सामाजिक शोध (सोशल रिसर्च) और समाज कार्य शोध (सोशल वर्क रिसर्च) - Social Research and Social Work Research

सामाजिक शोध (सोशल रिसर्च) और समाज कार्य शोध (सोशल वर्क रिसर्च) - Social Research and Social Work Research

सामाजिक शोध


स्पष्ट तौर पर, सामाजिक शोध का उद्देश्य मानव व्यवहार में कारण-कारक संबंधों को तलाशना है। सामान्यत: प्राकृतिक परिघटनाओं की भाँति ही मानव व्यवहार में भी संबंधों को मापने योग्य और पूर्वानुमानी तत्व पाए जाते हैं। सामाजिक शोध, भौतिक और प्राकृतिक विज्ञान के जैसे ही इन संबंधों को उन सभी तरीकों और प्रबलताओं में स्थापित करने, मापने और विश्लेषित करने के लिए प्रयत्नशील रहता है। यद्यपि प्राकृतिक और भौतिक विज्ञानों के विपरीत सामाजिक शोध में विषय के रूप में सचेत और सक्रिय मनुष्य होते हैं। विषय का व्यक्तिगत व्यवहार, भले ही वह स्वतंत्र हो अथवा निर्धारित हो, सामाजिक शोध के कार्य को कठिन अवश्य बना देता है। साथ ही, शोधकर्ता और विषय एक जैसे ही होने के कारण सामाजिक शोध में वस्तुपरक अभिगम का दायरा काफी हद तक सिमट जाता है। सामाजिक अनुसंधान का सरोकार भौतिक आँकड़ों से कहीं अधिक जटिल, सामाजिक आँकड़ों से होता है। सामाजिक आँकड़ों की यह जटिल प्रकृति सामाजिक शोध में यथार्थ पूर्वानुमान की शक्ति को कम कर देती है। सामाजिक शोध की अधिकांश विषयवस्तु गुणात्मक है और मात्रात्मक मापन को स्वीकृत नहीं करती है। ऐसा इसलिए है, क्योंकि सामाजिक घटनाओं का पता ऐसी घटनाओं को प्रदर्शित करने वाली संकल्पनाओं अथवा शब्दों द्वारा सिर्फ प्रतीक के रूप से ही चल पाता है।








सामाजिक शोध की प्रक्रिया 


शोध की प्रक्रिया शोध का नमूना होती है। शोध परियोजना में, विभिन्न वैज्ञानिक क्रियाकलाप होते हैं जिनमें शोधकर्ता जानकारी प्राप्त करने के लिए स्वयं को उसमें संलिप्त करता है। यद्यपि, प्रत्येक शोध परियोजना स्वयं में विशिष्ट होती है, फिर भी सभी परियोजनाओं में कुछ समान क्रियाकलाप होते हैं जो परस्पर संबंधित होते हैं, भले ही उनकी अध्ययन की जाने वाली परिघटनाएँ कुछ भी हों।

अत: इन परस्पर संबंधित क्रियाकलापों की प्रणाली शोध प्रक्रिया होती है।


1) शोध विषय का चुनाव।


2) शोध समस्या को समझने के लिए क्षेत्र सर्वेक्षण।


3) सन्दर्भ ग्रंथ सूची का निर्माण।


4) समस्या को परिभाषित या निर्मित करना।


5) समस्या के तत्वों का विभेदीकरण और रूपरेखा निर्माण।


(6) ऑकड़ों या प्रमाणों से प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष संबंधों के आधार पर समस्या के तत्वों का वर्गीकरण।


7) समस्या के तत्वों के आधार पर आँकड़ों या प्रमाणों का निर्धारण।


8) वांछित आँकड़ों या प्रमाणों की उपलब्धता का अनुमान लगाना।


9) समस्या के समाधान की जाँच करना।


10) आँकड़ों तथा सूचनाओं का संकलन।


11) आँकड़ों को विश्लेषण के लिए व्यवस्थित एवं नियमित करना।


12) आँकड़ों एवं प्रमाणों का विश्लेषण एवं विवेचन।


13) प्रस्तुतीकरण के लिए आँकड़ों को व्यवस्थित करना।


14) उद्धरणों, सन्दर्भों एवं पाद् टिप्पणियों का चयन एवं प्रयोग।


15) शोध प्रस्तुतीकरण के स्वरूप और शैली को विकसित करना सी.आर. कोठारी (2005:12) ने शोध प्रक्रिया के ग्यारह चरणों को प्रस्तुत किया है-








1) शोध समस्या का निर्माण


2) गहन साहित्य सर्वेक्षण


3) उपकल्पना का निर्माण


4) शोध प्रारूप निर्माण


5) निदर्शन प्रारूप निर्धारण


6) आँकड़ा संकलन


7) प्रोजेक्ट का सम्पादन


8) आँकड़ों का विश्लेषण


9) उपकल्पनाओं का परीक्षण


10) सामान्यीकरण और विवेचन


11) रिपोर्ट तैयार करना या परिणामों का प्रस्तुतीकरण यानि निष्कर्षों का औपचारिक लेखन राम आहूजा (2003:125) ने मात्र छह चरणों का उल्लेख किया है, जो निम्नवत हैं -


1) अध्ययन समस्या का निर्धारण


2) शोध प्रारूप तय करना


3) निदर्शन की योजना बनाना (सम्भाव्यता या असम्भाव्यता अथवा दोनों) 


4) आँकड़ा संकलन


5) आँकड़ा विश्लेषण (सम्पादन, संकेतन, प्रक्रियाकरण एवं सारणीयन) 


6) प्रतिवेदन तैयार करना।