शोध प्रारूप के प्रकार - Types of Research Format
शोध प्रारूप के प्रकार - Types of Research Format
विभिन्न विद्वानों ने शोध प्रारूप के भिन्न-भिन्न प्रकारों का उल्लेख किया है।
अल्फ्रेड जे. काहन ने चार प्रकार के शोध प्रारूप का उल्लेख किया है -
1. यादृच्छिक अवलोकन पूर्व अनुसंधान अवस्था
2. अन्वेषणात्मक अथवा निरुपणात्मक अध्ययन
3. निदानात्मक अथवा वर्णनात्मक अध्ययन
4. प्रयोगात्मक प्रारूप
न्यूयार्क यूनिवर्सिटी की फैकल्टी क्लास वेबसाइट (2010 : 10) में 'शोध प्रारूप क्या है ?' अध्याय के अन्तर्गत चार प्रकार के शोध प्रारूपों को उल्लेखित किया गया है.
1. प्रयोगात्मक (Experimental)
2. वैयक्तिक अध्ययन (Case Study)
3. अनुलम्ब प्रारूप (Longitudinal)
4. अनुप्रस्थ काट प्रारूप (Cross-Sectional Design)
सुसन कैरोल (2010:1) द्वारा शोध प्रारूप के आठ प्रकारों का उल्लेख किया गया है -
1. ऐतिहासिक शोध प्रारूप (Historical Research Design)
2. वैयक्तिक और क्षेत्र शोध प्रारूप (Case and Field Research Design)
3. विवरणात्मक या सर्वेक्षण शोध प्रारूप (Descriptive or Survey Research Design)
4. सह-सम्बन्धात्मक या प्रत्याशित शोध प्रारूप (Correlation or Prospective Research Design)
5. कारणात्मक, तुलनात्मक या एक्स पोस्ट फैक्टो शोध प्रारूप (Causal Comparative or Ex-post Facto Research Design)
6. विकासात्मक या समय-श्रेणी शोध प्रारूप (Developmental or Time Series Research Design)
7. प्रयोगात्मक शोध प्रारूप (Experimental Research Design)
8. अर्द्ध प्रयोगत्मक शोध प्रारूप (Quasi Experimental Research Design)
सेल्टिज, जहोदा तथा उनके सहयोगियों द्वारा तीन प्रकार के शोध प्रारूपों का उल्लेख किया गया है -
1. अन्वेषणात्मक अथवा निरुपणात्मक अध्ययन
2. वर्णनात्मक अध्ययन
3. कारणात्मक उपकल्पनाओं के परीक्षण सेसंबंधित अध्ययन
शोध प्रारूपों को चार महत्वपूर्ण भागों में विभक्त किया जा सकता है-
1. अन्वेषणात्मक प्रारूप
2. विवरणात्मक या वर्णनात्मक शोध प्रारूप
3. व्याख्यात्मक प्रारूप
4. प्रयोगात्मक प्रारूप
किसी विशिष्ट शोध प्रारूप का चयन मुख्यत: शोध की प्रकृति पर निर्भर करता है। कौन-से तथ्यों की आवश्यकता है? कितने विश्वसनीय तथ्य चाहिए? प्रारूप की उपयुक्तता क्या है? लागत कितनी आएगी? इत्यादि कारकों पर भी शोध प्रारूप का चुनाव निर्भर करता है।
1. अन्वेषणात्मक या निरुपणात्मक शोध प्रारूप
जब सामाजिक शोध का मुख्य उद्देश्य समस्या के संबंध में नवीन तथ्यों के बारे में प्रारम्भिक जानकारी प्राप्त करना हो तो इस प्रारूप का इस्तेमाल किया जाता है। इसमें शोधकर्ता को अध्ययन समस्या से संबंधित वास्तविक कारकों एवं तथ्यों का संज्ञान नहीं होता है। वह अध्ययन द्वारा उनका पता लगाता है। चूँकि इसमें नवीन तथ्यों को तलाशा जाता है इसलिए इसे अन्वेषणात्मक शोध प्रारूप कहा जाता है। इस प्रारूप की सहायता से सिद्धान्त की निर्मिति होती है।
सेल्टिज के अनुसार,
“अधिक निश्चित शोध के लिए सम्बद्ध उपकल्पना के निरूपण में सहायक अनुभव प्राप्त करने के लिए अन्वेषणात्मक शोध आवश्यक है। "
यदा-कदा अन्वेषणात्मक और व्याख्यात्मक शोध प्रारूप को एक ही मान लिया जाता है और कई विद्वानों द्वारा तो व्याख्यात्मक शोध प्रारूप का जिक्र तक नहीं किया गया है। गौर से देखा जाए तो यह कहा जा सकता है कि जिस व्याख्यात्मक शोध में कार्य-कारण संबंधों पर विस्तृत वर्णन प्रस्तुत करने की कोशिश की जाती है, वह होता है व्याख्यात्मक शोध प्रारूप और जिसमें नवीन तथ्यों द्वारा विषय को स्पष्ट किया जाता है, उसे अन्वेषणात्मक शोध प्रारूप के अन्तर्गत रखते हैं। इसमें अध्ययन विषय के बारे में शोधकर्ता को जानकारी नहीं रहती है। वह द्वितीयक स्रोतों के माध्यम से ही जानकारी प्राप्त करता है। अज्ञात तथ्यों की तलाश करने के कारण अथवा विषय से संबंधित अपूर्ण ज्ञान रखने के कारण इस शोध प्रारूप में सामान्यत: उपकल्पनाएँ नहीं निर्मित की जाती हैं। उपकल्पनाओं के स्थान पर शोध प्रश्नों को स्थान दिया जाता है और उन्हीं शोध प्रश्नों के उत्तरों की तलाश द्वारा शोध कार्य पूर्ण किया जाता है।
विलियम जिकमण्ड (1988 :73) ने अन्वेषणात्मक शोध के प्रमुख रूप से तीन उद्देश्य बताए हैं-
नए विचारों की खोज करना।
परिस्थिति का निदान करना।
विकल्पों को छाँटना।
इस प्रारूप में सामाजिक समस्या के अन्तर्निहित कारणों को तलाशने के कारण लचीलापन होना आवश्यक है। अधिकांशतः इसमें तथ्यों की गुणात्मक प्रकृति होती है। अतः अत्यधिक तथ्यों एवं सूचनाओं कोप्राप्त करने का प्रयास किया जाता है। तथ्य संकलन की प्रविधि भी इसकी प्रकृति के अनुसार ही होनी चाहिए। समय और संसाधन आदि का भी विशेष ध्यान रखना चाहिए।
2. विवरणात्मक या वर्णनात्मक शोध प्रारूप
सामाजिक विज्ञान शोध के क्षेत्र में वर्णनात्मक शोध का अधिक महत्वपूर्ण स्थान है। इसका मुख्य उद्देश्य अध्ययन की जा रही इकाई, समूह, संस्था, घटना, समस्या, समुदाय या समाज इत्यादि से संबंधित पक्षों का संपूर्ण वर्णन करना है। अतः इसके लिए आवश्यक है कि शोध विषय व घटना से संबंधित सभी प्रकार की यथार्थ सूचनाएँ प्राप्त हो जाएँ। यथार्थ सूचनाओं के अभाव में अध्ययन विषय व समस्या के बारे में जो कुछ भी विवरण प्रस्तुत किया जाएगा वह वैज्ञानिक न होकर दार्शनिक विवरण ही होगा। यह प्रारूप दृढ़ एवं अलचीला प्रकृति का होता है इसमें विशेष सावधानी रखने की जरूरत होती है। इस बात पर विशेष ध्यान देने की आवश्यकता है कि निदर्शन पर्याप्त एवं प्रतिनिधित्वपूर्ण हो। प्राथमिक तथ्य संकलन की प्रविधि स्पष्ट हो तथा उसमें किसी भी प्रकार से पूर्वाग्रह या मिथ्या झुकाव न आ पाए। अध्ययन समस्या से संबंधित विस्तृत तथ्यों को संकलित किया जाता है, अनुपयोगी एवं अनावश्यक तथ्यों का संकलन न हो इसके लिए सतर्कता बरतनी चाहिए। अध्ययन पूर्ण व यथार्थ हो और अध्ययन समस्या का वास्तविक चित्रण हो इसके लिए विश्वसनीय तथ्यों का होना अत्यंत आवश्यक है। इसमें शोध विषय के बारे में शोधकर्ता को अपेक्षाकृत जानकारी पर्याप्त मात्रा में रहती है इसलिए वह शोध संचालन संबंधी निर्णयों को पहले ही निश्चित कर लेता है। वर्णनात्मक शोध प्रारूप के लिए अलग से कोई चरण नहीं होते हैं। सामान्यत: इसमें सामाजिक शोध के चरणों का पालन किया जाता है। सम्पूर्ण एकत्रित सामग्री के आधार पर ही आवश्यकता के अनुसार सामान्यीकरण प्रस्तुत किये जाते हैं।
3. व्याख्यात्मक शोध प्रारूप
यह शोध प्रारूप, शोध समस्या की कारण सहित व्याख्या करता है। व्याख्यात्मक शोध प्रारूप की प्रकृति प्राकृतिक विज्ञानों की प्रकृति के सदृश्य ही होती है, जिसमें किसी भी वस्तु घटना/परिस्थिति का विश्लेषण ठोस कारणों के आधार पर किया जाता है। यह प्रारूप सामाजिक तथ्यों की कार्य-कारण व्याख्या प्रस्तुत करता है। इस प्रारूप में विभिन्न उपकल्पनाओं का परीक्षण किया जाता है तथा चरोंपरिवयों में संबंध और सह-संबंध खोजने का प्रयत्न किया जाता है।
4. प्रयोगात्मक शोध प्रारूप
इस शोध प्रारूप में अध्ययन समस्या के विश्लेषण हेतु किसी न किसी प्रकार का 'प्रयोग' शामिल होता है। यह प्रारूप नियंत्रित स्थिति में ज्यादा उपयुक्त होता है जैसे कि प्रयोगशालाओं में होता है। सामाजिक अध्ययनों में सामान्यत: प्रयोगशालाएं नहीं होती है। सामाजिक शोधकर्ता की प्रयोगशाला समाज ही होता है। उनमें नियंत्रित और अनियंत्रित समूहों के आधार पर प्रयोग किये जाते हैं। इस प्रकार के शोध प्रारूप में सामाजिक घटनाओं के विभिन्न पक्षों या चरों में से कुछ को नियंत्रित रखते हुए अन्य चरों पर नवीन परिस्थितियों के प्रभाव को जाँचते हैं।
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