राष्ट्रीय शिक्षा नीति 1986 - National Policy on Education 1986
राष्ट्रीय शिक्षा नीति 1986 - National Policy on Education 1986
वर्ष 1986 में राष्ट्रीय शिक्षा नीति की घोषणा हुई। इस नीतिगत दस्तावेज को निम्नलिखित नौ अध्यायों में बाँटा गया -
• भूमिका
• सामान्य मान्यताएं
• शैक्षिक अवसरों की समानता
• शैक्षिक प्रक्रिया
• विभिन्न स्तरों पर शिक्षा का पुनर्गठन
• तकनीकी और प्रबंध शिक्षा
• प्राथमिकता के क्षेत्र
• संसाधन एवं पुरावलोकन
• भविष्य
इस नीति की प्रमुख बातें निम्नानुसार हैं-
• सभी के लिए शिक्षा उद्देश्य रखा गया। शिक्षा को वर्तमान और भविष्य के लिए अद्वितीय पूँजी निवेश माना गया
• 10+2+3 शिक्षा पद्वति को स्वीकार किया गया
• अंग्रेजी और हिंदी के साथ क्षेत्रीय भाषाओं के विकास पर बल
• शैक्षिक अवसरों में क्षेत्रीय असंतुलन दूर करना
• शैक्षिक शोध एवं विकास तथा विज्ञान और
• तकनीकी शिक्षा के क्षेत्र में उल्लेखनीय प्रयास करना
• प्राथमिक शिक्षा का सार्वजनिकीकरण, प्रौढ़ साक्षरता आदि के लिए संसाधन उपलब्ध कराना
• मुक्त व दूर शिक्षा के कार्यक्रमों पर बल
• स्त्री शिक्षा पर जोर
• शिक्षा के विभिन्न स्तरों पर समान सुविधाएं उपलब्ध कराना
• अल्पसंख्यकों की शिक्षा पर ध्यान देना
• संचार माध्यमों एवं शैक्षिक प्रौद्योगिकी का प्रयोग बढ़ाना
• सतत एवं व्यापक मूल्याकन
• अध्यापक शिक्षा में समग्र परिवर्तन एवं सुधार की आवश्यकता पर जोर
• परीक्षा सुधार
• प्राथमिक विद्यालयों में आवश्यक मूलभूत सुविधाएं उपलब्ध कराना
• निःशुल्क नवोदय विद्यालय खोले जाएं।
• तकनीकी एवं प्रबंध शिक्षा को महत्वपूर्ण स्थान दिया जाए।
राष्ट्रीय शिक्षा नीति 1986 एक महत्वपूर्ण दस्तावेज है जिसने भारत के शैक्षिक वातावरण को एक नवीन दिशा प्रदान की। इस नीति ने नवोदय विद्यालय, अकादमिक स्टॉफ कॉलेज, डायट (डीआईईटी) जैसी आधारभूत संरचनाओं को जन्म दिया जो आज भी जारी हैं। भारत के शैक्षिक इतिहास में यह नीति आज भी बहुत महत्वपूर्ण है। इस बीच राष्ट्रीय शिक्षा नीति की समीक्षा के लिए 1990 में आचार्य राममूर्ति की अध्यक्षता में एक समीक्षा समिति, तथा 1993 में प्रो. यशपाल की अध्यक्षता में एक समिति का गठन किया गया। 1992 में इस नीति में कुछ सुधार किए गए और एक कार्ययोजना (प्लान ऑफ एक्शन 1992) बनायी गयी। संशोधित नीति में एक ऐसी राष्ट्रीय शिक्षा प्रणाली तैयार करने का प्रावधान है जिसके अंतर्गत शिक्षा में एकरूपता लाने, प्रौढशिक्षा कार्यक्रम को जनांदोलन बनाने, सभी को शिक्षा सुलभ कराने, बुनियादी (प्राथमिक शिक्षा की गुणवत्ता बनाए रखने, बालिका शिक्षा पर विशेष जोर देने, देश के प्रत्येक जिले में नवोदय विद्यालय जैसे आधुनिक विद्यालयों की स्थापना करने, माध्यमिक शिक्षा को व्यवसायपरक बनाने, उच्च शिक्षा के क्षेत्र में विविध प्रकार की जानकारी देने और अंतर अनुशासनिक अनुसंधान करनेराज्यों में नए मुक्त विश्वविद्यालयों की स्थापना करने, अखिल भारतीय तकनीकी शिक्षा परिषदको सुदृढ़ करने तथा खेलकूद, शारीरि शिक्षा, योग को बढ़ावा देने एवं एक सक्षम मूल्यांकन प्रक्रिया अपनाने के प्रयास शामिल हैं। इसके अलावा शिक्षा में अधिकाधिक लोगों की भागीदारी सुनिश्चित करने हेतु एक विकेंद्रीकृत प्रबंधन ढांचे का भी सुझाव दिया गया है। इन कार्यक्रमों के कार्यान्वयन में लगी एजेंसियों के लिए विभिन्न नीतिगत मानकों को तैयार करने हेतु एक विस्तृत रणनीति का भी पीओए में प्रावधान किया गया है।
एनपीई द्वारा निर्धारित राष्ट्रीय शिक्षा प्रणाली एक ऐसे राष्ट्रीय पाठ्यक्रम ढांचे पर आधारित है जिसमें अन्य लचीले एवं क्षेत्र विशेष के लिए तैयार घटकों के साथ ही एक समान पाठ्यक्रम रखने का प्रावधान है। जहां एक ओर शिक्षा नीति लोगों के लिए अधिक अवसर उपलब्ध कराए जाने पर जोर देती है, वहीं वह उच्च एवं तकनीकी शिक्षा की वर्तमान प्रणाली को मजबूत बनाने का आह्वान भी करती है। शिक्षा नीति शिक्षा के क्षेत्र में कुल राष्ट्रीय आय का कम से कम 6 प्रतिशत धन लगाने पर भी जोर देती है।
वर्ष 2009 में मुफ्त एवं अनिवार्य शिक्षा का अधिकार अधिनियम पारित किया गया। इस अधिनियम की प्रमुख विशेषताएं हैं -
• 6 से 14 वर्ष के वर्ग के सभी बच्चों/बच्चियों के लिए मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा।
• प्राथमिक शिक्षा पूर्ण होने तक किसी भी बच्चे बच्ची को रोका नहीं जायेगा, न ही निष्काषित किया जायेगा और न ही बोर्ड परीक्षा हेतु अग्रेषित किया जायेगा।
• यदि 6 वर्ष से अधिक उम्र का बच्चा/बच्ची किसी भी स्कूल में भर्ती नहीं हुआ हुई है या जो भर्ती हैं, उसने अपनी प्राथमिक शिक्षा पूर्ण नहीं की है, तो वे अपनी उम्र के अनुसार उचित कक्षा में भर्ती किये जायेंगे और यदि कोई बच्चा/बच्ची अपनी उम्र के अनुसार प्रवेश लेता/ लेती है, तो वह संबंधित शिक्षा पाने का हकदार होगा/ होगी।
• प्राथमिक शिक्षा हेतु प्रवेश लेने के लिए बच्चे बच्ची की उम्र का निर्धारण जन्म प्रमाण पत्र के आधार पर, जो कि जन्म, मृत्यु और विवाह पंजीकरण अधिनियम, 1856 के प्रावधानों के अनुसार हो या संबंधित अन्य दस्तावेज, जो प्रमाणित कर सकते हों, उनके आधार पर किया जायेगा। उम्र प्रमाण पत्र न होने की स्थिति में बच्चे / बच्ची को प्रवेश से वंचित नहीं किया जायेगा।
• प्राथमिक शिक्षा पूर्ण करने वाले बच्चे बच्ची को एक प्रमाण पत्र आवंटित किया जायेगा।
• शिक्षक की स्थिति का आंकलन शिक्षक विद्यार्थी अनुपात के आधार पर किया जायेगा।
• न्यूनतम 25 प्रतिशत सुविधाहीन तथा कमजोर वर्ग के बच्चों / बच्चियों के प्रवेश, सहायता रहित निजी स्कूलों में कक्षा 1 में किये जायें।
• अच्छी गुणवत्ता वाली शिक्षा प्रदान की जाये।
• स्कूल शिक्षक को पांच साल के भीतर पेशेवर डिग्री प्राप्त करना बंधनकारक होगा अन्यथा वे नौकरी खो देंगे।
• स्कूल का बुनियादी ढांचा तीन वर्ष में उन्नत किया जायेगा।
• वित्तीय भार राज्य और केन्द्र शासन के बीच बांटा जायेगा।
वार्तालाप में शामिल हों