व्यक्तित्व के उपागम - Approaches to Personality

व्यक्तित्व के उपागम - Approaches to Personality

व्यक्तित्व के उपागम - Approaches to Personality


प्रारूप उपागम


इस उपागम में व्यक्तित्व के प्रारूप ज्लचमूद्ध समानताओं के आधार पर व्यक्तित्व का वर्गीकरण किया जाता है। ग्रीक चिकित्सक हिप्पोक्रेट्स लोगों को उनके शरीर में उपस्थित फ्लूइड के आधार पर चार प्ररूपों में वर्गीकृत किया है- उत्साही (पीला पित्त), श्लैष्मिक (कूफ), विवादी (रक्त) तथा कोपशील (काला पित्त)। इन द्रवों की प्रधानता के आधार पर प्रत्येक प्ररूप विशिष्ट व्यवहारपरक विशेषताओं वाला होता है।


शीलगुण उपागम शीलगुण उपागम में व्यक्तित्व की व्याख्या व्यक्ति के शीलगुणों के आधार पर की जाती है। शीलगण उपागम व्यक्तित्व का निर्माण करने वाले मूल तत्वों की खोज करते हैं। लोगों में मनोवैज्ञानिक गुणों में भिन्नता पायी जीती है। इन्हीं भिन्नताओं को आधार मानकर ऑलपोर्ट और कैट्रेल ने अपने अपने सिद्धान्त प्रस्तुत किये। ऑलपोर्ट ने शीलगुणों को तीन वर्गों में वर्गीकृत किया प्रमुख शीलगुण, केंद्रीय शीलगुण तथा गौण शीलगुण । प्रमुख शीलगुण सामान्य प्रवृत्तियाँ होती है। ये प्रवृत्तियाँ उस लक्ष्य को दर्शाती हैं, जिसके इर्दगिर्द ही व्यक्ति का सम्पूर्ण जीवन व्यतीत होता है। जैसे- मदर टेरेसा का सेवाभाव और हिटलर का नाजीवाद इत्यादि। कम व्यापक किंतु फिर भी सामान्य प्रवृत्तियों केंद्रीय गुण मानी जाती हैं। जैसे इमानदार, मेहनती आदि । व्यक्ति के सबसे कम सामान्य गुणों के रूप में गौण शीलगुण जाने जाते हैं। जैसे- मैं सेब पसंद करता हूँ' अथवा 'मैं अकेले घूमना पसंद करता हूँ इत्यादि ।


मनोविश्लेषणात्मक उपागम


इस उपागम का प्रतिपादन सिगमण्ड फ्रायड द्वारा किया गया था। फ्रायड एक चिकित्सक थे और उन्होंने अपना सिद्धांत अपने पेशे के दौरान ही विकसित किया। उन्होंने मानव मन को चेतना के तीन स्तरों (चेतन, पूर्वचेतन और अचेतन) के रूप में विभक्त किया है। प्रथम स्तर चेतन होता है जिसमें वे चिंतन, भावनाएँ और क्रियाएँ आती हैं जिनकी जानकरी लोगों को रहती है। द्वितीय स्तर पूर्वचेतना होता है जिसमें वे मानसिक क्रियाएँ आती हैं जिनकी जानकारी लोगों को तभी होती है जब वे उन पर ध्यान केंद्रित करते हैं। चेतना का तृतीय स्तर अचेतन होता है जिसमें ऐसी मानसिक क्रियाएँ आती हैं जिनकी जानकारी लोगों को नहीं होती है।


फ्रायड ने व्यक्तित्व की संरचना के तीन तत्व बताये हैं- इदम् या डूड अहं और पराहम इदम असमन्वित सहज प्रकृति है, जो सुख के सिद्धान्त पर आधारित होता है। अहं सुनियोजित होता है, जो वास्तविकता के सिद्धान्त पर आधारित होता है और पराहम पूर्णता को प्रदर्शित करता है, नैतिकता पर आधारित होता है।


फ्रायड ने रक्षा युक्तियों के बारे में विस्तार से बताया है। रक्षा युक्तियाँ वास्तविकता को विकृत कर दुश्चिंता को कम करने का माध्यम है। रक्षा युक्तियों में सबसे महत्वपूर्ण दमन है, जिसमें दुश्चिंता उत्पन्न करने वाले व्यवहारों और विचारों को पूरी तरह चेतना के स्तर से विलुप्त कर देते हैं। दमन करते समय उन्हें इसका ज्ञान भी नहीं रहता है। कुछ और युक्तियाँ रक्षा प्रक्षेपण, प्रतिक्रिया निर्माण और युक्तिकरण, इत्यादि हैं।










नव-फ्रायडवादी उपागम


नव-फ्रायडवादीयों में युंग, होर्नी एडलर एरिक्सन आदि का नाम महत्वपूर्ण है। सबसे पहला नाम युंग को आता है। पहले युंग ने फ्रायड के साथ ही काम किया किंतु बाद में वे फ्रायड से अलग हो गए। यंग के अनुसार मनुष्य काम भावना और आक्रामकता स्थान पर उद्देश्यों और आकांक्षाओं से अधिक निर्देशित होते है। उन्होंने व्यक्तित्व का अपना एक सिद्धांत प्रतिपादित किया जिसे विश्लेषणात्मक मनोविज्ञान कहते हैं।


फ्रायड के अनुयायियों में युंग के बाद दूसरा नाम होनी का आता है। ये आशावादी दृष्टिकोण को मानने वाले थे। उनके अनुसार माता-पिता बच्चे के प्रति यदि उदासीनता, हतोत्साहित करने और अनियमिता का व्यवहार करते हैं तो बच्चे के मन में एक असुरक्षा की भावना विकसित होती है जिसे मूल दुश्चिंता कहते हैं। एकाकीपन और असुरक्षा की भावना के कारण बच्चों के स्वीस्थ्य के विकास में बाधा होती है।


एडलर ने वैयक्तिक मनोविज्ञान का सिद्धान्त प्रस्तुत किया। इसके अनुसार व्यक्ति उद्देश्यपूर्ण एवं लक्ष्योन्मुख व्यवहार करता है। एडलर के अनुसार हर एक व्यक्ति हीनता से ग्रसित होता है। एक अच्छे व्यक्तित्व के विकास के लिए इस हीनता की भावना का समाप्त होना अति आवश्यक है। एरिक्सन ;म्तपोवद्ध ने व्यक्तित्व विकास में तर्कयुक्त चिन्तन एवं सचेतन अहं पर बल दिया है। उनके अनुसार विकास एक जीवन भर चलने वाली प्रक्रिया है और अहं अनन्यता का इस प्रक्रिया में केन्द्रीय स्थान है।



व्यवहारवादी उपागम


यह उपागम् उद्दीपक-अनुक्रिया के आपसी तालमेल के आधार पर अधिगम और प्रबलन को महत्व देता है। व्यवहारवादियों के अनुसार पर्यावरण के प्रति व्यक्ति की अनुक्रिया के आधार पर उसके व्यक्तित्व को अच्छी तरह से समझा जा सकता है। व्यवहारवार के प्रमुख सिद्धांतों में पावलव द्वारा दिया गया प्राचीन अनबंधन, स्किनर द्वारा दिया गया नैमित्तिक अनुबंधन और बड़ेरा द्वारा दिया गया सामाजिक अधिगम सिद्धांत मुख्य हैं। व्यवहारवार के इन प्रमुख सिद्धांतों का व्यक्तित्व विकास विश्लेषण में बहतीयत से प्रयोग हुआ है। प्राचीन एवं नैमित्तिक अनुबंधन सिद्धांतों में संज्ञानात्मक प्रक्रियाओं का कोई स्थान नहीं है, जबकि सामाजिक अधिगम सिद्धांत में संज्ञानात्मक प्रक्रियाओं को प्रमुख स्थान दिया गया है।


मानवतावादी उपागम


मानवतावादी उपागम में रोजर्स त्वहमते और मैस्लो इंसवूद्ध के सिद्धांत प्रमुख हैं। रोजर्स ने आत्म मसुद्धि पर अधिक बल दिया है। जिसमें उन्होंने वास्तविक आत्म तमंस मुसद्धि और आदर्श आत्म पकमस मसदि की चर्चा की है। प्रत्येक व्यक्ति का एक आदर्श आत्म होता है जिसको प्राप्त करने के लिए वह हमेशा तत्पर रहता है। आदर्श आत्म वह आत्म होता है जो कि एक व्यक्ति बनाना चाहता है। जब वास्तविक आत्म और आदर्श आत्म समान होते हैं तो व्यक्ति प्रसन्न रहता है और दोनों प्रकार के आत्म के बीच विसंगति के कारण प्रायः अप्रसन्नता और असंतोष की भावनाएँ उत्पन्न होती हैं। उनके अनुसार प्रत्येक व्यक्ति में अपनी अन्तः शक्तियों को पहचानने और उसी के अनुरूप व्यवहार करने की विशेष क्षमता होती है। व्यक्तित्व विकास के लिए संतुष्टि एक अभिपेरक शक्ति का कार्य करती हैं। लोग अपनी क्षमताओं और प्रतिभाओं को उत्कृष्ट तरीके से अभिव्यक्त करने का प्रयास करते हैं।