इतिहास और मानवविज्ञान में अंतर - Difference in History and Anthropology

इतिहास और मानवविज्ञान में अंतर - Difference in History and Anthropology

इतिहास और मानवविज्ञान में अंतर - Difference in History and Anthropology

इस प्रकार हम देखते हैं कि मानवविज्ञान एवं उसकी शाखाएं किसी न किसी रूप में इतिहास अथवा उसकी शाखा से संबंधित है। अब प्रश्न उठता है कि जब मानवविज्ञान इतिहास का ही अंग है तो पृथक रूप से मानवविज्ञान एक विषय के रूप में अस्तित्व में क्यों आया। अतः निश्चित रूप से इतिहास एवं मानवविज्ञान में कुछ मूलभूत अंतर अवश्य होंगे। ये सूक्ष्म अंतर निम्नानुसार हैं


1. इतिहास में मात्र मनुष्य के कार्यों का ही अध्ययन नहीं होता, अपितु उससे संबंधित अन्य घटनाक्रमों यथा- साम्राज्यों का उत्थान-पतन, बुद्ध शांति समझौते इत्यादि का अध्ययन भी किया जाता है, जबकि मानवविज्ञान में प्रत्येक अध्ययन मनुष्य के इर्द-गिर्द ही घूमता है। 





ए.एल. क्रोवर (A.L... Krueber) एवं जी. क्लूखोन (C Kluckhohn) महोदय के अनुसार- "मनुष्य के विभिन्न पक्षों का अध्ययन करने वाले समस्त विज्ञानों में से मानवविज्ञान ही एक ऐसा विज्ञान है जो मनुष्य के संपूर्ण अध्ययन के सबसे निकट है।"


2. इतिहास में मनुष्य के कार्यों पर अधिक जोर दिया जाता है, जबकि मानवविज्ञान में मानव की उत्पत्ति एवं शारीरिक विकास पर अधिक जोर दिया जाता है। जेकेब्स (Jacobs) एवं स्टर्न के अनुसार "मानवविज्ञान मानव जाति के जन्म से लेकर वर्तमान तक का मानव के शारीरिक, सामाजिक एवं सांस्कृतिक विकास एवं व्यवहारों का वैज्ञानिक अध्ययन है। श्यामाचरण दुबे के अनुसार विशाल प्राणीवर्ग के अनेक प्राणियों में से केवल मानव के विकास तथा उसकी शारीरिक तथा उसकी शारीरिक विशेषताओं का अध्ययन शारीरिक मानवविज्ञान के रूप में स्वतंत्र दिशा में विकसित हुआ


3. इतिहास की तुलना में मानवविज्ञान मानवीय समूहों में पाई जाने वाली विषमताओं के अध्ययन पर विशेष बल देता है। इस हेतु सांस्कृतिक मानवविज्ञान के तहत नृजातिविज्ञान (Ethnology) एवं भाषा विज्ञान (Linguistics) के आधार पर मानववैज्ञानिक जन समूहों का तुलनात्मक अध्ययन करते हुए उनका वर्गीकरण प्रस्तुत किया जाता है।







4. इतिहास में हम मुख्य बल उन समाजों के अध्ययन पर देते हैं, जिनकी कोई ऐतिहासिक पृष्ठभूमि हो तथा जिन्होंने इतिहास को गति, दिशा एवं अर्थ दिया हो जबकि सामाजिक मानवविज्ञान में ऐसे समाज के अध्ययन पर विशेष बल दिया जाता है, जिनके बारे में न तो कोई प्रमाण मिलते हैं और न जिनकी कोई ऐतिहासिक पृष्ठभूमि है। एस.एफ. नडेल के अनुसार सामाजिक मानवविज्ञान इतिहासविहीन (Without History) समाजों का और अपरिचित (Exotic) प्रकृति की संस्कृतियों का अध्ययन है। अतः सामाजिक मानवविज्ञान ऐसी संस्कृतियों का अध्ययन है, जिनके आवरण में ढंके लोग सभ्य समाजों के लिए अपरिचित जैसे हैं। इसीलिए सामाजिक मानवविज्ञान में मुख्यतः आदिम जनजातियों का अध्ययन किया जाता है।"


5. इतिहास में कालक्रम का विशेष महत्व होता है, अतः इतिहासकार काल के सापेक्ष में गतिशील अवस्था में विभिन्न संस्कृतियों का अध्ययन करता है जबकि सांस्कृतिक मानवविज्ञान में स्थिर अवस्था में एक संस्कृति विशेष के काल विशेष का ही अध्ययन किया जाता है। अतः एक सांस्कृतिक मानववैज्ञानिक विभिन्न संस्कृतियों के अपने अध्ययन में कालक्रम का ध्यान नहीं रखता तथापि उसका अध्ययन संपूर्ण संस्कृति के बारे में होता है।


इस प्रकार हम देखते हैं कि जहाँ इतिहास एवं मानवविज्ञान एक दूसरे से घनिष्ठ रूप से सहसंबंधित है वहीं सैद्धांतिक रूप से इनमें कुछ सूक्ष्म अंतर भी स्पष्टतः परिलक्षित होते हैं।







एक स्वतंत्र सामाजिक विज्ञान के रूप में मानवविज्ञान का विकास 19वीं सदी के मध्य में हुआ। इससे पूर्व मानवविज्ञान प्रमुखतः इतिहास का ही एक अंगथा अब चूँकि मानवविज्ञान, इतिहास की ही संतति है, अत: इसे इतिहास से पूर्णतः पृथक नहीं किया जा सकता। विभिन्न विषय होते हुए भी ये एक दूसरे से कहीं-न-कहीं संबंधित ही प्रतीत होते हैं। सामाजिक मानवविज्ञान के अध्ययन की एक पद्धति ऐतिहासिक पद्धति भी है। विद्वानों के मतानुसार ऐतिहासिक पद्धति सामाजिक मानवविज्ञान के तहत विभिन्न युगों से गुजरते हुए मानव जीवन के प्रवाह को समझने में सहायक है। एएल. क्रोबर महोदय के अनुसार “ऐतिहासिक व्याख्या की तुलना उस सीमेंट से कर सकते हैं जो मानव इतिहास के पृथक तथा अर्थहीन तथ्यों में घटनाओं को एक अर्थपूर्ण प्रतिमान से संयुक्त करता है।"


मनुष्य के व्यवहार का अध्ययन, विशेषकर उसके जटिल सामाजिक संबंधों का विश्लेषण प्राकृतिक विज्ञान की अध्ययन शैली द्वारा भलीभाँति नहीं किया जा सकता। इस दिशा में मानवविज्ञान ने इतिहास की शैली को ही अपनाया। यूरोप के महादेश में संस्कृति के विकास का अध्ययन इतिहास की शोध-प्रणालियों द्वारा किया गया। तथ्यों के अभाव में ऐतिहासिक अनुमान द्वारा प्राचीन संस्कृतियों की पुनर्रचना के प्रयत्न भी वहाँ हुए। अमरीका में भी संस्कृतियों का अध्ययन इतिहास से प्रभावित था। अतः मानवविज्ञान के लिए किसी-न-किसी रूप में इतिहास की उपयोगिता बनी हुई है। मनुष्य को मूलतः ऐतिहासिक जीव कहने का तात्पर्य भी यही है कि इतिहास में मानवविज्ञान समाया हुआ है।






इतिहास एक इतना विस्तीर्ण एवं व्यापक विषय है कि इसको विभिन्न शाखाओं में बाँटकर ही इसका विस्तृत अध्ययन किया जा सकता है। इतिहास से 19वीं सदी में मानवविज्ञान के एक विषय के रूप में पृथक हो जाने से आज इतिहास को भी लाभ हुआ है। अब इतिहासकार विभिन्न मानवों एवं समाज के क्रियाओं एवं व्यवहार को समझने के लिए सामाजिक मानवशास्त्रों के निष्कर्षो से लाभ उठा सकता है। अब एक इतिहासकार इतिहास में मानवशास्त्रियों के निष्कर्षों का लाभ उठाकर विश्व के विभिन्न देशों के समाजों की प्रकृति को आसानी से समझ सकता है।


डिल्थे (Dilthey) महोदय के अनुसार ऐतिहासिक वास्तविकता व्यक्ति तथा व्यक्तियों द्वारा निर्मित विश्व के बीच की अंतर्क्रिया है। ऐतिहासिक विश्व मस्तिष्क प्रभावित अथवा मस्तिष्क निर्मित विश्व है। अतः इतिहास की विषय वस्तु में वह सब कुछ है जो मनुष्य ने किया है। मनुष्य ने जो कुछ किया है, उसकी सांगोपांग विवेचना मानवविज्ञान के तहत विस्तृत रूप से की जाती है क्योंकि मानवविज्ञान में विभिन्न मानव समाजों के सामाजिक एवं सांस्कृतिक क्रियाकलापों का स्थिर अवस्था में अध्ययन कर निष्कर्ष निकाले जाते हैं और एक इतिहासकार अपनी आवश्यकतानुसार इन मानवशास्त्रीय निष्कर्षो का लाभ उठाकर व्यक्ति तथा व्यक्तियों द्वारा निर्मित विश्व के बीच की अंतर्क्रिया को आसानी से समझ सकता।





इस प्रकार हम निश्चित रूप से कह सकते हैं कि इतिहास व मानवविज्ञान एक दूसरे के पूरक हैं। इतिहास के बिना मानवविज्ञान का एवं मानवविज्ञान के बिना इतिहास का अध्ययन पूर्णता को प्राप्त नहीं कर सकता। अतः इतिहास को मानवविज्ञान के साथ सहसंबंधित माना जा सकता है। हम यह भी कह सकते हैं कि किसी अन्य विषय की तुलना में मानवविज्ञान, इतिहास से कहीं अधिक घनिष्ठ रूप से सहसंबंधित है।