भारत में परम्परागत जनसम्पर्क - Traditional Public Relations in India
भारत में परम्परागत जनसम्पर्क - Traditional Public Relations in India
कबीलों के जन्म के साथ तथा परस्पर संवाद की आवश्यकता का अनुभव होने के साथ ही भाषा का उद्भव और विकास हुआ होगा तथा फिर धीरे-धीरे लिपि बनी होगी, वह तथ्य इतिहास द्वारा सिद्ध है।
सर्वप्रथम ढोल, मादल, मृदंग आदि चर्मवाद्य जनसंवाद का साधन बने थे। कबीलों में जन्म से लेकर मृत्यु तक के सभी क्रियाकलापों की सूचना ढोल की लय को बदलकर दी जाती थीं ढोल या डुग्गी पीट कर लोगों को एकत्र कर मौखिक घोषणाएं की जाती थी। बाद में उत्सव त्यौहार मेले आदि का आयोजन करके जनसम्पर्क किया जाने लगा ये अवसर सूचनाओं के आदान-प्रदान के लिए अच्छे माने जाते थे। यही नहीं, इन अवसरों पर मनोरंजन के साथ सूचना देने का कार्य भी सरलता से हो जाता था।
वैदिक काल में यज्ञों का आयोजन होने लगा था, जिनमें लोग बड़ी संख्या में एकत्र होते थे। इन यज्ञशालाओं में नीति, धर्म व सामाजिक नियमों की चर्चा के साथ-साथ ज्ञान का प्रचार-प्रसार भी किया जाता था। ये यज्ञ गुरु शिष्यों के बीच का खुला मंच होते थे। पुराणों में नारद को एक पत्रकार तथा जनसम्पर्क अधिकारी के रूप में चित्रित किया गया है। रामायण, महाभारत काल में रथों तथा घोड़ों द्वारा समाचारों को भेजने की व्यवस्था का उल्लेख मिलता है।
जैन, बौद्ध, हिन्दू सभी धर्म अपने अपने उपदेशों के प्रचार-प्रसार के लिए अनेक प्रकार की सूचना सेवाओं का प्रयोग करते थे शंकराचार्य द्वारा बनवाये गये। चार दिशाओं में चार मठ, जैन मतावलम्बियों द्वारा बनाये गये मन्दिर, बौद्धों के विहार सभी जनसम्पर्क के साधन थे।
मौर्यकाल में तो लम्बी सड़कें भी बनवायी गयी थीं व्यवस्थित डाक सेवा का जन्म इसी काल में हुआ। गुप्तकाल भी इस दृष्टि से महत्वपूर्ण है। यही वह समय था जब साहित्य, संगीत, चित्रकला, मूर्तिकला भवन निर्माण कला सभी जनसम्पर्क के साधन के रूप में प्रसिद्ध हुए उस काल में भजन, प्रार्थना सभाएं, उत्सव, मेले, त्यौहार, रामलीला, रासलीला आदि जनसंवाद के अपूर्व साधन थे। हस्तलेखों की परम्परा भी इसी समय की देन है। अशोक के शिलालेख, चित्तौड़ का कीर्ति स्तम्भ, आदि भी जनसम्पर्क के विभिन्न माध्यम के रूप में प्रयुक्त हुए थे।
मुगलकाल में ऊँची-ऊंची मीनारें बनायी गयी थी, जिनके ऊपर नक्कारे रखे जाते थे। नक्कारों को विशेष प्रकार से बनाकर सूचनाएं भेजी जाती थीं। आदिवासी क्षेत्रों में तो आज भी दैनिक कार्य के बाद रात्रि के समय एक स्थान पर सभी लोग एकत्रित होकर लोकगीत, लोकनृत्य, झाड़फूंक, पूजा बलि आदि का आयोजन करते हैं ऐसे अवसरों पर लोग एक जगह पर जमा होते हैं और उनके बीच जानकारियों का आदान-प्रदान भी होता है।
उपर्युक्त वर्णित सभी साधनों के होते हुए भी उस दौर में जनसम्पर्क एक कठिन कार्य था क्योंकि तब तक जनमत का या जनता की भावना का महत्व ही न था। सभी साधन सूचना यंत्र भर थे। उनका उद्देश्य राज हित ही था, अन्य कुछ नहीं उद्देश्यपूर्ण जनसम्पर्क का विकास तो जनतंत्र शासन पद्धति के साथ शुरू हुआ।
आधुनिक युग में औद्योगिक विकास के साथ-साथ जनसंचार व जनसम्पर्क के संसार में क्रांति हुई सम्पर्क के साधनों और माध्यमों में तेजी से विकास हुआ। छापाखाना, फोटोग्राफी, पढ़ने लिखने के प्रति जागरूकता, रेलों का निर्माण, समुद्री जहाज, वायुयान डाक-तार विभाग सभी के विकास के साथ जनसम्पर्क की प्रक्रिया अधिक तेजी से विकसित हुई।
आज तो रेडियो, टेलीविजन, टेलीफोन, कम्प्यूटर सेटेलाइट इंटरनेट, मोबाइल आदि आधुनिक साधनों की उपलब्धि के साथ पूरा विश्व एक गांव की भांति जुड़ गया है, और जनसम्पर्क व्यवस्था की आवश्यकता इतनी बढ़ गयी है कि आज जनसम्पर्क व्यवसाय के रूप में पनप रहा है।
जनसम्पर्क के परम्परागत साधन इस प्रकार हैं:
1. लोककलाएं- चित्रकला, मूर्तिकला, वास्तुकला, हस्तकला
2. लोकनृत्य कठपुतली नृत्य, समूह नृत्य, विवाह, जन्मादि अवसर पर किये गये नृत्य।
3. लोकगीत विभिन्न क्षेत्रों के परम्परागत गीत विवाह, जन्म, मुण्डन, जन्मदिन और त्यौहारों के अवसर पर गाये जाने वाले गीत
4. लोकनाट्य नौटंकी, तमाशा, मवई, रास, जात्रा, अंकिया नाटक आदि।
5. लिखित स्वरूप ताम्रपत्र शिलालेख, कला पत्रक
6. लोक गाथाएं प्रशस्ति परक काव्य तथा शौर्य गाथाएं।
7. अन्य साधन- डुगडुगी पीटना मुनादी करना हरकारों द्वारा सन्देश, कारिन्दों द्वारा घोषणाएं समाएं, यज्ञ स्वयंवर आदि
B. सामाजिक तथा धार्मिक पर्व उत्सव त्यौहार मेले प्रदर्शनिया कीर्तन आदि।। शिकार किये गये पशुओं के कारण किया गया सामूहिक भोजन
9. धार्मिक आयोजन मंदिर, मस्जिद, गुरुद्वारे और आश्रमों में होने वाले धार्मिक उत्सवों के अवसर पर लोग भारी संख्या में एकत्रित होते हैं तथा संवाद करते हैं।
उपर्युक्त सभी संवाद व सम्पर्क के परम्परागत साधन हैं। कहने को ये साधन परम्परागत हैं, किन्तु आज के इलेक्ट्रानिक मीडिया के युग में भी इनका आकर्षण तथा प्रभाव कम हुआ है। यह कहना अतिशयोक्ति न होगा कि आज भी दृश्य, श्रव्य एवं सभी इलेक्ट्रॉनिक माध्यमों में प्रचार प्रसार तथा विज्ञापन के लिए परम्परागत साधन अधिक मुखर प्रभावशाली हैं। लोकशैलियों का प्रयोग सूचना को रोचक बनाकर प्रस्तुत करता है अतः यह आकर्षक भी है और प्रभावशाली भी है।
वार्तालाप में शामिल हों