व्यक्तित्व के जैविक और वातावरणीय कारक - Biological and environmental factors of personality
जैविक कारक
जैविक कारक वस्तुतः वे कारक होते हैं जो व्यक्ति में आनुवंशिक या जन्मजात होते. हैं। ऐसे प्रमुख कारकों में प्रथम कारक व्यक्ति की शारीरिक संरचना एवं स्वास्थ्य है। प्रायः देखा गया है कि शारीरिक संरचना से संबंधित सभी शीलगुण वंशानुगत होते हैं। जिन बच्चों के माता-पिता लंबे कद के होते हैं उनका कद भी लंबा होता है, और जिन बच्चों के माता पिता नाटे कद के होते हैं उनका कद भी नाटा होता है। माता पिता के सांवले और गोरे होने पर, उनके बच्चे भी सांवले और गोरे होते हैं। व्यक्ति के इन शारीरिक शीलगुणों तथा स्वास्थ्य का प्रभाव उसके व्यक्तित्व पर भी पड़ता है। जो लोग शारीरिक रूप से स्वस्थ और संदर होते हैं उनमें आत्मविश्वास, सामाजिकता और उत्तरदायित्व का विकास होता है। इसके विपरीत जिन लोगों में इन शीलगुणों की कमी होती है, उनके हीन भावना से ग्रस्त होने की संभावना बढ़ जाती है।
वातावरणीय कारक
व्यक्तित्व विकास सिर्फ जैविक कारकों से ही नहीं प्रभावित होता है, बल्कि वातावरण से संबंधित कारक भी व्यक्तित्व विकास को प्रभावित करते हैं। वातावरणीय कारकों को तीन भागों में विभक्त किया जा सकता है सामाजिक, सांस्कृतिक और आर्थिक कारकू। व्यक्ति एक सामाजिक वातावरण में निवास करता है। सामाजिक कारकों में माता-पिता, संगी-साथी इत्यादि प्रमुख हैं। मनोवैज्ञानिकों का मानना है जरूरत से अधिक लाइ-प्यार देने पर बच्चे में असुरक्षा की भावना का विकास हो जाता है वही समय की कमी के कारण उचित प्यार भी अपने बच्चों को नहीं दे पाते हैं। अधिक सख्ती से पेश आने पर बच्चे में अधीनस्थता का गुण विकसित हो जाता है, उचित प्यार न मिल पाने के कारण बच्चे सांवेगिक रूप से अस्थिर हो जाते हैं। परिवार के सदस्यों का आपसी संबंध अच्छा होने पर बच्चे भी अपने बड़ों की भांति स्वयं को दाल लेते हैं। जिसके फलस्वरूप उनमें आत्मविश्सास, विश्वसनीयता और श्रेष्ठता की भावना विकसित हो जाती है। दूसरी तरफ वे परिवार जो झगडालू होते हैं उनमें पलने वाले बच्चों मे हीन भावना, सावेगिक अस्थिरता और अन्तर्मुखता के गुण पायें जाते हैं। जन्मक्रम का भी व्यक्तित्व के विकास पर प्रभाव पड़ता है।
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