संप्रेषण और सामाजिक विपणन - Communication and Social Marketing
संप्रेषण और सामाजिक विपणन - Communication and Social Marketing
संप्रेषण किसी संस्था में एक सर्वाधिक आवश्यक तत्व होता है। प्रभावी प्रशासन के सभी पक्षों के लिए दक्ष संप्रेषण अनिवार्य है। स्टाफ को योजनाओं, पद्धतियों, अनुसूचियों समस्याओं, घटनाओं और प्रगति के बारे में पर्याप्त और उपयुक्त तरीके से जानकारी दी जानी चाहिए। यह आवश्यक है कि निर्देशों ज्ञान और सूचना का इस्तेमाल करने के लिए इन्हें सभी को बताया जाना चाहिए, जिससे कि किसी भी प्रकार की गलत व्याख्या और भ्रम न हो। उपयुक्त और पर्याप्त संप्रेषण मात्र एक दिशा में नहीं होता, यह द्विमार्गी होता है। सम्प्रषेण नीचे से ऊपर की ओर तथा ऊपर से नीचे की ओर क्रियान्वित होना चाहिए। संस्था में, संप्रेषण के अनेक प्रकार होते हैं और प्रत्येक संप्रेषण के अपने लाभ और हानियाँ होती हैं। संप्रेषण को संप्रेषित और प्राप्त करने की विधियाँ है मौखिक, लिखित (यथा पत्र, ज्ञापन, कार्यसूची, मैनुअल, हैंडबुक, समाचारपत्र, पत्रिकाएं आदि) और अन्य संप्रेषण (बोले गए शब्दों का संयोजन और मीडिया का इस्तेमाल जैसे पोस्टर, लिप चार्ट, पावर प्वाइंट प्रस्तुतिकरण आदि)। संगठन में, संप्रेषण को आयामों के तीन समूहों में श्रेणीबद्ध किया जाता है -
• अधोगामी संप्रेषण अर्थात वरिष्ठों से अधीनस्थों की ओर संप्रेषण जो योजनाओं, कार्यक्रमों, प्रक्रियाओं, नियमों से संबन्धित होता है और जो आदेश सुझाव, सलाह, सूचना, विवरण, स्पष्टीकरण प्राप्ति के रूप में हो सकता है।
• उर्ध्वगामी संप्रेषण अर्थात् यह अधीनस्थों से वरिष्ठों की ओर होता है तथा यह सूचना प्रतिपुष्टि प्रदान करने, संदेहों को स्पष्ट करने इत्यादि के रूप में हो सकता है।
• क्षैतिज अथवा पार्श्व संप्रेषण जिसका अभिप्राय विभागों के मध्य अथवा समान पदों में सहकर्मियों के मध्य संप्रेषण से है ।
इसके अलावा, संप्रेषण की पंक्ति की संरचनाएं औपचारिक हो सकती हैं इस प्रकार का संप्रेषण संगठन द्वारा निर्धारित लाइनों के साथ-साथ होता है) और अनौपचारिक हो सकती है (इसे जनप्रवाद भी कहते हैं जो अंतक्रिया की योजनाबद्ध लाइनों के साथ-साथ नहीं होता है) ये सभी अधोगामी, ऊर्ध्वाधर और क्षैतिज संप्रेषण जो संगठन प्रदान करता है और जो संगठनात्मक प्रयोजनों को प्राप्त करने के लिए होते हैं औपचारिक संप्रेषण कहलाते हैं।
सामाजिक विपणन व्यवसायिक विपणन से प्राप्त संकल्पनाओं का इस्तेमाल करते हुए सामाजिक परिवर्तन लाने के लिए तैयार किए गए कार्यक्रमों का नियोजन और कार्यान्वयन है। एन्ड्रीसन (1995) ने सामाजिक विपणन की परिभाषा लक्ष्य समूह के स्वैच्छिक व्यवहार को प्रभावित करने के लिए तैयार किए गए कार्यक्रमों के विश्लेषण, नियोजन, निष्पादन और मूल्याँकन के लिए व्यवसायिक विपणन प्रौद्योगिकियों के अनुप्रयोग के रूप में की है जिससे कि उनके वैयक्तिक कल्याण और उनके समाज के कल्याण में सकारात्मक परिवर्तन किया जा सके। सामाजिक विपणन के सिद्धांतों को पांच 'P' से निरूपित किया सकता है.
• उत्पाद ( Product )
व्यवसायिक विपणन में जहाँ उत्पादन एक मूर्त मद है, वहीं सामाजिक विपणन में, उत्पाद वह व्यवहार अथवा विचार है जिसे प्रचार योजनाकार चाहेंगे कि लक्षित उपभोक्ता इसे अपनाएं उत्पाद एक क्रिया (जैसे बालकों का प्रतिरक्षण करना) अथवा सामग्री मद (जैसे कंडोम) के रूप में सकता है।
• कीमत (Price)
इसमें उत्पाद को 'क्रय करने' से जुड़ी लागतें सम्मिलित होती हैं जो आर्थिक लागत के साथ-साथ मनोवैज्ञानिक लागत (यथा सुरक्षित यौन संबंध के लिए कंडोम खरीदने में लज्जा आदि) और सामाजिक लागत का कुल जोड़ होता है।
• स्थान (Place)
इसमें वितरण माध्यम सम्मिलित हैं जिनका इस्तेमाल लक्ष्य समूहों को उत्पाद मुहैया कराने के लिए किया जाता है। जब कोई उत्पन्न भौतिक मद अंश होता है इसे उपभोक्ता को सरलता से उपलब्ध होना चाहिए (जैसे पान की दुकानों पर कंडोम उपलब्ध होना)।
• संवर्धन (Promotion)
इसमें वे प्रयास शामिल हैं जो यह सुनिश्चित करने के लिए किए गए हैं कि लक्ष्य समूह को अभियान की जानकारी है। इन प्रचार के प्रयत्नों को उस उत्पाद के बारे में सकारात्मक अभिवृत्तियों और प्रयोजनों को संवर्धन करने के लिए किया जाना चाहिए जो व्यवहार परिवर्तन का मार्ग मजबूत कर सके।
• स्थिति निर्धारण (Positioning)
इसका अभिप्राय है, उत्पाद की स्थिति को इस प्रकार निर्धारित करना आवश्यक है जिससे कि लाभ को अधिकतम किया जा सके और लागतों को न्यूनतम किया जा सके। स्थिति निर्धारण, मनोवैज्ञानिक रचना है जो उत्पाद की अवस्थिति को शामिल करता है जो उन अन्य उत्पादों और कार्यकलापों के लिए प्रासंगिक होती हैं जिसके साथ यह प्रतिस्पर्धा करता है। उदाहरणस्वरूप, कंडोम के इस्तेमाल करने से मन में शांति आएगी और यौन संरचित रोगों एच आई. वी. और गर्भधारणा से स्वतंत्रता मिलेगी जबकि कंडोम का इस्तेमाल न करने से सामाजिक और मनोवैज्ञानिक समस्याओं के साथ विभिन्न स्वस्थ्य सम्बन्धी दुष्परिणाम उत्पन्न होंगे।
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