सामाजिक पत्रकारिता - Social Journalism
सामाजिक पत्रकारिता - Social Journalism
मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है। इसलिए सामाजिक पत्रकारिता हमेशा से पत्रकारिता की सर्वाधिक महत्वपूर्ण विधा रही है, समाज को प्रभावित करने वाले हर एक कारक ने अपने अपने दौर में पत्रकारिता को एक स्वरूप दिया है, तेवर दिये हैं। भारतीय संदर्भ में देखें तो चाहे वह बाल विवाह का मामला हो, चाहे सती प्रथा, उन्नीसवीं सदी के अन्तिम दौर और बीसवीं सदी के शुरूआती काल में भारतीय पत्रकारिता ने इन बुराईयों के खिलाफ माहौल तैयार करने में अहम भूमिका निभाई। 70 के दशक में दहेज प्रथा के खिलाफ माहौल हो या फिर वर्तमान में कन्या भ्रूण हत्या जैसे सवाल, पत्रकारिता ने हमेशा ही इन पर सकारात्मक रुख अपनाया है।
वस्तुतः बीसवीं सदी अफ्रीका और एशिया के कुछ इलाकों को छोड़ शेष विश्व के लिए एक प्रकार से सामाजिक सुधारों की सदी थी। इस सदी के आरम्भ से ही सामाजिक पुनर्जागरण का दौर तेज हो गया था। यूरोप और अमेरिका में तो बदलाव आ ही रहे थे। एशिया का बड़ा हिस्सा भी कई दृष्टियों से बदल रहा था। भारत में ही देखें तो आधुनिक शिक्षा का विस्तार शुरू हो गया था। बंगाल में इस शिक्षा का प्रादुर्भाव सबसे पहले हुआ था इसी लिए वहां सामाजिक चेतना भी अधिक तेजी से फैली थी और पत्रकारिता की प्रारम्भिक जमीन भी वहीं तैयार हो रही थी। बंगाल को भारत की वर्तमान पत्रकारिता की जन्मभूमि कहा जा सकता है और बीसवीं सदी के आरम्भ में ही बंगाल की पत्रकारिता में सामाजिक प्रश्नों की अहमियत महत्वपूर्ण हो गई थी। राजा राम मोहन राय के विचार, वाल विवाह सती प्रथा, ब्राह्मण वर्ग में भोजन पकाने आदि को लेकर होने वाले छुआछूत आदि के सवालों को अखबार इसी दौर में उठाने थे।
हिन्दी पत्रकारिता का तो भारतेंदु युग शुरू ही इन्हीं सवालों के साथ हुआ था क्षेत्रीय पत्रकारिता में यह विषय और भी अधिक मुखर हो रहा था। पंजाब, बंगाल, मद्रास (आधुनिक तमिलनाडु) और हैदराबाद (आधुनिक आन्ध्र प्रदेश) आदि क्षेत्रों की पत्रकारिता इस दौर में अपने-अपने सामयिक अन्तर्विरोधों की चीर फाड़ करने लगी थी।
उत्तराखण्ड के सन्दर्भ में तो यह बात और भी अधिक स्पष्टता से अनुभव की जा सकती है। 'शक्ति' जैसे महत्वपूर्ण समाचार पत्र ने दलित उत्थान मंदिर प्रवेश आन्दोलन, नायक सुधार आन्दोलन आदि स्थानीय सामाजिक मुद्दों को हमेशा प्रमुखता दी। 'समता' जैसा अखबार तो शुरू ही इसी उद्देश्य से किया गया था। 'गढ़वाली' और 'कर्मभूमि' जैसे अखबारों ने हमेशा इन सवालों सबसे अधिक अहमियत दी।
उत्तराखण्ड में डोली पालकी आन्दोलन, मन्दिर प्रवेश आन्दोलन जैसे बड़े सवालों से काफी पहले ही विदेश यात्रा करने से जातिबहिकृत होने, बाहर पढ़ाई करने जा रहे ब्राह्मण छात्रों के अन्य लोगों के हाथ से बने भोजन को ग्रहण करने, जाति से बाहर विवाह करने जैसे सवालों पर स्थानीय जातीय संगठन और अखबार विचारोन्तेव बहस शुरू कर चुके थे।
सामाजिक पत्रकारिता आज भी अपनी जरूरत और महत्व बनाए हुये है। आज सवाल आदमी से आदमी की बराबरी का है, गरीबी, भुखमरी, स्वास्थ्य और शिक्षा जैसे सवाल आज के बड़े सामाजिक सवाल हैं। इलेक्ट्रानिक मीडिया के आने के बाद इन सवालों को उठाने का अंदाज एवं तेवर बदले हैं तो मीडिया द्वारा इन्हें किसी नए पत्रकार के लिए सामाजिक पत्रकारिता के क्षेत्र में करने के लिए बहुत कुछ है। आज 'ह्यूमन एंगिल स्टोरी' की मांग सबसे अधिक है और इस तरह की खबरों के लिए सामाजिक पत्रकारिता से बेहतर क्षेत्र कोई नहीं है।
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