संस्कृत में वर्ण विचार - स्वर वर्ण और व्यंजन वर्ण
संस्कृत में वर्ण विचार - स्वर वर्ण और व्यंजन वर्ण
लिपि शिक्षण (वर्ण विचार)
संस्कृत भाषा को लिखने के लिए देवनागरी लिपि का प्रयोग किया जाता है। अतः संस्कृत सीखने से पहले हमें देवनागरी लिपि के वर्णमाला का ज्ञान होना आवश्यक हो जाता है। यहाँ मैं आपको सबसे पहले वर्णमाला से परिचय करा रहा हूँ।
देवनागरी में दो प्रकार के वर्ण होते हैं।
1. स्वर वर्ण 2. व्यंजन वर्ण
स्वर वर्ण
अ इ उ ऋ ऌ ए ऐ ओ औ
ध्यातव्य- ए ऐ ओ औ को संयुक्त स्वर भी कहा जाता है, क्योंकि ये वर्ण दो स्वर के मेल से बनते हैं। संस्कृत में अ इ उ ऋ वर्णों का ह्रस्व, दीर्घ और प्लुत ये तीन भेद होते हैं। अतः व्याकरण में अ (अवर्ण) का अर्थ आ भी होता है। इसी प्रकार इ उ ऋ को भी समझना चाहिए।
व्यंजन वर्ण
क ख ग घ ङ च छ ज झ ञ ट ठ ड ढ ण त थ द ध न प फ ब भमयरल वशष स ह ये व्यंजन वर्ण हैं। पाणिनि ने 14 माहेश्वर सूत्रों में इन वर्णों को कहा है। वहाँ पर वर्णों के क्रम में थोड़ा सा परिवर्तन है। संस्कृत सीखने के इच्छुक लोगों को चाहिए कि वे माहेश्वर सूत्र को याद कर लें, ताकि संस्कृत व्याकरण सीखना आसान हो सके।
व्यंजन में स्वर वर्ण को जब मिलाया जाता है तब वह उच्चारण करने योग्य होता है। अनुस्वार तथा विसर्ग को अयोगवाह कहा जाता है। इसका प्रयोग (लिखने तथा बोलने में ) केवल स्वर वर्णों के साथ ही होता है। दो व्यंजन वर्णों को आपस में मिलने पर एक संयुक्त व्यंजन का निर्माण होता है।
व्यंजन वर्णों के संयोग के कारण इसके लिखावट (आकृति) में परिवर्तन
1. कहीं-कहीं दो व्यंजनों के मेल को पहचानना आसान होता है। जैसे स् + व् + अ = स्व । कभी कभी व्यंजनों के मेल से बने अक्षर में इतना परिवर्तन हो जाता कि पहचानना कठिन हो जाता है। जैसे- क् + ष् अक्ष त्र् अत्र ज् + ञ + अ = ज्ञ इत्यादि। जहाँ दो व्यंजन वर्णों के मेल से उसकी आकृति में बहुत अधिक अंतर आ जाता है, ऐसे शु+ र् + अ = श्र। घ्+ न्+ अ = घ्न जैसे वर्ण को पहचानना चाहिए ।
2. इस लिपि मे र एक ऐसा वर्ण है, जो किसी अन्य व्यंजन के साथ मिलने पर तीन तरह से परिवर्तित हो जाता है। कभी यह वर्ण के ऊपर, कभी मध्य में कभी नीचे जुड़ता है। जैसे- वर्ण में ऊपर वाला र् को देखें- व + र् + ण = वर्ण, क्रम में मध्य वाला र् को देखें व + र्ण क्रम, वर्ण में ऊपर वाला र् को देखें + र् + ण वर्ण, घ्राण में नीचे वाला र् को देखें घ्+र् व ण + आ + ण घ्राण ।
3. संस्कृत भाषा में कहीं कहीं तीन या इससे अधिक व्यंजन वर्ण भी आपस में जुड़ते हैं। जैसे- ओष्ठ्य व्यंजन वर्णों के आकृति परिवर्तन को समझने के लिए देवनागरी यूनीकोड टाइपिंग (टंकन) अत्यधिक सहायता करता है।
व्यंजन में स्वर वर्ण को जब मिलाया जाता है तब वह उच्चारण करने योग्य होता है। अनुस्वार तथा विसर्ग को अयोगवाह कहा जाता है। इसका प्रयोग (लिखने तथा बोलने में ) केवल स्वर वर्णों के साथ ही होता है। दो व्यंजन वर्णों को आपस में मिलने पर एक संयुक्त व्यंजन का निर्माण होता है।
व्यंजन वर्णों के संयोग के कारण इसके लिखावट (आकृति) में परिवर्तन
1. कहीं-कहीं दो व्यंजनों के मेल को पहचानना आसान होता है। जैसे स् + व् + अ = स्व । कभी कभी व्यंजनों के मेल से बने अक्षर में इतना परिवर्तन हो जाता कि पहचानना कठिन हो जाता है। जैसे- क् + ष् अक्ष त्र् अत्र ज् + ञ + अ = ज्ञ इत्यादि। जहाँ दो व्यंजन वर्णों के मेल से उसकी आकृति में बहुत अधिक अंतर आ जाता है, ऐसे शु+ र् + अ = श्र। घ्+ न्+ अ = घ्न जैसे वर्ण को पहचानना चाहिए ।
2. इस लिपि मे र एक ऐसा वर्ण है, जो किसी अन्य व्यंजन के साथ मिलने पर तीन तरह से परिवर्तित हो जाता है। कभी यह वर्ण के ऊपर, कभी मध्य में कभी नीचे जुड़ता है। जैसे- वर्ण में ऊपर वाला र् को देखें- व + र् + ण = वर्ण, क्रम में मध्य वाला र् को देखें व + र्ण क्रम, वर्ण में ऊपर वाला र् को देखें + र् + ण वर्ण, घ्राण में नीचे वाला र् को देखें घ्+र् व ण + आ + ण घ्राण ।
3. संस्कृत भाषा में कहीं कहीं तीन या इससे अधिक व्यंजन वर्ण भी आपस में जुड़ते हैं। जैसे- ओष्ठ्य व्यंजन वर्णों के आकृति परिवर्तन को समझने के लिए देवनागरी यूनीकोड टाइपिंग (टंकन) अत्यधिक सहायता करता है।
अभ्यास
1. द्व, द्ध, भ्र, पर्ण, दुग्ध शब्द में व्यंजन तथा स्वर को अलग अलग कर लिखें।
2. 10 ऐसे संयुक्त व्यंजन को लिखें, जो दो व्यंजन को मिलने पर भी आसानी से पहचाना जा सकता है।
3. 10 ऐसे संयुक्त व्यंजन को लिखें, जो दो व्यंजन को मिलने पर स्वरूप में परिवर्तन हो जाता है ।
वर्ण संयोग
स्वर तथा व्यंजन के मेल से शब्द बनते हैं। जैसे- ज्+ अ+ य्+ ए+ श्+ अ इन वर्णों के आपस में जुड़ने पर जयेश शब्द बनता है। र् + अ + थ् + अ = रथ ग् + अ + ज् + अ = गज आदि।
जब कोई स्वर व्यंजन में जोड़ा जाता है तो उसे मात्रा के रूप में दिखाया जाता है। क् में आ की मात्रा जुड़ने पर का, क् में इ जुड़ने पर कि आदि शब्द बनते हैं। अ अक्षर की कोई भी मात्रा नहीं होती है। बल्कि यह हलन्त चिह्न के हटने से पता चलता है।
हम शब्दों को ढूढ़ने के लिए शब्दकोश का प्रयोग करते है। यहाँ पर वर्ण क्रम से शब्द रखे होते हैं। यहाँ आरम्भिक अक्षर महत्वपूर्ण होता है, जो हमें शब्दों को खोजने में मदद करता है। संस्कृत या हिन्दी जैसी भाषा में शब्दों का अंतिम वर्ण लिंग (पुल्लिंग, स्त्रीलिंग, नपुंसक लिंग) को पहचानने में सहयोग करता है। संस्कृत में शब्दों का स्वरूप अधिकांश विभक्ति तथा वचन में परिवर्तित हो जाता है। शब्दों के अंतिम वर्ण तथा लिंग के कारण संस्कृत शब्दों के स्वरूप में परिवर्तन देखा जाता है। क्रिया में भी बहुत कुछ ऐसा होता है, जिसकी चर्चा हम आगे यथास्थान करेंगें।
दो शब्दों या पदों के मेल को सन्धि कहा जाता है। सन्धि का नियम आगे के पाठ में दिया गया है। वर्णों के संक्षेपीकरण का प्रत्याहार कहा जाता है। सन्धि आदि नियमों में प्रत्याहारों का उपयोग किया जाता है। प्रत्याहार बनाने के लिए माहेश्वर सूत्र का एक अक्षर तथा एक अंतिम (हलन्त) अक्षर लिया जाता है। प्रत्याहार से इन दोनों वर्णों के बीच में आने वाले वर्णों का बोध होता है। जैसे अक् प्रत्याहार कहने पर अ इ उ ऋ ऌ का बोध होता है।

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