के समय अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। 'स्वतन्त्र' नामक पत्र भी अम्बिका प्रसाद बाजपेयी द्वारा प्रारम्भ किया गया। हास्य का पत्र 'मतवाला था। बनारसीदास चतुर्वेदी के सम्पादकत्व में विशाल भारत निकला, जिसने ने केवल विदेशों में रहने वाले भारतीयों की दुर्गति की ओर ध्यान दिलाया बल्कि संसार की प्रगतिशील विचारधारा से हिन्दी जगत को परिचित कराया।


पंडित सुन्दरलाल ने इलाहाबाद से 'कर्मयोगी साप्ताहिक निकाला जो उग्र विचारधारा का पत्र था। इसमें अरविन्द घोष के 'कर्मयोगी' तथा लोकमान्य तिलक के 'केसरी' में प्रकाशित लेख भी छपते थे बहुत शीघ्र ही इसकी प्रसार संख्या 10000 प्रतियां हो गयीं और इससे तंग आकर तत्कालीन गोरी सरकार ने 1908 और 1910 के दमनकारी कानूनों के अन्तर्गत इसे बन्द करा दिया। सुन्दरलाल जी की प्रेरणा और सहयोग से शिवनारायण भटनागर ने उर्दू का 'स्वराज्य' पत्र निकाला जिसके नौ सम्पादकों को राजद्रोह के अन्तर्गत सजा हुई और एक के बाद एक जेल भेजे गये कई लोगों को काले पानी की सजा हुई। बाद में 1910 के प्रेस कानूनों के अन्तर्गत यह भी बन्द हो गया। सुन्दरलाल ने साप्ताहिक 'भविष्य' नामक पत्र भी निकाला। इसके द्वारा उन्होंने राजनैतिक विचारधारा के प्रसार में बड़ा योगदान दिया।


स्वाधीनता प्रेमी हिन्दी पत्रकारों में गणेश शंकर विद्यार्थी का नाम प्रमुख रूप से जाना जाता है। वे बालकृष्ण भट्ट के शिष्य थे। सन् 1913 में उन्होंने कानपुर से साप्ताहिक प्रताप का प्रकाशन किया, जो स्वाधीनता आन्दोलन का एक प्रमुख प्रचारक बन गया। अपने अग्रलेखों और समाचारों के कारण उनको कई बार सजा भी हुई। हिन्दू मुस्लिम एकता के प्रयास में वे 1931 में शहीद हो गए।


सन् 1920 में शिवप्रसाद गुप्त ने बाबूराव विष्णु पराड़कर के सम्पादकत्व में 'आज' निकाला। 'आज' नामक पत्र उत्तर प्रदेश में राष्ट्रीय समाचारों और विचारों का प्रबल समर्थक रहा। यद्यपि पराड़कर उग्रवादी थे और क्रान्तिकारी दल के सदस्य होने के नाते कलकत्ता की रोड़ा कम्पनी में कारतूसों की डकैती के मामले में जेल काट चुके थे, परन्तु उन्होंने कांग्रेस विचारधारा के प्रसार में बड़ा योगदान दिया। इसी प्रकार आगरा से पंडित कृष्णदत्त पालीवाल का 'सैनिक पश्चिमी उत्तर प्रदेश का प्रबल राष्ट्रीय पत्र हो गया। इन पत्रों- 'प्रताप', 'आज', 'अभ्युदय' या 'सैनिक' प्रत्येक स्वाधीनता आन्दोलन में बन्द होना पड़ता था और इसके सम्पादक और प्रकाशन जेल भेज दिये जाते थे।


दिल्ली में प्रसिद्ध कांग्रेसी नेता स्वामी श्रद्धानन्द ने हिन्दी में 'वीर अर्जुन' और उर्दू में 'तेज' का प्रकाशन शुरू किया। ये दोनों पत्र राष्ट्रीय आन्दोलन के प्रबल पक्षधर रहे और स्वामी श्रद्धानन्द के बलिदान के बाद पंडित इन्द्र विद्या वाचस्पति और देशबन्धु गुप्त इन्हें चलाते रहे। ये लोग भी प्रमुख कांग्रेसी नेता रहे। लाहौर में महाशय खुशहाल चन्द्र खुरसंद ने 'मिलाप और महाशय कृष्ण ने उर्दू का प्रकाशन किया। ये पत्र भी राष्ट्रीय आन्दोलन के प्रचारक रहे। पंजाब में राष्ट्रीय पत्रों की परम्परा काफी पुरानी रही हैं। सन् 1881 में सरदार दयाल सिंह मजीठिया ने सुरेन्द्रलाल बनर्जी के परामर्श से शीतलकांत चटर्जी के सम्पादकत्व में अंग्रेजी पत्र 'ट्रिब्यून' का प्रकाशन प्रारम्भ किया। कुछ दिनों तक बिपिन चन्द्रपाल ने भी इस पत्र में सम्पादन किया और बाद में 1917 से श्री कालीनाथ राय, जो पहले 'बंगाली' पत्र में काम कर रहे थे और जो 1911 में लाला लाजपतराय के 'पंजाबी' पत्र के सम्पादक हुए थे, इसके सम्पादक हो गये और दिसम्बर 1945 तक इसके सम्पादक रहे। पंजाब के राष्ट्रवादी पत्रकारों में एक अत्यन्त गौरवशाली नाम सूफी अम्बा प्रसाद का है, जिन्होंने पंजाब से हिन्दुस्थान', 'देशभक्त' और 'पेशवा' जैसे समाचार पत्रों में काम किया था। सन् 1890 में उन्होंने अपने जन्म स्थान मुरादाबाद से एक उर्दू साप्ताहिक 'जाम्युल इलूम' नाम का पत्र निकाला और 1897 मे उन्हें एक लेख के कारण डेढ़ साल के लिए जेल भेज दिया गया था। 1901 में वे जेल से छूटे और उन्होंने फिर उसी प्रकार के विचार लिखने जारी रखे, जिसके लिए उन्हें 6 वर्ष की जेल हुई और उनकी सारी सम्पत्ति जब्त कर ली गयी। 1906 में जब वे जेल से छूटे तो फिर लाहौर के 'हिन्दुस्थान पत्र में काम करने लगे। सरदार अजीत सिंह ने जब भारत माता सोसाइटी स्थापित की तो सूफी अम्बा प्रसाद उनके साथ हो गए। बाद में जब सरदार अजीत सिंह को देश निकाला हो गया, तो वे भी नेपाल भाग गये, लेकिन अंग्रेज सरकार ने उन्हें पकड़वा दिया। वे जब तक भारत में रहे, लाला हरदयाल के साथ पुस्तकें लिखने और पत्रों में लेख लिखने का काम करते रहे। बाद में वे ईरान चले गये, वहां जब प्रथम युद्ध के समय ब्रिटिश सेना का ईराक पर कब्जा हो गया तो उन्हें गोलियों से उड़ा दिया गया।