सामाजिक आन्दोलन की रिपोर्टिंग के प्रकार - Types of Social Movement Reporting
सामाजिक आन्दोलन की रिपोर्टिंग के प्रकार - Types of Social Movement Reporting
सामाजिक आंदोलन की रिर्पोटिंग मीडिया के अलग-अलग रूपों के लिए अलग-अलग तरह से होती है। मोटे तौर पर इसें दो मुख्य रूपों में बांटा जा सकता है एक प्रिंट मीडिया के लिए और दूसरा इलेक्ट्रानिक मीडिया के लिए प्रिंट मीडिया में भी दैनिक पत्रों और पत्रिकाओं के लिए सामाजिक आंदोलनों की रिर्पोटिंग अलग-अलग प्रकार से की जाती है ।
• दैनिक अखबार
दैनिक अखबार में प्रतिदिन की सूचनाएं देना रिपोर्टर का दायित्व होता है। अतः दैनिक अखबार के रिपोर्टर को चाहिए कि वो जिस आंदोलन का कवरेज कर रहा है उसकी प्रतिदिन की अधिक से अधिक सूचनाएं एकत्र करे और उन्हें डेस्क या सम्पादक के पास भेजे आवश्यकतानुसार खबर को प्रभावशाली बनाने हेतु फोटोग्राफ्स का सहारा भी लिया जाना चाहिए। यह भी ध्यान रखा जाना चाहिए कि इस तरह की रिर्पोटिंग में अगले दिन के कार्यक्रम की जानकारी भी जरूर होनी चाहिए। अखबार के 'स्पेस' के अनुसार डेस्क वाले अनावश्यक तत्थ्यों व फोटोग्राफ्स को कम कर सकते हैं
• साप्ताहिक, पाक्षिक व मासिक पत्र - पत्रिकाएं
ऐसे पत्र - पत्रिकाओं के लिए रिपोर्टर का काफी वक्त मिलता है और आन्दोलन से सम्बन्धित तमाम सूचनाए - तत्थ्य देने के साथ साथ वह आन्दोलन की पृष्ठभूमि, उसकी सफलता, असफलता, उसके कारणों आदि पर भी व्यापक प्रकाश डाल सकता है। इस तरह से वह एक शोधपरक आलेख तैयार कर सकता है। रिपोर्ट को आकर्षक बनाने हेतु तस्वीरों, प्रभावशाली शीर्षक और ग्राफिक्स के साथ साथ आन्दोलन से तारतम्य रखने वाली पैंटिंग या रेखाचित्रों का भी इस्तेमाल किया जा सकता है। जहां दैनिक समाचार पत्रों में समयाभाव एवं स्थान के अभाव के कारण खबरों में सिर्फ तत्थ्य (हार्ड न्यूज) दिये जाते है वहीं साप्ताहिक, पाक्षिक व मासिक पत्र पत्रिकाओं में, आन्दोलनों की व्याख्या और विश्लेषण के लिए पर्याप्त समय व स्थान होता है
• इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के लिए
सामाजिक आन्दोलनों की रिपोर्टिंग के सन्दर्भ में इलेक्ट्रॉनिक मीडिया खासकर टेलीविजन की सबसे बड़ी खासियत यह है कि उसमें रिर्पोटर की प्रस्तुति के साथ ही कैमरामैन का दृष्टिकोण भी महत्वपूर्ण होता है। रिपोर्टर अगर स्वयं ही कैमरामैन है तो अच्छी बात है । अगर नहीं है तो यह जरूरी है कि उसके साथ एक सही विजन वाला कैमरामैन हो क्योंकि संवेदनशीलता एवं सही दृष्टिकोण के साथ कैमरे में कैद किये दृश्य अपने आप ही बहुत कुछ बोल देते हैं। टीवी रिर्पोटिंग में दृश्यों के जरिए आंदोलन की पीड़ा की अभिव्यक्ति अधिक आसानी से की जा सकती है लेकिन रिर्पोटर को यहां भी तत्थ्यों के सही होने पर अधिक ध्यान देना जरूरी है।
रेडियो के लिए रिर्पोटिंग करते समय ध्वनियों (एम्बिएंस) का इस्तेमाल जरूर किया जाना चाहिए। मसलन किसी आंदोलन की रिर्पोट की प्रस्तुति में अगर आन्दोलन स्थल पर आन्दोलनकारियों की नारेबाजी, उनके जनगीत आदि भी शामिल कर लिए जाएं तो रिपोर्ट अधिक सजीव लगती है।
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