सिंधु सभ्यता की भाषा, लिपि एवं पतन - Language, Script and Decline of Indus Civilization
सिंधु सभ्यता की भाषा, लिपि एवं पतन - Language, Script and Decline of Indus Civilization
सिन्धु सभ्यता की भाषा-लिपि एवं सभ्यता के पतन के बारे में जानकारी दी जायेगी।
सिन्धु सभ्यता के लगभग 1000 से अधिक स्थलों का अबतक उत्खनन हो चुका है और उत्खनित स्थलों से 2000 से अधिक मुहरों की प्राप्ति हुई है। इन मुहरों कुछ मृद्भाण्डों और धौलावीरा से प्राप्त 10 बड़े अभिलेखों में हमें सिन्धु सभ्यता की लिपि के प्रमाण मिलते हैं। इन पुरावशेषों में सांकेतिक लिपि चिहनों में कोई भाषा लिखी गयी हैं। भाषा और लिपि की अनभिज्ञता के कारण हम अभी तक सिन्धु सभ्यता के प्रारंभिक ज्ञान तक ही सीमित हैं।
हमें कोई रोसेंट्टा स्टोन की भांति का द्वि-भाषी अभिलेख मिल जाये तो
हम सिन्धु सभ्यता के विषय में उनके जीवन दर्शन के बारे में और अनेकानेक बातों के
बारे में जानकारी पा सकेंगे । अभी तो हमें यह भी नहीं पता कि इस सभ्यता का अंत
कैसे हुआ उनके समक्ष क्या चुनौतियां थीं। पुरावशेषों के अध्ययन एवं विश्लेषण
द्वारा विद्वानों ने इन प्रश्नों का उत्तर देने का प्रयास किया है।
सिन्धु सभ्यता की भाषा एवं लिपि
सिन्धु लिपि की उत्पत्ति के संबंध में अभी आधिकारिक रूप से कुछ भी
कहना प्रासंगिक नहीं है; संभवतः भविष्य की खोज ही इस विषय में सम्यक प्रकाश
डाल पायेगी। यहां पर इस विषय को समझने में आपको प्रख्यात विद्वान डेविड डिरिंगर का
कथन महत्वपूर्ण हो सकता हैं। डिरिंगर के अनुसार सिन्धु सभ्यता की लिपि सांकेतिक थी,
किन्तु यह स्थापित करना अत्यंत कठिन है कि यह स्थानीय थी या बाहर से
लायी गयी थी। इस लिपि और कीलाक्षर लिपि तथा प्राचीन एलमाइट लिपियों की पूर्वज लिपि
में कोई संबंध रहा होगा लेकिन यह स्थापित करना कठिन है कि यह संबंध क्या था ।
सिन्धु लिपि, अद्ध-सांकेतिक लिपियों के परिवार से संबंधित
प्रतीत होती है। इसमें 400 500 विभिन्न चिहन हैं, लेकिन मूल चिहन 62 है और शेष उन्हीं के परिवर्तित
रूप हैं। परिवर्तित रूप मूल चिह्नों या अक्षरों में मात्रा या अद्ध-अक्षर या अन्य
अक्षर को जोड़कर बनाये गये लगते हैं। उदाहरण के लिए मीन या मछली चिहन से अनेक
प्रकार के सरल और क्लिष्ट अक्षर बने मिलते हैं। कुछ मुद्राओं से ऐसा लगता है कि यह
लिपि दारों से बायें लिखी जाती रही होगी।
लिपि का उत्पत्ति
अनेक विद्वानों ने सिन्धु लिपि की उत्पत्ति के विषय में प्रकाश डालने
का प्रयास किया है। सर जॉन मार्शल, रैवरेण्ड हैरस जैसे विद्वानों
सिन्धु सभ्यता का तादात्मीकरण विद सभ्यता से स्थापित करने का सुझाव देते हैं।
रेवरेण्ड हैरस तो सिन्धु लिपि को बायें से दायें पढ़ते हैं और उसे तमिल भाषा का
पूर्व रूप बतलाते हैं। विद्वान पुरालिपिशास्त्री बैंडल ने अपनी पुस्तक दि इण्डो
सुमेरियन सील्स डिसाइफई में सिन्धु लिपि का संबंध सुमेर की भाषा और लिपि के साथ
स्थापित करने का प्रयास किया है। बैंडल का मानना है कि चौथी सहस्राब्दी ईसापूर्व
में सुमेरियाइयों ने सिन्धु घाटी में अपना एक उपनिवेश स्थापित कर लिया था और वहां
अपनी भाषा तथा लिपि को भी प्रचलित किया। विश्व की प्राचीनतम लिपियों में वस्तुतः
अपनी चिहन-सांकेतिक प्रवृत्तियों के कारण पर्याप्त एकरूपता दृष्टिगोचर होती है।
सिन्धु लिपि और मिस कीट सुमेर आदि देशों की लिपियों में यह एकरूपता स्वाभाविक है,
वर्तमान साक्ष्यों के प्रकाश में यह कहना कठिन है कि सिन्धु
नागरिकों ने अपनी लिपि सुमेर से प्राप्त की थी या सुमेर के लोगों ने अपनी लिपि
सिन्धु घाटी से।
लिपि पढ़ने का प्रयास
वर्तमान तक सिन्धु लिपि पढ़ी नहीं जा सकी है, इस संबंध में सभ्यता के 20वीं सदी के तीसरे दसक में प्रकाश में आने के बाद से ही प्रयास प्रारंभ हो चुके थे लेकिन प्रायः 90 वर्ष बीत जाने पर भी सिन्धु लिपि एक पहेली बनी है। इस बारे में खोज करने पाले प्रायः सभी विद्वानों का मानना है कि इस लिपि का अनुवाद करने के लिए उपयुक्त साधन अभी तक प्राप्त नहीं हो सके हैं। पुरालिपिशास्त्रियों को आवश्यकता है: एक द्विभाषी अभिलेख की, जिसमें एक भाषा का हमें पूर्ण ज्ञान हो या फिर एक ऐसे लंबे शिलालेख की प्राप्ति हो जिसमें कुछ महत्वपूर्ण भाग बारबार प्रयुक्त हों। अभी तक हमें जो भी अभिलेख मिले हैं वे छोटे हैं और उनमें औसत रूप से केवल छह अक्षर हैं सबसे लंबा शिलालेख भी जो मिला है उसमें केवल 17 अक्षर हैं।
पिछले कुछ वर्षों में फिनिश रिसर्च टीम रूसी भारतविद् तथा एस. आर.
राव द्वारा सिन्धु लिपि को पढ़े जाने का दावा प्रस्तुत किया गया लेकिन ये सभी दावे
आशंकाओं को परिपूर्ण नहीं कर पाये और अभी भी सिन्धु भाषा और लिपि एक अबूझ पहेली
बनी हुई है।
सिन्धु सभ्यता का पतन
लिपि की अनभिज्ञता के कारण हम स्पष्ट रूप से यह नहीं कह सकते कि
सिन्धु सभ्यता का पतन किन कारणों से हुआ लेकिन उत्खनन के फलस्वरूप जो तथ्य प्रकाश
में आये उनके आधार पर इस सभ्यता के पतन के लिए जिम्मेदार कारणों का विश्लेषण
विद्वानों ने किया है। इनके अन्तर्गत विद्वानों ने सिन्धु सभ्यता के पतन में
आत्मघाती कमजोरियों का योगदान, आर्यों का उत्तरदायित्व, विदेशी
तत्वों की भूमिका और प्राकृतिक आपदाओं के योगदान को शामिल किया है। इन कारणों को
अध्ययन की सुविधा के लिए शीर्षकवार समझा जा सकता है।
सिन्धु सभ्यता का पतन
सिन्धु नागरिकों की आत्मघाती कमजोरियां
1. सुमेर के साथ व्यापारिक संबंध के बावजूद भी सिन्धु नागरिकों ने किसी भी प्रकार के तकनीकी ज्ञान को सीखने का प्रयास नहीं किया, जो कि प्रत्येक विकासशील सभ्यता के लिए आवश्यक हैं।
2. हड़प्पा नागरिकों की मानसिक स्थिरता का पता उनकी लिपि से लगता है, जिसमें 20 चिन्हों से अधिक नहीं मिलते हैं और बहुधा 10 चिन्हों से अधिक प्रयोग नहीं किया गया है।
ये कुछ उदाहरण हैं जो सिन्धु सभ्यता में गति या बदलती हुई
परिस्थितियों के साथ सामन्जस्य बैठाने में असमर्थता के दोष को बतलाती हैं। सिन्धु
नागरिकों ने अपनी रक्षा के विषय में कोई विशेष आविष्कार नहीं किये थे, यही कारण
है कि जब उनपर आक्रमण हुआ तो वे अपने से अविकसित लोगों से भी पराजित हो गये।
सिन्धु सभ्यता का पतन
आर्यों का उत्तरदायित्व
आर्यों ने भारत आगमन से पूर्व अनेक नगरीय संस्कृतियों को क्षति पहुंचायी थी। इन्द्र ने हरियूपिया के ध्वंसावशोषों को समाप्त किया था, ऋग्वेद में यह उल्लेख प्राप्त है कि इन्द्र ने अनेक नदियों को मुक्त किया था, जो कि कृत्रिम अवरोधको द्वारा रोकी गयी थी।
अगर इस विचार को मान लिया जाय तो आयो ने सिन्धु नागरिकों द्वारा सिन्धु नदी पर खड़े किये अवरोधकों को समाप्त कर सैंधव्यों को भूखे मरने को छोड़ दिया।
ऋग्वेद में सौ स्तभों वाले शत्रु के किलों का वर्णन है, जिनसे कि आर्यों का मुकाबला हुआ। इसके अलावा ऋग्वेद में लिंग पूजकों के भय का भी वर्णन है। इन तथ्यों के बावजूद भी सिन्धु सभ्यता के पतन में आर्यों का उत्तरदायित्व सन्देहास्पद प्रतीत होता है, क्योंकि यदि हड़प्पा को आयो द्वारा ध्वंस या समाप्त किया गया तथा कब्रिस्तान "एच"" को आय से संबंधित किया जाये तो यह तार्किक दृष्टि से अटपता लगता है कि हड़प्पा के समीप ही स्थित कालीबंगन पर आक्रमण नहीं किया गया। इसके अलावा सरस्वती और पंजाब क्षेत्र की अनेक हड़प्पीय बस्तियां, इन्द्र और अग्नि के आक्रमण के पूर्व ही पतनोन्मुख हो चुकी थीं। और यह जात है कि काली चमड़ी वाले लोग अन्य स्थानों को पलायन कर गये थे। पुरातात्विक सामग्री से भी यह प्रमाणित होता है कि नवागंतुकों द्वारा इन स्थानों को अधिगृहित नहीं किया गया। वरन इन्हें त्याज्य समझ कर छोड़ दिया गया। यह अजीब है कि कोई इन स्थानों की जीतकर इन्हें अधिकृत न कर छोड़ दें।
सिन्धु सभ्यता का पतन
विदेशी तत्वों की भूमिका
विदेशी तत्वों की भूमिका के बलूचिस्तान में भी मिलते हैं बलूचिस्तान
के आक्रामकों ने वहां के ग्रामीण लोगों को सिन्धु नगरों में शरण लेने पर बाध्य
किया। विदेशी तत्वों का प्रभाव और उनके द्वारा सिन्धु नगरों में उत्पन्न अस्थिरता
का पता कुछ तथ्यों से लगता है। हड़प्पा में बाद की बस्तियों की संरचना निकृष्ट
कोटि की है। भवनों के स्थान पर झोपड़ियां बनायी जाने लगीं। जल वितरण प्रणाली को
त्याग दिया गया, मृणभाण्डों के निर्माण में प्रयुक्त तकनीकी
परिवर्तित हो गयी। बाद के आभूषण निम्न स्तर के हैं। शहर के मध्य में और कभी कभी
सड़क के बीच में ईट के भट्टे बनाये जाने लगे। इसी प्रकार के पतनोन्मुख चिन्ह
काठियावाद प्रायद्वीप के स्थलों में भी मिलते हैं। लोथल का अन्य नगरों के साथ
सम्बन्ध धीरे-धीरे कमजोर और फिर टूट गया।
सिन्धु सभ्यता का पतन
प्राकृतिक आपदाएँ
कुछ प्राकृतिक आपदार्य एवं कमजोरियां भी सिन्धु सभ्यता के पतन में जिम्मेदार रहीं थी, यथा
1. सिन्धु सभ्यता के नगरों की बढ़ती जनसंख्या की भोजन आपूर्ति के लिए कृषकों की उत्पादन बढ़ाने में असमर्थता ।
2.सिन्धु सभ्यता के नगरों में लगातार आने वाली बाढ़े ।
3. एक प्रमुख हाइड्रोलोजिस्ट के अनुसार एक टेक्टोनिक किया से समुद्र का जल स्तर उठ गया, जिससे सिन्धु नगर जल स्तर के नीचे आ गये और उनमें बाढ़ आ गयी, मोहनजोदड़ो में जल स्तर के नीचे भी बस्ती के प्रमाण मिलते हैं।
4. सिन्धु का बहाव नील नदी से दुगुना है।
5. मिटटी के लवणीकरण की गति बढ़ना राजपुताना के मरुस्थल का फैलाव तथा सिन्धु नदी द्वारा अपना मार्ग परिवर्तित करना भी ऐसे कुछ कारण हैं जिन्होंने सिन्धु संस्कृति के पतन में योगदान दिया।
सिन्धु सभ्यता का पतन
प्राकृतिक आपदाएँ
कुछ प्राकृतिक आपदार्य एवं कमजोरियां भी सिन्धु सभ्यता के पतन में जिम्मेदार रहीं थी, यथा
1. सिन्धु सभ्यता के नगरों की बढ़ती जनसंख्या की भोजन आपूर्ति के लिए कृषकों की उत्पादन बढ़ाने में असमर्थता ।
2. सिन्धु सभ्यता के नगरों में लगातार आने वाली बाढ़े ।
3. एक प्रमुख हाइड्रोलोजिस्ट के अनुसार एक टेक्टोनिक किया से समुद्र का जल स्तर उठ गया, जिससे सिन्धु नगर जल स्तर के नीचे आ गये और उनमें बाढ़ आ गयी, मोहनजोदड़ो में जल स्तर के नीचे भी बस्ती के प्रमाण मिलते हैं।
4. सिन्धु का बहाव नील नदी से दुगुना है।
5. मिटटी के लवणीकरण की गति बढ़ना राजपुताना के
मरुस्थल का फैलाव तथा सिन्धु नदी द्वारा अपना मार्ग परिवर्तित करना भी ऐसे कुछ
कारण हैं जिन्होंने सिन्धु संस्कृति के पतन में योगदान दिया।
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