सामाजिक शोध का अध्ययन, क्षेत्र एवं सार्थकता - Study, Scope and Significance of Social Research
सामाजिक शोध का अध्ययन, क्षेत्र एवं सार्थकता - Study, Scope and Significance of Sociological Research
सामाजिक शोध का क्षेत्र उतना ही व्यापक है जितना स्वयं मानव जीवन। सामाजिक शोध के अंतर्गत सामाजिक जीवन तथा उससे सम्बद्ध समस्त घटनाक्रम शामिल हैं। सामाजिक शोध के विस्तृत क्षेत्र को कार्ल पियर्सन (1937: 16) के इस कथन से आसानी से समझा जा सकता है कि -
"सामाजिक शोध का क्षेत्र वस्तुतः असीमित है, और शोध की सामग्री अन्तहीन। सामाजिक घटनाओं का प्रत्येक समूह सामाजिक जीवन का प्रत्येक पहलू पूर्व और वर्तमान विकास का प्रत्येक चरण सामाजिक वैज्ञानिक के लिए सामग्री है।"
अतः सामाजिक शोध में समाज की किसी भी सामान्य अथवा विशिष्ट घटना का अध्ययन विषय के रूप में चयन किया जा सकता है।
श्रीमती पी. वी. यंग ने सामाजिक शोध के अध्ययन क्षेत्र को इस प्रकार विभाजित किया है
1) सामाजिक शोध के अंतर्गत सामाजिक जीवन में संरचनात्मक तथा प्रकार्यात्मक पक्षों के बारे में अध्ययन किया जाता है।
थामस एवं जनैनिकी ने इस आधार पर तीन बातों पर विशेष बल देने को आवश्यक माना है -
• एक दिए हुए समाज के सम्पूर्ण जीवन का अध्ययन।
• तुलनात्मक पद्धति के आधार पर अध्ययन करना।
• व्यवस्थित व क्रमबद्ध अध्ययन करना।
2) इस क्षेत्र के अंतर्गत सामाजिक घटनाओं संबंधी कार्य-प्रणालियों, नवीन सिद्धांतों, नवीन संकल्पनाओं की रचना हेतु शोध कार्य किए जाते हैं।
3) पूर्व से प्रचलित अथवा विद्यमान सार्वभौमिक सिद्धांतों का परीक्षण अथवा चुनौती तथा उनमें नवीन प्रमाणों के प्रकाश में संशोधित करने के लिए भी सामाजिक शोध संबंधी कार्य संचालित किए जाते हैं।
4) सामाजिक शोध के विद्यार्थी का एक विस्तृत अभिरुचिपूर्ण क्षेत्र ऐसे अध्ययनों से भी संबंधित है जिसका उद्देश्य प्रायः विद्यमान वैज्ञानिक सिद्धान्त के कार्यकलापों तथा अन्वेषण की स्थापित प्रविधियों के अंतर्गत तथ्य संकलन व विश्लेषण करना होता है
5) सामाजिक शोध का एक उल्लेखनीय क्षेत्र प्रयोगात्मक प्रकृति के अध्ययन से संबंधित शोध भी है। इसके अंतर्गत सामाजिक जीवन का व्यवस्थित अध्ययन नियोजित किया जाता है।
उक्त वर्णित सामाजिक शोध के विस्तृत क्षेत्र के परिप्रेक्ष्य में यह कहना कदाचित गलत न होगा कि एक विस्तृत सामाजिक क्षेत्र के सम्बन्ध में वैज्ञानिक ज्ञान प्रस्तुत करके सामाजिक शोध अज्ञानता का नाश करता है। जब विभिन्न सामाजिक समस्याओं यथा महिला कामगारों की समस्याओं, बेकारी, भिक्षावृत्ति, वृद्धों की समस्याओं, वेश्यावृत्ति, मजदूरों के शोषण और उनकी शोचनीय कार्यदशाओं, बाल मजदूरी आदि पर सामाजिक शोध किया जाता है, तो उसके प्राप्त परिणामों से न केवल समाज कल्याण के क्षेत्र में सहायता प्राप्त होती है अपितु सामाजिक नीति-निर्माण के लिए भी आधार प्रस्तुत किया जाता है। विविध सामाजिक समस्याओं से संबंधित शोध कार्यकानून निर्माण की दिशा में भी अपना योगदान प्रस्तुत करते हैं। सामाजिक शोध से कार्य-कारण सम्बन्ध ज्ञात होते हैं, सैद्धान्तिक व संकल्पनात्मक समझ विकसित होती है और अन्तत: विषय की उन्नति होती है। सामाजिक शोध न केवल सामाजिक नियन्त्रण में मदद करता है, अपितु सामाजिक शोध सामाजिक-आर्थिक प्रगति में भी सहायक सिद्ध होता है।
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