भारत का संवैधानिक इतिहास - Constitutional History of India
भारत का संवैधानिक इतिहास - Constitutional History of India
संवैधानिक इतिहास को लीगल हिस्ट्री भी कहते है। भारत में इसे विधान-संहिताएँ कहा गया है यथा मनुस्मृति आदि। परिवर्तित सामाजिक परिस्थितियों में विधि-विकास में किस तरह सामंजस्य स्थापित किया है, इसे यही इतिहास बताता है। विधिक इतिहासकारों में ये नाम विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं गमालोबिज, गिक, इहरिंग, बूनर, कोहलर, मेटलैण्ड, ब्लैकस्टोन, पोलक, जैक्स, लास्की, डुगविट, इस्मे, चारमार्ट, बेकारो, होलम्स, विगमोर पाउण्ड आदि।
समाज को नैतिक रूप से नियंत्रित करने के लिए संवैधानिक इतिहास अत्यंत महत्वपूर्ण है। संवैधानिक इतिहास का राजनीतिक इतिहास से पनिष्ट संबंध है। परिवर्तित सामाजिक परिस्थितियों में संवैधानिक इतिहास की उपयोगिता से इन्कार नहीं किया जा सकता। मनुष्य अगर अपने अधिकारों के प्रति जागरूक है तो उसे समाज व राष्ट्र के प्रति अपने कर्तव्यों का भी बोध होना चाहिए और यह सब संवैधानिक इतिहास की सीमाओं में आता है।
प्राचीन भारत में मनु स्मृति एवं विज्ञानेश्वर कृत 'मिताक्षरा' आदि कुछ ऐसे ग्रंथों का सृजन हुआ। जिसमें समाज के लिए कुछ नियम निर्धारित किए गए थे। प्राचीन काल में मनु स्मृति के अलावा याज्ञवल्क्य स्मृति, नारद स्मृति पाराशर एवं बृहस्पति स्मृति भी संवैधानिक इतिहास की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। कालांतर में जैसे-जैसे सामाजिक जटिलताएँ बढ़ती गर्यो, वैसे-वैसे विभिन्न स्मृतियों पर टीकाएँ लिखी गयीं। मनु स्मृति पर मेधातिथी, कुल्लुक एवं गोविन्दराज द्वारा 8वीं शताब्दी से 12वीं शताब्दी के बीच टीकाएँ लिखी गयीं। याज्ञवल्क्य स्मृति पर विज्ञानेश्वर की टीका मिताक्षरा को तो हिंदू कानून का कोड ही कहा जाता है। इस प्रकार हम देखते हैं कि प्राचीन काल से ही राष्ट्र एवं समाज में किसी न किसी रूप में संवैधानिक संस्थाएँ विद्यमान थीं। विश्व के परिप्रेक्ष्य में हमरावी का कोई जस्टनियन कोड, कोड ऑफ नेपोलियन, मैकाले का इंडियन पैनल कोड कार्नवालिस कोड इत्यादि संवैधानिक इतिहास की दृष्टि से महत्वपूर्ण है।
आधुनिक समय में संवैधानिक इतिहास के महत्व को देखते हुए कई विद्वानों ने संवैधानिक इतिहास लेखन में विशेष रुचि दिखाई है। हैलम, कार्निवाल लेविस, अर्सकीन, कावेल, कीथ एवं मैटलैण्ड महोदय ने संवैधानिक इतिहास लेखन के क्षेत्र में महती भूमिका निभाई है। संवैधानिक इतिहास की दृष्टि से ए. बी. कीथ महोदय की कृति 'A Constitutional History of India'. ए. सी. बनर्जी कृत 'Indian Constitutional Documents (3 Vol.), वीरकेश्वर कृत भारत का संवैधानिक विकास एवं राष्ट्रीय आंदोलन. एच. एलेक्जण्डर कृत 'India Since Crips' इत्यादि कृतियाँ काफी महत्वपूर्ण हैं। विश्व परिपेक्ष्य में ब्लैकस्टोन कृत 'Commentries of Law of England भी एक महत्वपूर्ण कृति है।
आज जबकि मनुष्य अपने अधिकारों के प्रति सचेत हो गया है, अपने अधिकारों के बोध एवं कर्तव्यों के दायित्वों को समझने के लिए अब उसकी रुचि संवैधानिक इतिहास की ओर बढ़ रही है। 1.2.5.7 क्षेत्रीय इतिहास
क्षेत्रीय इतिहास से आशय भौगोलिक सीमाओं से बंधे क्षेत्र विशेष के इतिहास से है। इस क्षेत्रीय अर्थात् स्थानीय इतिहास का अपना महत्व है। इसमें संदेह नहीं कि इतिहास एवं संस्कृति के क्षेत्र में क्षेत्रीय इतिहास एवं संस्कृति का अपना महत्व है। भारतीय संस्कृति के बाग को आंचलिक संस्कृति के फूलों ने ही सजाया एवं संवारा है और भारतीय इतिहास की रीढ़ को आंचलिक इतिहास ने ही पुष्ट किया है। इस प्रकार इतिहास के क्षेत्र में हम आंचलिक इतिहास एवं संस्कृति को नकार नहीं सकते। ई एल. हस्लुक का विचार है कि इतिहास के अध्ययन के अंतर्गत स्थानीय इतिहास के कुछ पाठों का समावे अवश्य होना चाहिए जिससे हम उस स्थान विशेष की विस्तृत जानकारी प्राप्त कर सकें और अगर हमारा कस्बा, गाँव या नगर ऐतिहासिक वस्तुओं के लिए प्रसिद्ध है तब तो हमें उसकी संपूर्ण जानकारी होनी ही चाहिए, जैसे
(1) उस मुख्य नगर या क्षेत्र का ऐतिहासिक विकास जिसमें हम रहते हैं।
(2) उस नगर या क्षेत्र के पास-पड़ोस में घटित वे घटनाएँ जिनका राष्ट्रीय महत्व है।
(3) राष्ट्रीय इतिहास के विकास में उस स्थान का योगदान
(4) स्थानीय परंपराएँ एवं रीति-रिवाज, ऐतिहासिक भवन, कला केंद्र आदि से भी परिचित होना चाहिए। जैसे अगर हम सागर (मध्यप्रदेश) में रहते हैं तो मध्यप्रदेश के साथ-साथ सागर का ऐतिहासिक विकास किस प्रकार हुआ, इसका ऐतिहासिक महत्व क्या है तथा इसका राष्ट्रीय इतिहास में क्या योगदान है, ये इतिहासकार के संज्ञान में होनी चाहिए। इस प्रकार क्षेत्रीय इतिहास का अपना महत्व है।
प्रादेशिक इतिहास के अध्येता का केवल ग्रंथालयों अथवा अभिलेखागारों में काम करना पर्याप्त नहीं है। उस प्रदेश की यात्राएँ कर प्रत्यक्ष जानकारी हासिल करनी होती है। इसके लिए सर्वेक्षण प्रणाली का उपयोग कर जानकारी एकत्रित की जा सकती है। इतिहासकार के लिए विस्तृत पठन-पाठन के अलावा चिकित्सक विश्लेषण की वृत्ति एवं ठोस बुनियाद भी आवश्यक है। संबंधित प्रदेशों की विशेषताएँ उजागर करने वाले प्रादेशिक इतिहास बीसवीं सदी के उत्तरार्द्ध में बड़े पैमाने पर लिखे गए। स्थानीय इतिहास प्रादेशिक इतिहास का अधिक सूक्ष्म प्रकार माना जा सकता है। विदर्भ का इतिहास प्रादेशिक इतिहास माने तो नागपुर शहर का इतिहास स्थानीय इतिहास होगा। वस्तुतः प्रादेशिक इतिहास यह संज्ञा कुछ लचीली है। भारत के इतिहास के दृष्टिकोण से देखें तो दक्षिण भारत का इतिहास प्रादेशिक इतिहास होगा, जबकि चेन्नई, बंगलुरु जैसे शहरों के इतिहास स्थानीय इतिहास में शामिल होंगे। वैश्विक इतिहास को (Macro Study) जबकि क्षेत्रीय इतिहास को (Micro Study) कहते हैं।)
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