निर्धारण मापनी का उपयोग, सीमायें, परिसीमाएं एवं सुझाव - Uses, Limitations and Suggestions of Assessment Scale
निर्धारण मापनी का उपयोग, सीमायें, परिसीमाएं एवं सुझाव - Uses, Limitations and Suggestions of Assessment Scale
निर्धारण मापनी का उपयोग एवं सीमायें
निर्धारण मापनी के
निम्नलिखित उपयोग होते हैं.
1. मानकीकृत
मनोवैज्ञानिक परीक्षणों के द्वारा संकलित सूचनाओं के पूरक के रूप में निर्धारण
मापनी का उपयोग किया जाता है।
2. जब हमें
अल्प अवधि में ही अत्यधिक छात्रों तथा अत्याधिक विषयों में सूचनायें एकत्र करनी हो
तो निर्धारण मापनी का उपयोग होता है।
3. जब किसी
व्यक्ति विशेष का गहन अध्ययन करना हो तथा मानवीकृत उपकरण उपलब्ध न हो तो समय श्रम
और धन की बचत करने हेतु इस प्रविधि का निर्माण करके इसका प्रयोग किया जाता है।
4. व्यक्ति
अध्ययन की अन्य विधियों के पूरक के रूप में भी यह विधि सहायक रहती है।
निर्धारण मापनी की परिसीमाएं :
निर्धारण मापनी की निम्न
सीमाएं हैं
1. निर्धारण
मापनी के द्वारा जो आंकड़े प्राप्त होते हैं वे तब तक विश्वसनीय नहीं होते हैं जब
तक निर्धारक मापन के उद्देश्य को स्पष्ट रूप से न समझता हो ।
2. निर्धारक
में विशेष दक्षता की आवश्यकता होती है।
3. निर्धारकों
का विचार होता है कि किसी व्यक्ति में कोई भी गुण पूर्णतः उपस्थित तथा अनुपस्थित
नहीं रहता। अतः वह उसको मध्य में स्थान दे देता है। उसका निर्णय निष्पक्ष नहीं हो
पाता है।
4. निर्धारकों
द्वारा किये गये मूल्यांकन में अन्तर पाया जाना स्वाभाविक है क्योंकि उनकी निर्णय
योग्यता तथा बुद्धि आदि में अन्तर होता है। निर्णायकों की रूचियां अनुभव तथा
व्यक्तित्व के गुण तथा योग्यता आदि में अन्तर होने से उनकी निर्णय शक्ति में भी
अन्तर आ जाता है।
निर्धारण मापनी के उन्नयन
हेतु सुझाव :
निम्न उपायों से निर्धारण
मापनी का उन्नयन किया जा सकता है।
1. पदों की
संख्या निश्चित करना सबसे पहला कार्य है। यदि संख्या कम है तो निर्णायक को सूक्ष्म
भेद करने का अवसर नहीं मिलता है। यदि इनकी संख्या अधिक कर दी जाये तो निर्णायक इन
सबका उपयोग नहीं कर पाता।
2. जिन
कथनों को सम्मिलित किया जाए वे वस्तुनिष्ठ रूप से परिभाषित होने चाहिए।
3. निर्णायक
को उस व्यक्ति के गुणों का विभिन्न परिस्थितियों में अवलोकन करने का भी अवसर मिलना
चाहिए।
4. निर्णायक को इसका प्रयोग करने के निर्देश स्पष्ट होने चाहिए।
साक्षात्कार एवं
आत्मनिष्ठ विधि हैं। जिसमें उद्देश्य को केन्द्र में रखकर दूसरे व्यक्ति से
वार्तालाप किया जाता है तथा इस प्रक्रिया से प्राप्त सूचनाओं का अनुसन्धान कार्य
में उपयोग किया जाता है। जबकि मापनियों का प्रयोग व्यक्ति में उपस्थित गुणों की
मात्रा, तीव्रता
या बारम्बारता को जानने के लिये किया जाता है। इस इकाई में साक्षात्कार के विभिन्न
प्रकारों साक्षात्कारकर्ता के गुणों तथा
वार्तालाप में शामिल हों