इतिहास की परिभाषा - definition of history

इतिहास की परिभाषा - definition of history

 इतिहास की परिभाषा - definition of history


विभिन्न विद्वानों ने इतिहास को जिस प्रकार से अलग-अलग अर्थों में लिया है उसी प्रकार उसकी परिभाषाएँ भी भिन्न-भिन्न प्रकार से दी हैं। कुछ लोगों ने इतिहास को एक कहानी, एक ज्ञान, राजनीतिशास्त्र, सामाजिक विज्ञान, विशुद्ध विज्ञान, चिंतन विद्या, अतीत वर्तमान का संलाप एवं भूत भविष्य इत्यादि कहा है तो कुछ ने सभ्यता, संस्कृति, सत्यान्वेषण, उत्पादन, प्रगति आदि से संबोधन करके परिभाषित करने का प्रयास किया है। विद्वानों ने इतिहास को जिन-जिन अर्थों में देखा है, उसी के अनुरूप इतिहास को परिभाषित करने का प्रयास किया है। यही कारण है कि इतिहास की अनंत परिभाषाएँ हो चुकी हैं, पर अभी तक इतिहास की कोई सर्वमान्य परिभाषा निश्चित नहीं की जा सकी है। इसीलिए चार्ल्स फर्थ कहते हैं कि इतिहास को परिभाषित करना बहुत कठिन कार्य है। इतिहास की परिभाषाओं को देखने से यह ज्ञात होता है कि एक ही विद्वान ने इतिहास को भिन्न-भिन्न आधार पर कई प्रकार से परिभाषित करने का प्रयास किया है। चार्ल्स फर्थ ने लिखा है कि इतिहास को परिभाषित करना सरल नहीं है फिर भी विभिन्न इतिहासकारों ने अपने-अपने ढंग से इतिहास की परिभाषाएँ दी हैं जिनका विवरण निम्नानुसार दिया गया है -


परिभाषा क्र. 1- इतिहास एक कहानी है।


जी. एम. ट्रेवेलियन के अनुसार “इतिहास अपने अपरिवर्तनीय अंश में एक कहानी है। फ्रेंच अकादमी ने इस विषय पर विचार प्रस्तुत किया है कि “इतिहास स्मरण योग्य वस्तुओं की कहानी है। " डच इतिहासकार हुइजिंगा ने इतिहास को अतीत की घटनाओं का उल्लेख स्वीकार किया है। एफ. एस. ओलिवर के शब्दों में इतिहासकार को केवल कहानी बतानी चाहिए, इस कहानी के स्वरूप को उपदेश तथा नैतिक विचारों से दुष्कृत नहीं करना चाहिए।


यदि इतिहास को मात्र कहानी ही स्वीकार किया जाए तो इसका स्वरूप और उद्देश्य क्या होना चाहिए। हेनरी पिरेन के अनुसार “इतिहास समाज में रहने वाले मनुष्यों के कार्यों एवं उपलब्धियों की कहानी है।" परंतु यह परिभाषा भी त्रुटिपूर्ण है, क्योंकि समाज में रहने वाले सभी व्यक्तियों के कार्यों एवं उपलब्धियों का उल्लेख इतिहास में नहीं होता है। क्या अशोक अथवा अकबरकालीन इतिहासकारों ने अपने इतिहास में समसामयिक समाज के सभी व्यक्तियों के कार्यों एवं उपलब्धियों का उल्लेख किया है? संभवतः नहीं इतिहास केवल समाज का नेतृत्व करने वाले महत्वपूर्ण व्यक्तियों के कार्यों का वर्णन होता है। इस प्रकार इतिहास को समाज के सभी व्यक्तियों के कार्यों तथा उपलब्धियों की कहानी नहीं स्वीकार किया जा सकता।


रेनियर के अनुसार, “इतिहास सभ्य समाज में रहने वाले मनुष्यों के कार्यों एवं उपलब्धियों का उल्लेख होता है।” सभ्य समाज से अभिप्राय संगठित समाज तथा राज्य और प्रशासन से है। जंगलों में जीवन व्यतीत करने वाले असंगठित मनुष्यों का इतिहास नहीं होता है। प्रत्येक व्यक्ति अपने-अपने ढंग से कार्य करता है। यद्यपि प्रत्येक व्यक्ति का अपना इतिहास होता है इतिहास जिसका जन सामान्य अध्ययन करता है उसमें प्रत्येक व्यक्ति के कार्यों का उल्लेख संभव नहीं है। इतिहास में सभ्य समाज से तात्पर्य संगठित समाज होता है। समाज का नेतृत्व कुछ व्यक्ति करते हैं। इसलिए उनके कार्यों का उल्लेख इतिहास होता है। संगठित समाज द्वारा राज्य का निर्माण होता है। राज्य का शासन शासक द्वारा होता है। इसीलिए यार्क पॉवेल ने इतिहास को राज्य से संबंधित कार्यव्यापार का उल्लेख माना है। उन्होंने सामाजिक राज्य में रहने वाले मानवीय कार्यों एवं उपलब्धियों को इतिहास स्वीकार किया है।












परिभाषा क्र. 2- इतिहास एक सामाजिक विज्ञान है।


चार्ल्स फर्थ ने लिखा है कि इतिहास मानवीय सामाजिक जीवन का वर्णन है। इसका उद्देश्य सामाजिक परिवर्तनों को प्रभावित करने वाले उन सक्रिय विचारों का अन्वेषण है जो समाज के विकास में बाधक अथवा सहायक सिद्ध हुए हैं। इन सभी तथ्यों का उल्लेख इतिहास में होना चाहिए। ए. एल. राउज ने भी इस तथ्य को मान्यता प्रदान करते हुए कहा है कि इतिहास भौगोलिक तथा वातावरण के परिवेश में समाज में रहने वाले मनुष्यों का उल्लेख है। सामाजिक तथा सांस्कृतिक उद्भव एवं विकास मनुष्य तथा पर्यावरण की अंतर्क्रिया की प्रक्रिया होते हैं। मनुष्य भौगोलिक परिस्थिति में कार्य करता है तथा विचार करता है। भौगोलिक परिस्थितियाँ मनुष्य की कार्यक्षमता को प्रभावित करती हैं। समाज तथा संस्कृति का विकास पर्यावरण के परिवेश में होता है। अतः इतिहास अध्ययन के समय भौगोलिक परिस्थितियों तथा वातावरण को भी ध्यान में रखना चाहिए। इसीलिए कहा जाता है कि मंगोलों को लड़ाकू जाति बनाने में भौगोलिक परिस्थितियों का अत्यधिक योगदान रहा है। इसी कारण हेनरी पिरेन ने भी कहा है कि इतिहास अतीत में स्थित मानवीय समाज के विकास का व्याख्यात्मक विवरण है।


 परिभाषा क्र. 3 - इतिहास एक ज्ञान है


चार्ल्स फर्थ के अनुसार, इतिहास ज्ञान की एक शाखा ही नहीं, अपितु एक विशेष प्रकार का ज्ञान है जो मनुष्य के दैनिक जीवन में उपयोगी है। मनुष्य इतिहास का अध्ययन अतीत के उदाहरणों से ज्ञान प्राप्त करने के लिए करता है। प्रथम तथा द्वितीय विश्वयुद्ध का भयावह परिणाम आधुनिक राजनयिकों के समक्ष ऐसे उदाहरण हैं कि कोई भी राष्ट्र परमाणु अस्त्रों द्वारा विनाशकारी विश्वयुद्ध की कल्पना भी नहीं कर सकता है। इतिहास का उद्देश्य अतीत के उदाहरणों द्वारा ऐसी शिक्षा प्रदान करना है जो मनुष्य इच्छाओं और कार्यों का मार्गदर्शन कर सके। इसीलिए अलाउद्दीन खलजी ने सिकंदर की असफलताओं को देखकर विश्व-विजय की योजना का विचार समाप्त कर दिया। अतः वर्तमान में कोई भी राजा, राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री अथवा राष्ट्राध्यक्ष, सिकंदर, नेपोलियन, हिटलर तथा मुसोलिनी का अनुकरण नहीं करना चाहता।


अतः स्पष्ट है कि इतिहास एक ज्ञान है। कॉलिंगवुड तथा क्रोचे ने भी इस तथ्य को मान्यता प्रदान करते हुए कहा है कि ऐतिहासिक ज्ञान मानव-संबंधी ज्ञान का स्रोत है। ऐतिहासिक ज्ञान मानवविज्ञान का सर्वश्रेष्ठ रूप है। कॉलिंगवुड की भी यही अवधारणा है कि इतिहास एक अद्वितीय प्रकार का ज्ञान है तथा यह मानव के संपूर्ण ज्ञान का स्रोत है। अतः इतिहास को ज्ञान माना जा सकता है।



परिभाषा क्र. 4- संपूर्ण इतिहास


 केवल विचारों का इतिहास है कॉलिंगवुड का कथन है कि “संपूर्ण इतिहास विचारधारा का इतिहास होता है।" मनुष्य का कार्य विचारपूर्ण होता है इतिहास में विचार को प्रधानता देने का अभिप्राय यह है कि विचार ही मानवीय कार्यों का मूलस्रोत तथा उद्गमस्थल है। मानवीय कार्यों के पीछे विचार प्रेरक शक्ति होती है। इतिहास के व्यक्तियों के कार्यों एवं उपलब्धियों का अध्ययन करने के पहले उनके विचारों का अध्ययन अत्यंत आवश्यक होता है। इस प्रकार विचारों का अध्ययन कार्यों के अध्ययन को सुगम तथा बोधगम्य बनाता है। डिल्थे ने इस मत का समर्थन किया है कि इतिहास वर्तमान में अतीतकालिक ज्ञान का अध्ययन है।



इतिहासकार ऐतिहासिक व्यक्ति के विचारों की पुनरावृत्ति कर अतीत का पुर्ननिर्माण करता है। यही विचारों का इतिहास होता है जिसका अनुभव इतिहासकार कर सके अथवा जो इतिहासकार के मस्तिष्क में पुनर्जीवित हो सके। रेनियर का भी कथन है कि इतिहास सभ्य समाज में रहने वाले मनुष्यों के अनुभवों की कहानी है। अतः मनुष्यों के भूतकालिक विचारों को ही इतिहास माना जा सकता है।


वर्तमान में यह अवधारणा विद्वानों के बीच विवाद का विषय बनी हुई है। प्रो. वाल्श के अनुसार, • इतिहास विचारधारा नहीं होता। प्रायः दैवी प्रकोप, बाढ़, भूकम्प, अनावृष्टि तथा अतिवृष्टि मानवीय विचार के विपरीत परिणाम देते हैं। इस प्रकार, दैवी प्रकोप के समक्ष मानवीय विचार प्रधान न होकर अस्तित्वहीन प्रतीत होने लगता है। हीगेल तथा कार्ल मार्क्स ने भी इस तथ्य को स्वीकार किया है कि अंतर्निहित शक्तियाँ प्राय: मानवीय इच्छा के विपरीत परिणाम देती हैं। यदि इतिहास में विचार ही प्रधान होता तो संभवतः असफलताओं का इतिहास ही नहीं होता अथवा मनुष्य कभी असफल होता ही नहीं। इससे यह स्पष्ट हो जाता है कि यदि इतिहास विचारों का इतिहास है और यदि प्रत्येक विचार स्वरूपतः ऐतिहासिक होता है तो मुहम्मद तुगलक की योजनाएँ असफल नहीं होतीं। नेपोलियन की रूस विजय योजना भी असफल नहीं होती। अतः संपूर्ण इतिहास को केवल विचारों का इतिहास नहीं कहा जा

सकता।


परिभाषा क्र. 5- इतिहास भूतकाल के अनुभव का वर्णन है।


प्रो. जे. बी. ब्यूरी का कथन है कि इतिहास विज्ञान है, न कम और न अधिक। अधिकांश वैज्ञानिक विधा में आस्थावान इतिहासकारों ने विज्ञान की नवीन उपलब्धियों से प्रभावित होकर, यह कहना प्रारंभ कर दिया कि विज्ञान की उपलब्धियों ने मानव समाज की धार्मिकता अतंरिक्ष संबंधी रूढ़िवादी अवधारणाओं को समाप्त कर नवीन चेतना को जागृत किया है। यदि वैज्ञानिक विधाओं का समुचित प्रयोग इतिहास अध्ययन में किया जाए, अतीत संबंधी अनेक तथ्यों का रहस्योद्घाटन होगा जो इतिहास की उपयोगिता में अवश्य वृद्धि करेगा।












अतः यदि इतिहास समाज में रहने वाले मनुष्यों के कार्यों एवं उपलब्धियों की कहानी है, ऐसी परिस्थिति में अतीत के महापुरुषों की उपलब्धि संबंधी ज्ञान कैसे प्राप्त किया जाए। ऐतिहासिक स्रोतों, पाण्डुलिपियों में वर्णित उनकी उपलब्धियों को अनुभव द्वारा इतिहासकार अपने मस्तिष्क में एक परिकल्पनात्मक चित्र बनाकर समसामयिक समाज के समक्ष प्रस्तुत करता है। रेनियर का अभिमत है कि प्रत्येक व्यक्ति के लिए अपने अनुभव के संस्मरण का सर्वोच्च महत्व है। अरस्तू ने यथार्थ अनुभव के प्रशिक्षण की भूरि-भूरि प्रशंसा की है। प्रत्येक युग का मानव समाज अपने बच्चों को अतीत का संस्मरण सुनाते हैं और परंपरा के रूप में एक पीढ़ी के बाद दूसरी पीढ़ी तक निर्बाधरूप से गतिशील रहती है। अतीतकाल से प्रचलित अनुभवों की कहानी एक पीढ़ी के पश्चात् दूसरी पीढ़ी तक चलती है और इतिहास की वस्तु सामग्री बन जाती है। डॉ. एल. पी. पाण्डे ने इसे परंपरा के रूप में मान्यता प्रदान करते।


हुए परंपरा को ऐतिहासिक वस्तु सामग्री स्वीकार किया है। उनके अनुसार सतत् निरंतर साध्य तथा श्रेष्ठ से भी श्रेष्ठतर तत्व के रूप में परंपरा भावी पीढ़ी की विकासधाराओं को सार्थक पृष्ठभूमि देता है। परंपराओं का विवरण इतिहासकार को स्पष्टीकरण के लिए कारणों, उद्देश्यों, प्रभाव तथा परिणाम की गवेषणा के लिए प्रेरित, प्रोत्साहित तथा विवश करता है। सम्राट अकबर की उदारवादी धार्मिक नीति के कारणों की व्याख्या करते समय इतिहासकार तत्कालीन परिस्थिति, अकबर का उद्देश्य, धार्मिक नीति क्रियान्वय के कारणों तथा परिणामों की व्याख्या करता है। इन सभी तथ्यों की अनुभूति इतिहासकार के लिए आवश्यक है। इसीलिए कुछ विद्वान इतिहास को अतीतकालिक अनुभवों का वृतांत मानते हैं।



परिभाषा क्र. 6 - संपूर्णइतिहास समसामयिक इतिहास है


इटालियन दार्शनिक क्रोचे का कथन है कि “ संपूर्ण इतिहास समसामायिक इतिहास होता है। ' जिस समय क्रोचे ने यह कथन दिया था तब बीसवीं सदी के विद्वत समाज के लिए यह हास्यास्पद लगता था कि कैसे अतीत को वर्तमान की संज्ञा दी जा सकती है। क्रोचे के कथन का अर्थ यह है कि प्रत्येक वर्तमान इतिहासकार अतीत का अपनी दृष्टि से अवलोकन करता है। अतीत को उस रूप में नहीं देखता जिस रूप में वह था। अतीत का निर्माण इतिहासकार के मस्तिष्क में होता है। उसके अनुसार, इतिहास इस तथ्य की स्वीकृति है कि जीवन यथार्थ इतिहास से भिन्न है। क्रोचे का आशय है कि घटनाएँ तथा विचार सभी इतिहास प्रवाह के अभिन्न अंग हैं। उसकी विषयवस्तु है कि वर्तमान जीवन से संबंधित होने के कारण इतिहास सदैव समसामयिक होता है एवं समसामयिकता की यह विशेषता है कि वह उसे इतिवृत्त से अलग करती है।


अतीतकालिक अथवा असामयिक इतिहास की यह पहली अपेक्षा है कि वह इतिहासकार के चित्त को उद्वेलित करता है। परिणामस्वरूप समसामयिक इतिहास की भाँति वह इतिहास भी सजीव हो उठता है। यह एक स्पष्ट तथ्य है कि केवल वर्तमानकालिक जीवन में अभिरुचि ही अतीत के अनुसंधान लिए प्रेरित करती है और इस प्रकार अतीतकालिक तथ्य वर्तमानकालिक जीवन के हितों के साथ संयुक्त हो जाता है। इस प्रकार अतीत वर्तमानकालिक कौतूहलों अथवा स्वार्थों का समाधान प्रस्तुत करता है।


एल्टन का अभिमत है कि वर्तमान के संदर्भ में अतीत का अध्ययन सुखद भविष्य के लिए होना चाहिए।


अतः इतिहास समसामयिक होता है। अतीतकालिक घटना पेलीपोनेशियन युद्ध, मेक्सिको की कला, अरबी दर्शन का इतिहास, वर्तमान में क्या अभिरुचि दे सकता है, परंतु इनमें से प्रत्येक उस क्षण इतिहास का स्वरूप धारण कर लेता है जब वर्तमान में हम अपनी आत्मिक आवश्यकताओं के अनुरूप उसको स्वीकार कर लेते हैं। इतिहास जीवन का इतिवृत्त होता है, इतिवृत्त न हो तो इतिहास असामयिक इतिहास होता है और इसे इतिवृत्तात्मक अतीतकालिक इतिहास भी कहा जा सकता है।


क्रोचे के अनुसार वर्तमानकालिक जीवन में अभिरुचि ही किसी को अतीत का अन्वेषण करने के लिए प्रेरित कर सकती है, किंतु इन अभिरुचियों की भूमिका और भी महत्वपूर्ण होती है। क्रोचे हीगेल के उस विचार से सहमत हैं कि ऐतिहासिक प्रक्रिया में चेतना ही गतिमान तत्व है।


इस प्रकार सामयिकता इतिहास का आवश्यक लक्षण है। साथ ही इतिहास तथा जीवन का संबंध एकात्मकता से है। प्रमाणविहीन इतिहास निरर्थक होता है। इसीलिए क्रोचे का कथन 'संपूर्ण इतिहास समसामयिक होता है यथार्थ प्रतीत होता है।


इतिहास की समसामयिकता को अन्य विद्वानों ने भी मान्यता प्रदान की है। रेनियर के अनुसार “संपूर्ण अतीत मेरा अतीत है और मैं अपने व्यक्तिगत संतोष के लिए स्मरण करता हूँ।' इतिहासकार अतीत का अध्ययन समसामयिक सामाजिक उपयोगिता के लिए करता है। डेवी ने भी इसे स्वीकार करते।


हुए कहा है कि “अतीत के प्रति निष्ठा न तो उसके लिए और न तो अतीत के लिए, बल्कि सुरक्षित तथा सुसंपन्न वर्तमान के लिए करते हैं कि वह सुखद भविष्य का निर्माण करेगा।' अतः यह स्पष्ट है कि अतीत का अध्ययन अतीत के लिए नहीं, अपितु सुरक्षित वर्तमान तथा सुखद भविष्य के लिए करते हैं। अतीत उस क्षण वर्तमान हो जाता है जब हम वर्तमान की आवश्यकताओं के अनुरूप उसका पुनर्विस्तरण करते हैं। ओकशाट ने भी कहा है कि व्यावहारिक अतीत की आधारशिला पर ही वर्तमान का निर्माण हुआ है। जो भविष्य को प्रभावित करेगा। यह यथार्थ है कि वर्तमान का निर्माण अतीत की ही आधारशिला पर हुआ है। प्रो. वाल्श अनुसार, इतिहास अतीत के अंतराल में मानव जाति का अध्ययन होता है। वर्तमान के की रुचि ही इतिहासकार को कल के अंतराल में निहित तथ्यों को प्रकाश में लाने के लिए प्रेरित करती है। मैंडेलबाम ने भी अतीत में वर्तमान रुचि को प्रधानता दी है। अतीत का अध्ययन अतीत के लिए नहीं, अपितु वर्तमान समाज की उपादेयता के लिए किया जाता है। प्रो. गालब्रेथ का मत है कि अतीतकालिक घटनाओं के प्रस्तुतीकरण में इतिहासकार वर्तमान आवश्यकताओं को ध्यान में रखकर महत्वपूर्ण भूमिका अदा करता है। अतः इन सभी विद्वानों ने इतिहास को समसामयिक इतिहास माना है।


परिभाषा क्र. 7 - इतिहास भूत एवं वर्तमान का मध्यस्थ है।


जी. आर. एल्टन अनुसार, इतिहासकार जिसे लिखता है, वही इतिहास है। इतिहासकार के के इतिहास की सामग्री अतीतकालिक ऐतिहासिक तथ्य होते हैं तथा इतिहासकार वर्तमान का प्रतिनिधित्व करता है। सभी ऐतिहासिक तथ्य अपने युग के प्रतिमानों द्वारा प्रभावित इतिहासकार का व्याख्यात्मक विवरण होता है। चयन तथा व्याख्या की अन्तर्प्रक्रिया का स्वरूप अतीत तथा वर्तमान है। यदि तथ्य अतीत का प्रतिनिधित्व करता है तो इतिहासकार वर्तमान का। ई. एच. कार ने उचित ही कहा है, "वस्तुतः इतिहास, इतिहासकार तथा तथ्यों के बीच अंतर्क्रिया की अविच्छिन्न प्रक्रिया तथा वर्तमान और अतीत के बीच अनवरत परिसंवाद है। इस प्रकार इतिहास को अतीत तथा वर्तमान के बीच अनवरत परिसंवाद कहा गया है। यह एकाकी व्यक्तियों के बीच संवाद नहीं अपितु अतीतकालिक तथा वर्तमानकालिक समाज के बीच संवाद है।


वास्तविकता यह है कि इतिहास में अतीत, वर्तमान तथा भविष्य का समानरूपेण महत्व होता है। वर्तमान में इतिहासकार समसामयिक समाज को अतीत का अन्वेषण अपने पूर्वजों की उपलब्धियों का ज्ञान प्राप्त करने के लिए प्रेरित तथा प्रोत्साहित करता है कि उसमें समसामयिक के हित में कुछ वृद्धि कर सके। वह यहीं पर गौरवपूर्ण अतीत का अंत न करके भावी पीढ़ी के सुखद तथा सुसम्पन्न भविष्य की कल्पना करके अतीत की परंपराओं को भविष्य की गोद में प्रक्षेपित करता है। एल्टन तथा रांके ने इतिहास में भविष्य को सर्वाधिक महत्व दिया है। ओकशाट ने तो स्पष्ट कहा है कि अतीत की आधारशिला पर वर्तमान का आविर्भाव हुआ है, जो मनुष्य के भविष्य का निर्णायक होगा। डेवी के अनुसार अतीत में रुचि, वर्तमान की सुरक्षा तथा सुखद भविष्य के निर्माण के लिए किया जाता है।


मनुष्य चिंतनशील प्राणी है। मनुष्य जो कुछ सोचता या करता है, उसके पीछे भावी पीढ़ी की सुखद भविष्य की कल्पना सन्निहित रहती है। भारतीय मनीषियों ने वेदों, महाकाव्यों तथा इतिहास की रचना समसामयिक सामाजिक सुखों तथा स्वांतः सुखाय के लिए नहीं अपितु अतीत की गौरवपूर्ण परंपराओं को भावी पीढ़ी के सुखद भविष्य के लिए किया है। भारतीय इतिहास में महाराणा प्रताप, शिवाजी, झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई, भगत सिंह, चन्द्रशेखर आजाद ने अपने जीवन का बलिदान, स्वांतः सुखाय के लिए नहीं बल्कि भावी पीढ़ी की स्वतंत्रता के लिए किया था। महात्मा गांधी, लाला लाजपत राय, गोपालकृष्ण गोखले, सरदार वल्लभभाई पटेल तथा जवाहरलाल नेहरू ने स्वतंत्रता संग्राम के समय जेल की यातनाओं को भावी पीढ़ी के सुखद भविष्य तथा भारत की स्वतंत्रता के लिए सहन किया था। अतः इतिहास निरंतर गतिशील कालचक्र अतीत तथा वर्तमान को संपृक्त करने वाला एक सेतु है। इतिहासकार इस सेतु पर आसीन होकर समसामयिक समाज को अतीत का अवलोकन कराता है, जो वर्तमान के लिए रुचिकर तथा उपयोगी हो । इतिहासकार इस सेतु पर निरंतर चक्रीय प्रकाश स्तंभ होता है। उसका पुनीत कर्त्तव्य अतीत के उद्धरणों द्वारा वर्तमान को प्रशिक्षित करना एवं सुखद भविष्य का मार्गदर्शन करना होता है। अतः इतिहास अतीत तथा वर्तमान के बीच संपर्क मार्ग पर एक सेतु है जो अतीत, वर्तमान तथा भविष्य के बीच अवरोध को दूर करके भावी पीढ़ी के लिए निष्कंटक मार्ग का दिशा निर्देशन करता