रांके के विशेष संदर्भ में इतिहास दर्शन की निश्चयात्मक अधिगम - Deterministic learning of philosophy of history with special reference to Ranke
रांके के विशेष संदर्भ में इतिहास दर्शन की निश्चयात्मक अधिगम - Deterministic learning of philosophy of history with special reference to Ranke
रांके के विशेष संदर्भ में इतिहास दर्शन की निश्चयात्मक अधिगम
रांके का इतिहास दर्शन
रॉके ने स्रोतों की विश्वसनीयता अर्थात् उनकी निश्चयात्मकता को नितान्त आवश्यक माना है। उसकी दृष्टि में अनुमान का इतिहास लेखन में कोई स्थान नहीं है और अनुमान व निष्कर्ष का अधिकार केवल पाठक का है। उसका मानना है कि इतिहासकारों को सिद्धान्तों का प्रतिपादन करने की प्रवृत्ति से बचकर रहना चाहिए। रॉके इतिहास और दर्शन शास्त्र की घनिष्टता के भी विरुद्ध है। रॉके तथ्यों को बुद्धि की कसौटी पर परख कर ही उनको इतिहास लेखन के लिए उपयुक्त मानता है। रॉके की दृष्टि में इतिहासकार का यह धर्म है कि वह तथ्यों को उसी रूप में प्रस्तुत करे जैसे कि वो वास्तव में थे। इतिहास दर्शन की निश्चयात्मक अभिगम का जनक रॉके प्राथमिक स्रोतों की प्रामाणिकता के बिना उन्हें स्वीकार नहीं करता है।
रांके के इतिहास लेखन के गुण एवं दोष
प्राथमिक स्रोतों पर आधारित वस्तुनिष्ठ इतिहास
नेबूर और रॉके का यह विश्वास था कि उन्होंने वैज्ञानिक एवं वस्तुनिष्ठ इतिहास की रचना की है। उनका मत है कि इतिहासकार का यह दायित्व है कि वह प्राथमिक स्रोतों के आधार पर ऐतिहासिक तथ्यों की सत्यता का परीक्षण कर उन्हें ज्यों का त्यों प्रस्तुत करे। तथ्यों का वस्तुनिष्ठ पुनर्सर्जन रॉके मत के इतिहास लेखन की विशिष्टता है और इसमें इतिहासकार से यह अपेक्षा की जाती है कि वह अपने काल के मूल्यों के परिप्रेक्ष्य में भूतकाल की घटनाओं का आकलन नहीं करे।
राजनीतिक इतिहास को महत्व
चूंकि रॉके राजनीतिक शक्ति को इतिहास का प्रमुख प्रतिनिधि मानता है, इसलिए उसने अपने इतिहास ग्रंथों में सामाजिक एवं आर्थिक बलों की उपेक्षा कर राजाओं और अन्य राजनीतिक नेताओं के कार्यों को, अर्थात् राजनीतिक इतिहास को सर्वाधिक महत्व दिया है। रॉके पर बीसवीं शताब्दी के इतिहासकारों द्वारा यह आरोप लगाया जाता है कि उसने राजनीतिक इतिहास, विशेषकर महा शक्तियों के राजनीतिक इतिहास को आवश्यकता से अधिक महत्व दिया है परन्तु अपने लेखन में उसने सांस्कृतिक इतिहास को भी महत्व दिया है। 'हिस्ट्री ऑफ़ इंग्लैण्ड' में उसने महारानी एलिज़ाबेथ प्रथम के शासन काल के साहित्य पर एक सम्पूर्ण अध्याय लिखा है।
रांके के इतिहास लेखन के गुण एवं दोष
राजनीतिक अनुदारता
अपने ग्रंथ 'दि ओरिजिन्स ऑफ़ दि वार ऑफ दि रिवोल्यूशन में रॉके ने फ्रांसीसी क्रान्ति की भर्त्सना की है और उसको प्रशा के सन्दर्भ में उपयुक्त नहीं माना है। प्रशा के लिए वह सुदृढ राजतन्त्र को ही उपयुक्त मानता था और प्रशा की प्रजा से वह यह अपेक्षा करता था कि वह प्रशियन राज्य के प्रति स्वामिभक्त रहे। रॉके की यह मान्यता है कि शासन के सार्वभौमिक सिद्धान्त निरर्थक ही नहीं अपितु खतरनाक भी हैं। प्रशा के सन्दर्भ में वह सक्षम तथा ईमानदार निरंकुश राजतन्त्र का पक्षधर है।
इतिहास में धर्म का स्थान
रॉके इतिहास को धर्म मानता है अथवा धर्म और इतिहास के मध्य घनिष्ठ सम्बन्ध देखता है। वह इतिहास को ईश्वरीय लीला के रूप में देखता है।
इतिहास में व्यक्तित्व की भूमिका
रॉके इतिहास में महान विभूतियों की भूमिका को महत्वपूर्ण एवं निर्णायक मानता है।
सार्वभौमिक इतिहास
रॉके इतिहास लेखन में व्यष्टि से समष्टि की ओर बढ़ता है। वह विभिन्न देशों के इतिहास की विशिष्टताओं को सार्वभौमिक इतिहास की आवश्यक कड़ियां मानकर सार्वभौमिक इतिहास की ओर बढ़ता है।
रॉके की इतिहास विषयक अध्ययन गोष्ठी
रॉके की अध्ययन गोष्ठी की तकनीक ने इतिहास के उन्नत विद्यार्थियों को ऐतिहासिक स्रोतों के आलोचनात्मक अध्ययन की प्रणाली में एक क्रान्ति का सूत्रपात किया।
इतिहासकार के रूप में रॉके का आकलन
अधिकांश आधुनिक इतिहासकारों पर रॉके की तकनीक का स्पष्ट प्रभाव देखा
जा सकता है। रॉके तथा उसके अनुयायियों थियोडोर मॉमसे, जॉन गुस्टाव
ड्रॉयसेय, फ्रेडरिक विल्हेम शिरमाकर और हेनरिक वॉन
ट्रीट्स्के ने समीक्षा एवं ऐतिहासिक प्रणाली के नियम स्थापित किए। जर्मन विचारधारा
ने इतिहास लेखन को एक व्यवसाय के रूप में प्रतिष्ठित किया और उसने इतिहास के
औपचारिक शास्त्रीय अध्ययन की स्थापना की कैरोलिन होकरी ने रॉके को इसका श्रेय दिया
है कि उसने 19 वीं शताब्दी के उत्तरार्ध में यूरोप और
अमेरिका में इतिहास को एक स्वतन्त्र एवं प्रतिष्ठित विषय के रूप में मान्यता
दिलाई। उसने अपनी कक्षाओं में अध्ययन गोष्ठी की प्रणाली प्रारम्भ की और अभिलेखीय
शोध एवं ऐतिहासिक दस्तावेज़ों के विश्लेषण पर अपनी दृष्टि केन्द्रित की इतिहास
लेखन में पूर्ण तटस्थता का अनुचित दावा करने के बावजूद रॉके आधुनिक युग के महानतम
इतिहासकारों में प्रतिष्ठित होने का अधिकारी है।
रॉके ने स्रोतों की विश्वसनीयता अर्थात् उनकी निश्चयात्मकता नितान्त
आवश्यक माना है। उसकी दृष्टि में अनुमान का इतिहास लेखन में कोई स्थान नहीं है और
अनुमान व निष्कर्ष का अधिकार केवल पाठक का है। रॉके का यह मानना है कि ऐतिहासिक
युगों को पूर्व निर्धारित आधुनिक मूल्यों एवं आदशों की कसौटी पर नहीं परखा जाना
चाहिए बल्कि आनुभविक साक्ष्यों पर आधारित इतिहास के परिप्रेक्ष्य में उनका आकलन
किया जाना चाहिए।
रोके न तो रोमानी आन्दोलन का अनुकरण करता है, न दैवकृत
इतिहास की रचना करता है। और न ही सामाजिक डार्विनवाद से सहमत होता है। वह वह
बुद्धिवाद व यथार्थवाद की महाद्वीपीय परम्परा का अनुगमन करता है। रॉके हीगेल
द्वारा प्रतिपादित इतिहास दर्शन की कटु आलोचना करता है। उसका कहना है कि हीगेल ने
इतिहास में मानव क्रिया की भूमिका की उपेक्षा की है। जब कि मानव-क्रिया की उपेक्षा
कर केवल विचार और अवधारणा के आधार पर हम प्रामाणिक इतिहास की रचना नहीं कर सकते।
रॉक इतिहास को ईश्वरीय लीला के रूप में देखता है। रॉके इतिहास में
महान विभूतियों की भूमिका को महत्वपूर्ण एवं निर्णायक मानता है। रॉके विभिन्न
देशों के इतिहास की विशिष्टताओं को सार्वभौमिक इतिहास की आवश्यक कड़ियां मानकर
सार्वभौमिक इतिहास की ओर बढ़ता है। रॉके की अध्ययन गोष्ठी की तकनीक ने इतिहास के
उन्नत विद्यार्थियों को ऐतिहासिक स्रोतों के आलोचनात्मक अध्ययन की प्रणाली में एक
क्रान्ति का सूत्रपात किया।
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