उत्तराखण्ड में सामाजिक आन्दोलन और मीडिया - Social Movements and Media in Uttarakhand
उत्तराखण्ड में सामाजिक आन्दोलन और मीडिया - Social Movements and Media in Uttarakhand
उत्तराखण्ड के प्रारम्भिक कत्यूरी राजवंश से लेकर चंदों, परमारों और गोरखों के इतिहास एवं शासन प्रबन्ध को जानने का प्रमुख साधन यद्यपि अभिलेख, मुद्राएं, ताम्रपत्र, भोजपत्र, पाण्डुलिपियाँ आदि रहीं हैं परन्तु इनके अत्याचारों की कहानियां हमें आज भी लोक गाथाओं, लोकगीतों, लोकोक्तियों, मुहावरों, कथाओं आदि लोक विधाओं के माध्यम से प्राप्त होती हैं। तब एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक इस तरह की सूचनाएं पहुंचाने का कार्य मौखिक परम्परा के द्वारा ही होता था।
उत्तराखण्ड में अंग्रेजों के आगमन के बाद धीरे- धीरे जनता और अंग्रेजों के बीच अन्तर्विरोध तीव्र होने लगे और विविध आन्दोलनों की पृष्ठभूमि बनने लगी। इन आन्दोलनों की पृष्ठभूमि तैयार करने में स्थानीय पत्रकारिता व संगठनों की विशेष भूमिका रही। ब्रिटिश उत्तराखण्ड के शुरूआती कुली बेगार आन्दोलन (जबरन श्रम के खिलाफ प्रतिकार) एवं जंगलात आन्दोलन बाद में राष्ट्रीय संग्राम के साथ एकाकार हो गए कुली बेगार एवं जंगलात के कष्टों को यहां के तत्कालीन प्रमुख समाचार पत्रों - अल्मोड़ा अखबार (1871 1918), गढ़वाली (1905 – 1952), शक्ति ( 1918 से निरन्तर) गढ़वाल समाचार (1902) 1904) आदि ने प्रमुखता से उठाया। ब्रिटिश उत्तराखण्ड में हुए अन्य सामाजिक आन्दोलनों में महिला आन्दोलन, डोला पालकी आन्दोलन, दलित आन्दोलन, नायकोद्धार, शिक्षा प्रचार आदि प्रमुख हैं। जहां अल्मोड़ा अखबार, शक्ति, गढ़वाली, स्वाधीन प्रजा आदि ने क्षेत्रीय तथा राष्ट्रीय आन्दोलन को जोड़ने का काम किया तो वहीं दूसरी ओर "समता" जैसे पत्रों ने दलितों के बीच चेतना और संगठन का कठिन काम किया तो 'गढ़वाली, "शक्ति", "कुमाऊँ कुमुद" आदि ने अनेक बार सामाजिक राजनीतिक प्रश्नों पर अपनी स्पष्ट राय प्रकट की।
■ स्वातंत्र्योत्तर उत्तराखण्ड भी विविध आन्दोलनों की जन्म भूमि रही है। यहां चिपको आन्दोलन (वन आन्दोलन), नशा नहीं रोजगार दो आंदोलन, विभिन्न भूमि आन्दोलन (कोटखर्रा, बिन्दुखत्ता आदि ) और इन सब आन्दोलनों को समेटता उत्तराखण्ड आन्दोलन हुआ। आज भी जल, जंगल, जमीन, पानी, बिजली, सड़क आदि के लिए आन्दोलन होते रहते हैं। यहां बड़े बांधों के निर्माण के कारण विस्थापित जनता के आन्दोलन भी लंबे समय से जारी हैं और यह बात बिना किसी संकोच के कही जा सकती है कि इन सभी आन्दोलनों के प्रचार प्रसार में स्थानीय मीडिया की जबर्दस्त भूमिका रही है।
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