समाज कार्य के मूल प्रत्यय - Basic Concepts of Social Work
समाज कार्य के मूल प्रत्यय - Basic Concepts of Social Work
1. व्यक्ति का प्रत्यय
जान्सन का मत है कि समाज कार्य व्यक्ति के अन्तर्निहित महत्व, सत्यनिष्ठा तथा गरिमा के प्रति आस्था रखता इस प्रत्यय को ध्यान में रखकर कार्यकर्ता सम्बन्ध स्थापित करता है तथा समस्या समाधान करने का प्रयास करता है। कार्यकर्ता यह विश्वास भी रखता है कि व्यक्ति समग्रता में प्रतिक्रिया करता है तथा उसकी बाहय एवं आन्तरिक परिस्थितियां भिन्न भिन्न होती है। अतः उनका व्यवहार भी भिन्न भिन्न होता है। उसके वैयक्तिक मूल्य महत्वपूर्ण होते हैं और वह संपूर्ण पर्यावरण के प्रति प्रतिक्रिया करता है। उसको अपना निर्णय लेने का अधिकार होता है। समाज कार्य में इन्हीं बिन्दुओं को महत्वपूर्ण माना जाता है तथा ये ही समाज कार्यकर्ताओं द्वारा किए जाने वाले कार्य का मार्ग निर्देशन करते हैं।
2. व्यवहार का प्रत्यय
व्यवहार का तात्पर्य व्यक्ति के वाह्य पर्यावरण के प्रति किये गये प्रत्युत्तर से है। व्यक्ति पर्यावरण के साथ समायोजन करने के लिए प्रत्युत्तर करता है। प्रत्येक क्षण व्यक्ति को आन्तरिक तथा वाहय प्रेरक, आवश्यकताएं तथा सामाजिक पर्यावरण प्रभावित करते हैं जिसके कारण उस पर दबाव पड़ता है। फलतः उसे तनाव व चिंता की अनुभूति होती है। इस चिंता को कम करने के लिए तथा तनाव को हटाने के लिए व्यक्ति जो कार्य करता है उसे व्यक्ति का व्यवहार कहा जाता।
3. समस्या का प्रत्यय
जब एक व्यक्ति पहले से सीखी हुई आदूतों, सम्प्रेरणाओं तथा नियमों की सहायता से उद्देश्य पर पहुंच नहीं पाता है, तब समस्या की स्थिति उत्पन्न होती है। समस्या उस सयम भी उत्पन्न होती है जब व्यक्ति एक उद्देश्य तो रखता है परन्तु यह नहीं जानता है कि उस उद्देश्य को कैसे प्राप्त किया जाये। समस्या किसी एक या एक से अधिक आवश्यकता से सम्बन्धित होती है जो व्यक्ति के जीवन में व्यवधान एवं कष्ट उत्पन्न करती है। समस्या किसी दबाव शारीरिक, मनोवैज्ञानिक, सामाजिक के रूप में भी हो सकती है जो सामाजिक भूमिका पुरी करने में बाधा उत्पन्न करती है। समस्या के अनेकानेक तथा इसकी प्रकृति गत्यात्मक होती हैं। यह सदैव श्रृंखलाबद्ध रूप में प्रतिक्रिया करती है। कोई भी समस्या जिससे व्यक्ति ग्रसित होता है वस्तुगत वाहूय तथा विषयगत आन्तरिक दोनों प्रकार से महत्वपूर्ण होती है। समस्या के वाहय तथा आन्तरिक तत्व ने केवल एक साथ घटित होते हैं बल्कि इनमें से कोई भी एक दूसरे का कारण हो सकता है। समस्या की प्रकृति कैसी भी हो लेकिन सेवार्थी की प्रतिक्रियाओं की प्रभाव समस्या समाधान पर अवश्य पड़ता है।
समाज कार्यकर्ता में समस्या समाधान के लिए निम्न योग्यताएं होनी आवश्यक होती हैं।
समस्या के तथ्यों का पूर्ण ज्ञान
समस्या के सभी तत्वों के अन्तर्सम्बन्धों का ज्ञान
तत्वों को व्यवस्थित करने की योग्यता तथा विकास की गति का ज्ञान
परिस्थिति का उच्च प्रत्यक्षीकरण
पूर्व अनुभवों का उचित उपयोग
सम्प्रेरणाओं की जटिलता तथा इनके प्रकार का ज्ञान
समाज कार्य का दृढ़ विश्वास है कि समस्या सभी व्यक्तियों को किसी न किसी रूप में प्रभावित करती है। परन्तु जो व्यक्ति समाधान कर लेता है वह सेवार्थी नहीं बनता। अतः समाधान करने की क्षमता का विकास व्यक्ति में सन्निहित है।
4. सम्बन्ध का प्रत्यय
सम्बन्ध एक प्रत्यय है जो मौखिक अथवा लिखित वार्तालापों में प्रकट होता है जिसमें दो या दो से अधिक व्यक्ति लघुकालीन, दीर्घकालीन, स्थायी अथवा अस्थायी सामान्य अभिरुचियों एवं भावनाओं के साथ अन्तःक्रिया करते हैं। सामाजिक एवं सांवेगिक होने के नाते मनुष्य दूसरों के साथ सम्बन्धों, उनकी वृद्धि एवं विकास को प्रभावित करते हैं। इसके साथ ही उसका सम्पूर्ण समायोजन भी उसकी परिधि क्षेत्र में आ जाता है। बीस्टेक ने सम्बन्ध के इन तत्वों का उल्लेख किया है। भावनाओं का उद्देश्यपूर्ण प्रगटन, नियंत्रित सांवेगिक भागीकरण, स्वीकृति, वैयक्तीकरण, अनिर्णायक मनोवृत्ति, आत्म निश्चयीकरण तथा गोपनीयता ।
5. भूमिका का प्रत्यय
सामाजिक सांस्कृतिक व्यवस्था में व्यक्ति अपनी आयु, लिंग, जाति, व्यक्तिगत योग्यता के आधार पर जिस स्थिति को प्राप्त करता है उसे उसकी प्रस्थिति कहा जाता है और प्रस्थिति के संदर्भ में सामाजिक परम्परा, प्रथा, नियम एवं कानून के अनुसार कार्य करने होते हैं, वह उसकी भूमिका होती है। लिंटन का मत है कि प्रत्येक स्थिति का एक क्रियापक्ष होता है, इस क्रिया पक्ष को ही भूमिका कहते हैं। अपनी स्थिति का औचित्य सिद्ध करने के लिए व्यक्ति को कुछ करना होता है, उसी को भूमिका कहा जाता है। जब व्यक्ति की प्रेरणायें एवं क्षमतायें उसकी अपेक्षित भूमिका के अनुकूल नहीं होती हैं तो उसका अनुकूलन नहीं हो पाता है और उसे वाहय सहायता की आवश्यकता होती है।
6. अहं का प्रत्यय
अहं मस्तिष्क का वह भाग है जिसके द्वारा व्यक्ति अपना मानसिक सन्तुलन बनाये रखता है। व्यक्ति में ऐसी अनेक मूल प्रवृत्तियां होती हैं। जो सन्तुष्ट होने के लिए चेतन में आने का प्रयत्न करती हैं, परन्तु अ ऐसा करने से रोकता है क्योंकि उन्हें सामाजिक स्वीकृति प्राप्त नहीं होती है। अहं की शक्ति की असफलता की अवस्था में व्यक्ति अतार्किक एवं अचेतन सुरक्षात्मक उपायों का प्रयोग अहं की सुरक्षा के लिए करता है। इस प्रकार की युक्तियों द्वारा व्यक्ति अपने व्यवहार को तार्किक बनाता और समाज द्वारा अस्वीकृत उत्प्रेरकों को सही मानता है। वह अहं की रक्षा के लिए प्रक्षेपण, प्रतिगमन, अस्वीकृति, स्थानापन्न, प्रतिक्रिया, निर्माण आदि युक्तियों का प्रयोग संचेन रूप से करता है।
कार्यकर्ता सेवार्थी के समाज दवारा स्वीकृत अनुकूलन के ढंगों तथा अतार्किक सुरक्षात्मक उपायों द्वारा अनुकूलन में अन्तर स्पष्ट करता है। वह सेवार्थी की अहं शक्ति का मूल्यांकने करता है तथा वर्तमान स्थितियों को सेवार्थी की दृष्टि से मूल्यांकन करता है। कार्यकर्ता अहं की कार्यप्रणाली तथा कार्यात्मकता के अध्ययन तथा निदान द्वारा सेवार्थी की शक्ति, विचार पद्धति, प्रत्यक्षीकरण, मनोवृत्ति आदि की जानकारी प्राप्त करता है। इस ज्ञान के आधार पर उसे चिकित्सा प्रक्रिया निश्चित करने में सुविधा होती है।
7. अनुकूलन का प्रत्यय
व्यक्ति को दो कारणों से तनावपूर्ण स्थिति का अनुभव होता है।
पहले अपनाए गए तथा अभ्यस्त ढंगों के द्वारा परिवर्तित स्थिति की मांगों से सम्बन्धित भूमिकाओं का प्रतिपादन न हो पाना ।
व्यक्तिगत सम्प्रेरणाओं एवं क्षमताओं में परिवर्तन होने की स्थिति में पहले की भूमिकाओं को पूरा करने में व्यक्तिगत असन्तुलन होना।
व्यक्ति तनावपूर्ण स्थिति से तीन प्रकार से अनुकूलन करता है:
प्रयोग में लाए गए तथा पूर्व निश्चित ढंगों के उपयोग द्वारा।
कल्पना की उड़ान द्वारा।
उदासीनता, मानसिक उन्मुखता, प्रत्याहार, अगतिमानता अथवा अतिसक्रियता द्वारा।
व्यक्ति सबसे पहले अपनी समस्या का समाधान अपने पहले प्रयोग में लाए गए दंगों एवं प्रयुक्त प्रविधियों द्वारा करने का प्रयत्न करता है। यदि इस प्रकार समस्या का समाधान नहीं होता है तो वह या तो संघर्ष करता है या अपने को उस स्थिति के अनुकूल बना लेता है अथवा उस स्थिति से दूर होने का प्रयत्न करता है। यदि ये तरीके भी असफल हो जाते हैं तो वह समस्या के प्रति उदासीन होकर मानसिक रोगी बन जाता है।
समाज कार्य सेवार्थी की अनुकूलन करने की प्रविधियों की शक्तियों, क्षमताओं, प्रभावों आदि को महत्व देता है। सेवार्थी में अनुकूलन करने की क्षमता सामाजिक पर्यावरण से समायोजन करने की स्थिति को प्रभावित करती है। वह यह निश्चित करता है कि सेवार्थी तनावूपर्ण स्थिति को किस प्रकार सुलझाने का प्रयत्न करता है तथा अपने प्रयत्नों को किस सीमा तक परिवर्तित करता है, और उसकी कठिनाई एवं समस्या को कितनी जल्दी दूर किया जा सकता है। कार्यकर्ता यह जान लेने के पश्चात दो प्रकार का प्रयत्न करता है, वह या तो व्यक्ति की आन्तरिक शक्तियों को सम्बल प्रदान करते हुये अनुकूलन सम्भव बनाता है या फिर सामाजिक परिस्थिति में ही परिवर्तन लाने का प्रयास करता है।
इस प्रकार से समाज कार्य क्षेत्र अभ्यास से पूर्व आपको निम्लिखित जानकारी को समझ कर क्षेत्र कार्य अभ्यास के लिए पूर्व तैयारी कर लेनी चाहिए। जिससे आपको रिपोर्ट लेखन में आसानी होगी। आगे आपको क्षेत्र कार्य के प्रारूपों से अवगत कराया जायेगा।
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