भारत में ईसाई धर्म एवं इतिहास चिंतन - Christianity and History in India
भारत में ईसाई धर्म एवं इतिहास चिंतन - Christianity and History in India
प्रारम्भिक ईसाई इतिहास लेखन
ईसाई इतिहास लेखन में 'ओल्ड टैस्टामैन्ट' को ऐतिहासिक स्रोत के रूप में प्रमुख स्थान दिया गया। प्रारम्भिक काल में
ईसाई मतानुयायी यीशू मसीह के शिष्यों और धर्म प्रचारकों द्वारा उनके उपदेशों एवं
उनके कृत्यों के वृतान्त पर निर्भर करते थे परन्तु धीरे-धीरे जब यीशू मसीह के
समकालीन काल के गाल में समाते चले गए तो इस श्रुत परम्परा का स्थान लिखित
दस्तावेजों ने ले लिया। प्रथम तथा दवितीय शताब्दी में लिखित 'गॉस्पल ऑफ मार्क', 'गॉस्पल ऑफ मैथ्यू', 'गॉस्पल ऑफ ल्यूक तथा द्वितीय शताब्दी में लिखित 'गॉस्पल
ऑफ़ जॉन में यीशू मसीह के उपदेशों को ईश्वरीय वचन के रूप में प्रस्तुत किया गया है।
गस्पिल ऑफ मार्क' (रचनाकाल 65-70 ईसवी)
सम्भवतः प्रथम यहूदी रोमन युद्ध के पश्चात लिखी गई थी। "गॉस्पल ऑफ मैथ्यूज
(रचनाकाल 80-85 ईसवी) का लक्ष्य यहूदियों के समक्ष यह बात
रखने का था कि यीशू मसीह ही हमारा मुक्तिदाता मसीहा है और वृह मोजेज से भी महान
है। 'दि गाँस्पल ऑफ ल्यूक (रचनाकाल 85-90 ईसवी) और 'ल्यूक एक्ट्स को सभी गॉस्पल्स में
साहित्यिक दृष्टि से सबसे उत्कृष्ट और कलात्मक माना जाता है। अन्त में 'गॉस्पल ऑफ जॉन (रचनाकाल दूसरी शताब्दी) का उल्लेख आवश्यक है जिसमें यीशू
मसीह को दिव्यवाणी की सन्देश वाहक बताया गया है। इसमें यीशु मसीह स्वयं अपने जीवन
के विषय में और अपने दिव्य अभियान के विषय में विस्तार से बोलते हैं।
प्रारम्भिक ईसाई इतिहास लेखन
जोसेफस
जोसेफस की रचनाओं में यहूदी शासन काल के मैकाबीस, होस्मैनियन राज्यवंश तथा हीरोद महान के उत्थान तथा प्रारम्भिक ईसाई काल की जानकारी उपलब्ध है।
टैसिटस
टैसिटस के इतिवृत्त को हम पहला जात धर्म निरपेक्ष इतिवृत्त कह सकते
हैं। टैसिटस ने नौरो द्वारा ईसाइयों के उत्पीड़न का सजीव चित्रण किया है।
सेक्सटस जूलियस एफ्रीकैनस (180-250 ईसवी) सेक्सटस जूलियस एफ्रीकैनस की 5 खण्डों की पुस्तक क्रोनोग्राफिया को हम तिथि क्रमानुसार वृतान्त की पहली रचना कह सकते हैं। ऍफ्रीकैनस का यह विश्वास है कि यीशू मसीह के 500 वर्ष बाद ही संसार का विनाश हो जाएगा। एफ्रीकैनस ने मूल स्रोतों के स्थान पर मेनेथों, बिरोसस, अपोलोडोरस, जोसेफ़स तथा जस्टस की रचनाओं को आधार बनाकर अपने ग्रंथ की रचना की है। इस दृष्टि से हम एफ्रीकैनस की रचना को मौलिक रचना की श्रेणी में नहीं रख सकते।
यूजिबियस (260-340 ईसवी)
ग्रीको-रोमन परम्परा में बुद्धि व विवेक का सर्वोपरि स्थान था किन्तु
ईसाई इतिहास लेखन की परम्परा में धर्म को सर्वोपरि स्थान दिया गया था। सिर्जेरिया
के निवासी यूजिबियस द्वारा सन् 324 के आसपास रचित प्रथम कलीसियायी इतिहास में लिखिते
स्रोतों का प्रचर मात्रा में उपयोग किया गया। प्रथम शताब्दी से लेकर यजिबियस ने
अपने समय तक ईसाई धर्म के विकास का तिथि क्रमानुसार सिलसिलेवार इतिहास लिखा है।
यूजिबियस की रचनाओं में 'हिस्टॉरिया एक्लेसियास्टिका
डिमॉन्सट्रेशन ऑफ़ी दि गॉस्पल, प्रिपरेशन इवैन्जेलिका,
"डिस्क्रिपेन्सीज बिटवीन दि गॉस्पल्स' तथा
स्टडीज़ ऑफ़ दि बाइबिकल टेक्स्ट' प्रमुख हैं।
सन्त एम्ब्रोज़ (340-497 ईसवी)
सन्त एम्ब्रोज़ ने सन्त अगस्ताइन के विचारों और उनके लेखन पर विशेष प्रभाव डाला था। उनकी रचनाओं में 'फेथ टु वैशियन ऑगस्टस', 'दि होली घोस्ट' तथा 'दि मिस्ट्रीज प्रमुख हैं।
सन्त अगस्ताइन
सन्त अगस्ताइन इतिहासकार, धर्म-विज्ञानी, दार्शनिक शिक्षक एवं कवि थे। 'सिटी ऑफ़ गॉड' उनकी प्रमुख रचना है। सन्त अगस्ताइन का इतिहास लेखन मुख्य रूप से धर्मनिर्पेक्ष एवं धर्मतन्त्रात्मक शक्तियों के मध्य संघर्ष की गाथा है जिसमें कि उन्होंने धर्मतन्त्रात्मक पक्ष का समर्थन किया है। सन्त अगस्ताइन के अनुसार ईश्वरीय आदेश का पालन करने वाले को स्वर्गलोक में वास करने का अधिकार मिलता है जब कि उसकी आज्ञाओं का उल्लंघन करने वाले को नर्क में रहने के लिए अभिशप्त होना पड़ता है। सन्त अगस्ताइन रोमन साम्राज्य के इतिहास का उल्लेख करते हुए यह बतलाते हैं कि उसका उत्थान प्रभु की कृपा के कारण हुआ किन्तु उसका पतन कालान्तर में पाप, अन्याय व अनैकिता के कारण अर्थात् ईश्वरीय आदेश की अवज्ञा के कारण हुआ। दृष्टान्त देते हुए सन्त अगस्ताइन के इतिहास लेखन की सबसे बड़ी केमी यह है कि वहे घटनाओं को तोड़-मरोड़कर उनका प्रस्तुतीकरण इस प्रकार करते हैं कि उनका अपना मन्तव्य सिद्ध हो जाए। इन कमियों के बावजूद उनके ग्रंथ 'सिटी ऑफ गॉड' को प्लैटो के ग्रंथ रिपब्लिक, सर टॉमर्स रो के ग्रंथ 'उटोपिया' तथा बैकन के ग्रंथ 'अटलान्टिस' के समकक्ष रखा जाता है।
सन्त अगस्ताइन के परवर्ती ईसाई इतिहासकार
पॉलस ओरोसियस ( 380-420 ईसवी)
सन्त अगस्ताइन के शिष्य और इतिहास लेखन में उनके अनुयायी पॉलस ओरोसियस की मान्यता है कि विभिन्न समुदायों के भाग्य ईश्वर द्वारा ही निर्धारित होता है। ओरोसियस की सर्वाधिक महत्वपूर्ण पुस्तक सेवेन बुक्स ऑफ़ हिस्ट्री अर्गेन्स्ट दि पैगन्स' की रचना सन् 411-418 के मध्य हुई थी। इस ग्रंथ में मानव की सृष्टि से लेकर गॉलों द्वारा रोम के विनाश तक का इतिहास है।
सन्त जेरोम (347-420 ईसवी)
सन्त जेरोम ने सन 391 में पूर्व काल के 135 लेखकों के जीवन वृतान्त वाली पुस्तक 'दि विरिस इल्यस्ट्रिबस सिवे दि स्क्रिप्टोरिबस, एक्लेसियास्ट्रिक्स की रचना की थी। उसकी अन्य रचनाओं में 'लाइफ ऑफ पॉल', 'दि फ़र्स्ट हेरमिट तथा 'वल्गेट' प्रमुख हैं।
मार्क औरेलियस कैसीडोर (480-570 ईसवी)
इटली के निवासी मार्क ऑरेलियस कैसीडोर की रचनाओं 'वेराय',
'हिस्ट्री ऑफ़ गोय' तथा 'हिस्टोरिया टिपार्टिया में ऑस्ट्रोगोथ काल के राजनीतिक एवं सांस्कृतिक
जीवन की झांकी मिलती है।
वेनरेबिल बेडे (672-735 ईसवी)
देनरेबिल बेड़े ने 'एक्लेसियास्टिकल हिस्ट्री ऑफ़ इंग्लिश पीपुल में
जूलियस सीज़र के कालू से लेकर सन् 735 तक इंग्लैण्ड के
धार्मिक एवं राजनीतिक इतिहास का वर्णन किया है।
ईसाई इतिहास लेखन की विशिष्टताएं
इतिहास में ईश्वरीय इच्छा की महत्ता
ईसाई इतिहास लेखन की परम्परा में घटनाएं उस रूप में नहीं देखी गई, जिस रूप
में वो घटित हुईं बल्कि उन घटनाओं को एक दैवीय आवरण पहना कर उन्हें ईश्वरीय इच्छा
के रूप में प्रस्तुत किया गया। ईसाई धर्मावलम्बी इतिहास चिन्तकों की दृष्टि में
ब्रह्माण्ड में होने वाली हर घटना के पीछे ईश्वर की इच्छा होती है।
ऐतिहासिक बलों की दैविक प्रकृति
ईसाई इतिहास लेखन की परम्परा में प्रकृति का भौतिक विकास महत्वपूर्ण
नहीं है क्योंकि इसमें इतिहास को मनुष्य और ईश्वर के बीच सम्बन्धों का एक प्रवाह
माना गया है। ईसाई इतिहास लेखन की परम्परा में इतिहास को एक नाटक माना गया है।
ईसाई इतिहास लेखन में तिथिक्रम तथा काल विभाजन
ईसाई इतिहास चिन्तकों ने विविध तिथिपरक घटनाओं के लिए ईसा के जन्म का प्रतिमान प्रस्तुत किया। उन्होंने केवल ईसाई तिथिक्रम को ही अपने समस्त ऐतिहासिक वृतान्तों के लिए पर्याप्त एवं परिपूर्ण माना है। घटनाओं का काल निर्धाण करने के लिए उनका मापदण्ड केवल 'यीशू मसीह के जन्म से पूर्व' और 'उनके जन्म के पश्चात का ही है। ईसाई इतिहास लेखन के आधार स्रोत के रूप में बाइबिल की महत्ता
ईसाई धर्म में बाइबिल की केन्द्र-बिन्दु के रूप में महत्ता, ईसाई इतिहाकारों के लेखन में भी प्रतिबिम्बित होती है। शास्त्रीय युग के इतिहासकारों के विपरीत ईसाई इतिहाकारों ने अपने लेखन में मौखिक स्रोतों की तुलना में लिखित स्रोतों को अधिक वरीयता प्रदान की।
ईसाई इतिहास लेखन के गुण
प्राचीन दस्तावेज़ों एवं अभिलेखों का संरक्षण
ऐतिहासिक क्रमबद्धता
धार्मिक, राजनीतिक एवं सामाजिक इतिहास को महत्व
इतिहास लेखन की मुस्लिम परम्परा पर ईसाई इतिहास लेखन का प्रभाव
ईसाई इतिहास लेखन के दोष
1.इतिहास को एक दैविक योजना के रूप में देखने की हठवादी प्रवृत्ति
2. आलोचनात्मक दृष्टिकोण का अभाव
3: इतिहास लेखन की आदर्श तकनीक की उपेक्षा
4. सामाजिक एवं आर्थिक कारकों की उपेक्षा
5. ऐतिहासिक स्रोतों के वर्गीकरण की दोषपूर्ण प्रणाली
सारांश
प्रथम शताब्दी में लिखित 'गॉस्पल ऑफ मार्क', 'गॉस्पल ऑफ मैथ्यू', 'गॉस्पल ऑफ़ ल्यूक तथा 'गॉस्पल ऑफ़ जॉन में यीशु मसीह के उपदेशों को ईश्वरीय वेचन के रूप में
प्रस्तुत किया गया। जोसेफस, टैसिटस, एफ्रीकैनस
(क्रोनोग्राफिया' का लेखक) यूजिबियस (हिस्टोरिया
एक्लेसियास्टिका' तथा स्टडीज़ ऑफ़ दि बाइबिकल टेक्स्ट का
लेखक तथा सन्त एम्ब्रोज प्रारम्भिक ईसाई लेखन का प्रतिनिधित्व करते हैं। मध्ययुगीन
ईसाई इतिहास लेखन की परम्परा के प्रमुख प्रतिनिधि संत अगस्ताइन हैं जिन्होंने कि
ऐतिहासिक लेखन में दैवीय घटनाओं को प्रमुखता दी है। सिटी ऑफ गॉड उनकी प्रमुख रचना
है। सन्त अगस्ताइन के परवती ईसाई इतिहासकारों में पॉलस ओरोसियस, सन्त जेरोम, मार्क औरेलियस कैसीडोर, तथा वेनरेबिल बेड़े प्रमुख हैं। ईसाई इतिहास लेखन की विशिष्टताओं में
इतिहास में ईश्वरीय इच्छा की महता, ऐतिहासिक बलों की दैविक
प्रकृति, इतिहास लेखन में तिथिक्रम तथा काल विभाजन इतिहास
लेखन के आधार-स्रोत के रूप में बाइबिल की महत्ता सम्मिलित हैं। ईसाई इतिहास लेखन
में इतिहास को एक दैविक योजना के रूप में देखने की हठवादी प्रवृत्ति, आलोचनात्मक दृष्टिकोण का अभाव, इतिहास लेखन की आदर्श
तकनीक की उपेक्षा, सामाजिक एवं आर्थिक कारकों की उपेक्षा तथा
ऐतिहासिक स्रोतों के वर्गीकरण की दोषपूर्ण प्रणाली प्रमुख दोष कहे जा सकते हैं।
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