मन का प्रत्यय एवं मनोविज्ञान - Concept and Psychology of Mind

मन का प्रत्यय एवं मनोविज्ञान - Concept and Psychology of Mind

मन का प्रत्यय एवं मनोविज्ञान - Concept and Psychology of Mind

 मन का तात्पर्य

रेबर के अनुसार- "मन का तात्पर्य परिकल्पिक मानसिक प्रक्रियाओं एवं क्रियाओं की सम्पूर्णता से है, जो मनोवैज्ञानिक प्रदत्त व्याख्यात्मक साधनों के रूप में काम कर सकती है। अतः मन की हम मात्र कल्पना कर सकते हैं। इसको न तो किसी ने देखा है और न ही हम इसकी कल्पना कर सकते हैं। "


मन की अवस्थाएँ


मन की अवस्थाओं से तात्पर्य इसके विभिन्न पहलुओं से है। मन आत्मा या व्यक्तित्व के दो पक्ष होते हैं जिन्हें आकारात्मक पक्ष और गत्यात्मक पक्ष कहते हैं-मन के आकारात्मक पक्ष से तात्पर्य जहाँ संघर्षमय परिस्थिति की गत्यात्मकता उत्पन्न होती है मन का यह पहलू वास्तव में व्यक्तित्व के गत्यात्मक शक्तियों के बीच होने वाले संघर्षों का एक कार्यस्थल होता है। मन के गत्यात्मक पक्ष से तात्पर्य उन साधनों से होता है जिसके द्वारा मूल प्रवृत्तियों से उत्पन्न मानसिक संघर्षों का समाधान होता है। यहाँ हम सबसे पहले मन के आकारात्मक पक्ष के बारे में समझेंगे।


मन के आकारात्मक पक्ष


चेतन मन : मन का वह भाग जिसका सम्बन्ध तुरन्त ज्ञान से होता है, या जिसका सम्बन्ध वर्तमान से होता है। जैसे- कोई व्यक्ति लिख रहा है तो लिखने की चेतना है, पढ़ रहा है तो पढ़ने की चेतना है। व्यक्ति जिन शारीरिक और मानसिक क्रियाओं के प्रति जागरूक रहता है वह चेतन स्तर पर घटित होती है। इस स्तर पर घटित होने वाली सभी क्रियाओं की जानकारी व्यक्ति को रहती है। यद्यपि चेतना में लगातार परिवर्तन होते रहते हैं परन्तु इसमें निरन्तरता होती है अर्थात् यह कभी खत्म नहीं होती है।


अर्द्ध चेतन मन


का स् अर्द्धचेतन का तात्पर्य वैसे मानसिक स्तर से होता है। जो वास्तव में में न तो पूरी तरह से चेतन हैं और ही तरह से अचेतन। इसमें वैसी इच्छाएँ, विचार, भाव आ होते हैं। जो हमारे वर्तमान चेतन या अनुभव में नहीं होते हैं परन्तु प्रयास करने पर वे हमारे चैतन मन में आ जाती है। अर्थात् यह मन का वह भाग है, जिसका से है सम्बन्ध ऐसी विषय सामग्री है जिसे व्यक्ति इच्छानुसार कभी भी याद कर सकता है। इसमें कभी-कभी व्यक्ति को किसी चीज को याद करने के लिए थोड़ा प्रयास भी करना पड़ता है। जैसे- अलमारी में रखी किताबों में से जब किसी किताब को ढूँढते हैं और कुछ समय के बाद किताब न मिलने पर परेशान हो जाते हैं। फिर कुछ सोचने पर याद आता है कि वह किताब हमने अपने मित्र को दी थी। अर्थात् अर्द्धचेतन मन चेतन व अचेतन के बीच पुल का काम करता है।









अचेतन मन


हमारे कुछ अनुभव इस तरह के होते हैं जो न तो हमारी चेतना में होते हैं। और न ही अर्द्धचेतना में ऐसे अनुभव अचेतन होते हैं। अर्थात् यह मन का वह भाग है जिसका सम्बन्ध ऐसौ विषय वस्तु से होता है जिसे व्यक्ति इच्छानुसार याद करके चेतना में लाना चाहे तो भी नहीं ला सकता है।


अचेतन में रहने वाले विचार एवं इच्छाओं का स्वरूप कामुक, असामाजिक, अनैतिक तथा घृणित होता है। ऐसी इच्छाओं को दिन-प्रतिदिन के जीवन में पूरा कर पाना सम्भव नहीं है। अतः इन इच्छाओं को चेतना से हटाकर अचेतन में दबा दिया जाता है और वहाँ पर ऐसी इच्छाएँ समाप्त नहीं होती हैं बल्कि समय-समय पर ये इच्छाएँ चेतन स्तर पर आने का प्रयास करती रहती हैं।


फ्रायड ने इस सिद्धान्त की तुलना आइसबर्ग से की है। जिसका 9/10 भाग पानी के अन्दर और 1/10 भाग पानी के बाहर रहता है। पानी के अन्दर वाला भाग अचेतन तथा पानी के बाहर वाला भाग चेतन होता है तथा जो भाग पानी के ऊपरी सतह से स्पर्श करता हुआ होता है वह अर्द्धचेतन कहलाता है।


चेतना अचेतन मन का तुलनात्मक अध्ययन


चेतन मन का वह भाग है जिसका सम्बन्ध तुरन्त ज्ञान से होता है। अर्द्धचेतन मन का वह भागे है जिसका सम्बन्ध ऐसी विषय सामग्री से होता है, जिसे व्यक्ति इच्छानुसार कभी भी याद कर सकता है।"


• चेतन मन का आकार छोटा अर्द्धचेतन मन का आकार उससे बड़ा और अचेतन मन का आकार सबसे बड़ा होता है।


• चेतन मन में केवल वर्तमान अनूभव की स्मृतियाँ रहती हैं परन्तु अचेतन का सम्बन्ध पिछले अनुभव से होता है और अर्द्धचेतन में ऐसे अनुभव से होता है जो पिछली अनुभूतियाँ (अनुभव) तो होती हैं परन्तु आवश्यकता पड़ने पर हम उनका प्रत्यावहन कर सकते हैं ।


चेतन मन का विषय व्यक्त एवं स्पष्ट होता है। अचेतन मन में विषय पूरी तरह से दमित होते हैं और अर्द्धचेतन मन में विषय आंशिक रूप से दमित होते हैं।


मन के गत्यात्मक पहलू


मन के गत्यात्मक पक्ष से तात्पर्य उन साधनों से होता है जिसके द्वारा मूल प्रवृत्तियों से उत्पन्न मानसिक संघर्षों का समाधान होता है। मूल प्रवृत्तियों से तात्पर्य वैसे जन्मजात और शारीरिक उत्तेजन से होता है जिसके द्वारा व्यक्ति के सभी तरह के व्यवहार निर्धारित किये जाते हैं। मूल प्रवृत्तियाँ दो तरह की होती हैं


●जीवन मूल प्रवृत्ति


● मृत्यु मूल प्रवृत्ति



उपाहं से तात्पर्य


• जन्म के समय शरीर की संरचना में जो कुछ भी ) में निहित होता है वह पूर्णतः उपाहं होता है। अर्थात् जन्मजात और वंशानुगत है। तात्कालिक सन्तुष्टि की इच्छाएँ और विचार ही उपाहं की प्रमुख विषय सामग्री है। वातावरण की वास्तविकता से उपाहं का कोई सीधा सम्बन्ध नहीं होता है। इसका नैतिक, तार्किकता, समय, स्थान और मूल्यों आदि से कोई सम्बन्ध नहीं होता है।


अहम् से तात्पर्य


• यह मन के गत्यात्मक पहलू का दूसरा भाग है। यह जन्म के समय बच्चे में मौजूद नहीं होता है बल्कि बाद में विकसित होता है। बालक की आय बढ़ने के साथ-साथ वह वातावरण की वास्तविकता की ओर बढ़ने लगता है। आयु बढ़ने के साथ-साथ वह 'मेरा' और 'मुझे' जैसे शब्दों का अर्थ समझने लगता है। धीरे-धीरे वह समझने लगता है कि कौन सी वस्तु उसकी है और कौन सी वस्तु दूसरों की। यह उपाहं का एक मुख्य भाग है। जो वाय वातावरण के प्रभाव के कारण विकसित होता है।


नैतिक मन से तात्पर्य एवं कार्य


जैसे-जैसे बच्चा बड़ा होता जाता है, वह अपना तादात्म्य माता-पिता के साथ स्थापक यह मनु के गत्यात्मक पक्ष का सबसे अन्तिम भाग है और यह व्यक्तित्व का नैतिक पक्ष है। लगता है और बच्चा यह सीख लेता है कि क्या उचित है और क्या अनुचित है, क्या करने और क्या अनैतिक इसे तरह सीखने से नैतिक मन की शुरुआत होती है। यह आदर्शवादी सिद्धान्त द्वारा निर्देशित और नियंत्रित होता है। बचपन में सामाजीकरण के दौरान बच्चा, माता-पिता द्वारा दिये गये उपदेशों को अपने अहम् में सजोए रखता है और यही बाद मे नैतिक मन का रूप ले लेता है। यहाँ विकसित होकर एक और उपाह की कोमक, आक्रामक एवं अनैतिक प्रवृत्तियों पर रोक लगाता है तो दूसरी ओर अह को वास्तविक एवं यथार्थ लक्ष्यों से हटाकूर नैतिक लक्ष्यों की ओर ले जाता है। नैतिक मन व्यक्ति के कामुक एवं आक्रामक प्रवृत्तियों पर नियंत्रण दमन के माध्यम से करता है। जबकि नैतिक मन दमन का प्रयोग स्वयं नहीं करता है बल्कि वह अहम को दमन के प्रयोग का आदेश देकर ऐसी इच्छाओं पर नियंत्रण करता है और यदि अहम् इस आदेश का पालन नहीं करता है तो व्यक्ति में अनेक दोष भाव उत्पन्न हो जाते हैं।


• यह सामाजिकता तथा नैतिकता का कार्य करता है। यह अहम् के उन सभी कार्यों पर रोक लगाता है जो सामाजिक और नैतिक नहीं है। नैतिक मन का अहम् के प्रति कार्य और व्यवहार वैसा ही होता है जैसा एक बच्चे के प्रति माता-पिता का व्यवहार होता है। अतः नैतिक मन के मुख्य कार्य है


• उपाह के अनैतिक, असामाजिक और कामुक संवेगों पर रोक लगाना।


• अहम के आवेगों को नैतिक और सामाजिक लक्ष्यों की ओर ले जाने की कोशिश करना।


• पूर्ण सामाजिक और आदर्श प्राणी बनाने के लिए प्राणी बनाने के लिए प्रयास करना।










उपाहम, अहम और नैतिक मन में सम्बन्ध


● उपाहं, अहमं और नैतिक मन तीनों का ही सम्बन्ध व्यक्ति के व्यक्तित्व से है और ये तीनों इकाइयाँ गतिशील हैं। उपाहं आनन्द (सुख) सिद्धान्त, अहम् वास्तविकता सिद्धान्त और नैतिक मन आदर्शवादी सिद्धान्त से नियंत्रित होता है। सामान्य व्यक्तित्व में इन तीनों ही अंगों में पर्याप्त मात्रा में मेल पाया जाता है। इन तीनों इकाइयों में जितनी ही खींचातानी होती है, व्यक्ति का व्यक्तित्व उतना ही अधिक असामाजिक हो जाता है और उसके व्यक्तित्व का विघटन उतना ही अधिक होता है। जबकि सामान्य व्यक्तित्व के लिए आवश्यक है कि इन तीनों में आपस में समायोजन बना रहे। जब इन तीनों में कोई एक या दो इकाई अधिक प्रभावशील हो जाती है तो इनमें आपस में समायोजन बिगड़ जाता है। अहम् व्यक्तित्व का केन्द्र होता है। यह उपाहं, नैतिक मन और वातावरण की वास्तविकताओं के बीच समायोजन बनाकर व्यवहार करता है।


उपाहम, अहम और नैतिक मन के बीच समानताएँ एवं विभिन्नताए


फ्रायड के अनुसार एक स्वस्थ सामान्य व्यक्ति में तीनों ही काफी समन्वित ढंग से कार्य करते हैं तथा इसमें किसी प्रकार का संघर्ष नहीं होता इन तीनों में कुछ समानताएँ और भिन्नताएँ भी पायी जाती हैं जो इस प्रकार हैं


समानताएँ


उपाहं, अहम्, नैतिक मन तीनों ही मन के गत्यात्मक पहलू के काल्पनिक भाग हैं जिन्हें अन्य वस्तुओं की भाँति दिखाया नहीं जा सकता है।


• किसी भी मानसिक संघर्ष में तीनों शामिल रहते हैं। अन्तर सिर्फ मात्रा का होता है।


विभिन्नताएँ


• उपाहं बच्चों में जन्म से ही मौजूद रहता है। एक वर्ष के बाद बच्चों में अहं का विकास होता है और जब बच्चा तीन-चार वर्ष का हो जाता है तब वह अपने माता-पिता के साथ सम्बन्ध (तादात्म्य) स्थापित कर लेता है। तथा उनके द्वारा कही गयी बातों को ग्रहण करने लगता है। फलतः बच्चे में नैतिक मने का विकास होने लगता है।


● उपाहं आनन्द सिद्धान्त (सुखवादी) अहम् वास्तविकता सिद्धान्त तथा नैतिक मन आदर्शवादी सिद्धान्त से नियंत्रित होता है।


उपाहं तथा पराहं को वाह्य वातावरण की वास्तविकता से कोई मतलब नहीं होता है जबकि अहम का वाह्य वातावरण की वास्तविकता से सीधा सम्बन्ध होता है।


• उपाहं पूरी तरह से अचेतन होता है जबकि अहम् और नैतिक मन दोनों ही थोड़ा चेतन, थोड़ा अर्द्धचेतन और थोड़ा अचेतन होते हैं।


* अहमं एक समायोजक के रूप में कार्य करता है जबकि उपाहं और नैतिक मन की प्रवृत्ति परस्पर विरोधी होती है।


उपाहं पूरी तरह से अनैतिक होता है जबकि नैतिक मन पूरी तरह से नैतिक होता है।


निष्कर्ष


इस इकाई में आपने मन के सभी पक्षों के बारे में जानकारी प्राप्त की। मन के आकारात्मक पक्षों के अन्तर्गत चेतन, अर्द्धचेतन और अचेतन में से कौन-सा भाग अधिक सक्रिय रहता है। मन के गत्यात्मक पक्ष के अन्तर्गत उपाहं अहम् और नैतिक मन तीनों का ही सम्बन्ध प्रत्येक व्यक्ति के व्यक्तित्व से है और सामान्य व्यक्ति में इन तीनों का ही आपस में मेल पाया जाता है। व्यक्ति इन तीनों के बीच जितना ही अधिक समायोजन का प्रयास करेगा, व्यक्ति का व्यक्तित्व उतना ही अधिक स्थायी होगा।